पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। इनमें पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु को विपक्ष के मजबूत गढ़ के रूप में देखा जाता है, जबकि असम पहले से ही भाजपा के लिए मजबूत राज्य माना जाता रहा है। ऐसे में विपक्ष शासित राज्यों की राजनीतिक स्थिति इस बार काफी अहम मानी जा रही है और भाजपा इन राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
अभी की स्थिति को देखें तो भाजपा का सबसे बड़ा लक्ष्य असम में अपनी सरकार बचाए रखना है। इसके साथ ही वह पश्चिम बंगाल में जीत हासिल करने या कम से कम अपनी स्थिति बेहतर करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। वहीं केरल और तमिलनाडु में भी विपक्षी दलों को चुनौती देने के लिए पार्टी लंबे समय से रणनीति पर काम कर रही है। इन पांच राज्यों में केवल असम ही ऐसा राज्य है जहां भाजपा पहले से मजबूत स्थिति में है। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में पार्टी का ऐतिहासिक रूप से ज्यादा प्रभाव नहीं रहा है।
असम में 2016 से पार्टी सत्ता में है
असम में भाजपा 2016 से सत्ता में है, इसलिए यहां सरकार बनाए रखना उसके लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है। पार्टी लंबे समय से बांग्लादेश से अवैध आप्रवासन का मुद्दा उठाती रही है। यह मुद्दा असमिया हिंदुओं के उन वर्गों के साथ जुड़ गया है जो प्रवासन से जुड़ी आर्थिक और सांस्कृतिक चिंताओं को महसूस करते हैं। वहीं बांग्लाभाषी मुसलमानों के वोट का रुझान भी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। अगर उनके वोट कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ के बीच बंटते हैं तो इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है, क्योंकि भाजपा विरोधी वोट बिखर जाएंगे। हालांकि लोकसभा चुनावों में मुसलमानों के वोट बड़ी संख्या में कांग्रेस के साथ एकजुट हो गए थे। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने अपने कार्यकाल में आक्रामक हिंदुत्ववादी रुख अपनाया है। असम में मुसलमानों की आबादी लगभग 34 प्रतिशत है। अगर ये मतदाता कांग्रेस के साथ एकजुट हो जाते हैं तो मुकाबला काफी कड़ा हो सकता है।
पश्चिम बंगाल में भाजपा को सफलता की उम्मीद है। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन के बाद से पार्टी के समर्थन में गिरावट देखी गई है। तृणमूल कांग्रेस लगातार चौथी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रही है। पार्टी को कोलकाता के आरजी कर अस्पताल बलात्कार कांड और शेख शाहजहां प्रकरण जैसे विवादों का सामना करना पड़ा है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पक्ष में कुछ बातें काम कर रही हैं। एक धारणा यह है कि भाजपा अभी भी पूरी तरह ‘बंगाली’ पार्टी नहीं मानी जाती। दूसरी ओर लक्ष्मी भंडार जैसी कल्याणकारी योजनाएं, जिनमें ग्रामीण महिलाओं को नकद सहायता मिलती है, काफी लोकप्रिय हैं।
पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की आबादी करीब 27 प्रतिशत है, जो भाजपा के लिए एक चुनौती भी है। इसके बावजूद राज्य में भाजपा का उभार उल्लेखनीय रहा है। 2011 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को सिर्फ 4 प्रतिशत वोट मिले थे और एक भी सीट नहीं मिली थी, जबकि अब वह तृणमूल कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन चुकी है।
केरल भाजपा के लिए अब भी कठिन राज्य बना हुआ है। 2024 के लोकसभा चुनाव में अभिनेता सुरेश गोपी ने भाजपा के टिकट पर त्रिशूर सीट जीती थी, जिसे राज्य की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है। इसके बाद पार्टी ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन किया और राजधानी में महापौर का पद हासिल किया। इसके बावजूद भाजपा के सामने बड़ी सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियां हैं। राज्य में मुसलमानों और ईसाइयों की संयुक्त आबादी लगभग 45 प्रतिशत है, इसलिए सिर्फ हिंदू वोटों को एकजुट करना चुनावी सफलता के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता।
तमिलनाडु में भाजपा अभी तक अपना मजबूत राजनीतिक आधार नहीं बना पाई है। यहां द्रविड़ आंदोलन की विरासत राजनीति को प्रभावित करती रही है और भाजपा को अक्सर उत्तर भारत की पार्टी के रूप में पेश किया जाता है। पार्टी का समर्थन मुख्य रूप से तमिल ब्राह्मणों तक सीमित माना जाता है, जो आबादी का लगभग 1 से 3 प्रतिशत हैं। भाजपा यहां अपने सहयोगी एआईएडीएमके पर काफी निर्भर है, जो पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता की मृत्यु के बाद कमजोर हो गई है। सत्तारूढ़ डीएमके भाजपा को हिंदी थोपने की समर्थक पार्टी के रूप में दिखाने की कोशिश करती रही है, जिससे राज्य की पुरानी राजनीतिक खाई और गहरी हो जाती है।
पुडुचेरी में भी चुनाव होने हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने वहां छह सीटें जीती थीं। हालांकि यह केंद्र शासित प्रदेश है, इसलिए यहां के चुनाव परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर असर अपेक्षाकृत सीमित माना जाता है।
भाजपा नेतृत्व सबसे अधिक भरोसे में असम को लेकर दिखाई देता है। पश्चिम बंगाल पार्टी के लिए बहुत अहम राज्य बना हुआ है और पार्टी के नेता भी मानते हैं कि सबसे कठिन मुकाबला यहीं है। संभावना है कि यहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिले। तृणमूल खुद को बाहरी लोगों के खिलाफ बंगाली अस्मिता की रक्षक के रूप में पेश कर रही है, जबकि भाजपा हिंदुत्व को बंगाली सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ जोड़कर एक व्यापक बंगाली-हिंदू पहचान बनाने की कोशिश कर रही है।
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चुनाव आयोग (EC) ने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही बीजेपी का प्लान भी साफ हो गया है। पार्टी असम में अपनी सत्ता बनाए रखना चाहती है जबकि बंगाल जीतना या कम से कम वहां अपनी स्थिति बेहतर करना चाहती है। वहीं केरल और तमिलनाडु में पार्टी अपनी पहुंच बढ़ाना चाहती है। इन पांच राज्यों में से सिर्फ़ असम ही बीजेपी के ‘कम्फ़र्ट ज़ोन’ (आरामदायक स्थिति) में है। बाकी राज्यों में खासकर केरल और तमिलनाडु में पार्टी कुछ खास नहीं कर पाई है। पूरी खबर को पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
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चुनाव आयोग ने रविवार को पश्चिम बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया। सभी राज्यों में मतगणना चार मई को होगी। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बताया कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए दो चरण में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होगा। मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि तमिलनाडु की 234 सदस्यीय विधानसभा के लिए 23 अप्रैल को जबकि केरल, असम और पुडुचेरी के लिए नौ अप्रैल को एक चरण में मतदान होगा। ज्ञानेश कुमार ने बताया कि चारों राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव के लिए 824 सीटों पर वोट डाले जाएंगे। कुमार ने कहा कि चुनाव हिंसा या प्रलोभन से मुक्त होने चाहिए और आयोग किसी भी तरह के उल्लंघन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेगा। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
