असम सरकार ने विधानसभा में जानकारी दी है कि पिछले दो वर्षों में विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) द्वारा विदेशी घोषित किए गए 193 लोगों को बांग्लादेश भेजा गया। इनमें 67 लोगों को 1950 के ‘इमिग्रेंट्स एक्सपल्शन एक्ट’ (Immigrants Expulsion Act, 1950) के तहत कार्रवाई करते हुए सीमा पार भेजा गया। इस कानून को राज्य सरकार ने पिछले साल फिर से लागू किया था।

यह जानकारी मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने विधानसभा में एआईयूडीएफ (AIUDF) विधायक बदरुद्दीन अजमल के सवाल के जवाब में दी। आपको बता दें कि हिमंता राज्य के गृह मंत्री भी हैं।

इसी बीच विदेशी न्यायाधिकरणों का मुद्दा देशभर में चर्चा में है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के 27 फैसलों को रद्द कर दिया। इन मामलों में विदेशी न्यायाधिकरण ने संबंधित लोगों को उनकी अनुपस्थिति (एक्स-पार्टी) में ही विदेशी घोषित कर दिया था और हाईकोर्ट ने उन फैसलों को बरकरार रखा था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की नागरिकता का फैसला निष्पक्ष, कानूनी और उचित प्रक्रिया के तहत ही किया जाना चाहिए। केवल व्यक्ति की गैरमौजूदगी में उसे विदेशी घोषित करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने 27 मामलों की दोबारा सुनवाई के दिए आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी 27 मामलों को दोबारा सुनवाई के लिए संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों (Foreigners Tribunals) के पास भेज दिया। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की नागरिकता का सवाल बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा है। इसलिए इस पर फैसला निष्पक्ष और कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होना चाहिए।

इसी दिन असम विधानसभा के चल रहे सत्र में एआईयूडीएफ विधायक बदरुद्दीन अजमल ने पिछले दो वर्षों में बांग्लादेश भेजे गए लोगों की संख्या को लेकर सवाल पूछा।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की ओर से दिए गए लिखित जवाब में बताया गया कि 1 जुलाई 2024 से 30 जून 2026 के बीच कुल 1679 लोगों को बांग्लादेश भेजा गया।

सरकार ने इन लोगों को तीन श्रेणियों में बांटा है-
-औपचारिक रूप से निर्वासित (Formal Deportation)
-वापस भेजे गए (Sent Back)
-निष्कासित (Expelled)

इन 1679 लोगों में से 192 ऐसे थे जिन्हें विदेशी न्यायाधिकरण ने विदेशी घोषित किया था। इसके अलावा मोरियम बेगम नाम की एक बच्ची को भी उसकी मां के साथ बांग्लादेश भेजा गया। उसकी मां को पहले ही विदेशी घोषित किया जा चुका था। इसलिए बच्ची को भी उसके साथ भेजा गया।

‘पुश बैक’ और 1950 के कानून का सहारा

कानून के अनुसार, विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) द्वारा विदेशी घोषित किए गए व्यक्ति को गुवाहाटी हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार होता है। वहीं किसी व्यक्ति को औपचारिक रूप से दूसरे देश भेजने (डिपोर्टेशन) से पहले दोनों देशों के बीच यह पुष्टि की जाती है कि वह वास्तव में उसी देश का नागरिक है।

हालांकि, मई 2025 से असम सरकार ने एक नई प्रक्रिया अपनाई। इसके तहत विदेशी घोषित लोगों को बिना बांग्लादेश से औपचारिक बातचीत किए सीधे अंतरराष्ट्रीय सीमा पार भेजा जाने लगा। इसे सरकार ने ‘पुश बैक’ (Push Back) नाम दिया।

इसके बाद सितंबर 2025 में राज्य सरकार ने लंबे समय से निष्क्रिय पड़े इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) एक्ट, 1950 को फिर से लागू करने का फैसला किया। सरकार ने इसके लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) भी बनाई। इस कानून के तहत विदेशी घोषित लोगों को 24 घंटे के भीतर भारत छोड़ने का आदेश दिया जाता है। तय समय के बाद प्रशासन उन्हें अंतरराष्ट्रीय सीमा पार भेज देता है।

67 लोगों को 1950 के कानून के तहत भेजा गया

असम सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 67 विदेशी घोषित लोगों को 1950 के कानून के तहत बांग्लादेश भेजा गया।

इनमें सबसे अधिक नगांव जिले से 19 लोग, कोकराझार से 16, बारपेटा से 7, चिरांग और कार्बी आंगलोंग से 4-4, दीमा हसाओ और होजाई से 3-3, कामरूप (ग्रामीण) और धुबरी से 2-2 लोग शामिल हैं।

इसके अलावा बोंगाईगांव, तामुलपुर, उदालगुड़ी, बिश्वनाथ, धेमाजी, लखीमपुर और हैलाकांडी से एक-एक व्यक्ति को बांग्लादेश भेजा गया।

126 लोगों को ‘सेंट बैक’ श्रेणी में रखा गया
सरकार ने बताया कि 126 विदेशी घोषित लोगों को ‘सेंट बैक’ (Sent Back) श्रेणी में रखा गया है। इनमें दरांग जिले की एक बच्ची भी शामिल है जिसे पिछले साल मई में उसकी मां मणिकजान के साथ बांग्लादेश भेजा गया था। उसकी मां को पहले ही विदेशी घोषित किया जा चुका था।

सरकार का जवाब: अपील लंबित होने पर किसी को नहीं भेजा जाता
एआईयूडीएफ विधायक बदरुद्दीन अजमल ने सरकार से पूछा कि बांग्लादेश भेजे गए कितने लोगों ने हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।

इस पर सरकार ने जवाब दिया कि यदि किसी व्यक्ति की हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील लंबित होती है तो उसे वापस नहीं भेजा जाता। सरकार ने यह भी कहा कि उसके पास ऐसी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है कि बांग्लादेश भेजे जाने के बाद किसी व्यक्ति ने हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की हो।

भारत-बांग्लादेश के बीच सीमा सुरक्षा पर मंथन

भारत और बांग्लादेश के बीच चार दिन तक चली महानिदेशक (डीजी) स्तर की बातचीत संपन्न हो गई है। इस वार्ता में भारत-बांग्लादेश सीमा पर होने वाली मौतों, अवैध घुसपैठ तथा अनजाने और जबरन सीमा पार करने से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। शुक्रवार को जारी एक आधिकारिक बयान में बीएसएफ ने यह जानकारी दी।