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अमित शाह से उलट असम के मंत्री की राय, बोले- CAA के लिए धार्मिक उत्पीड़न शर्त नहीं

Citizenship Amendment Act (CAA) Protest: अपनी बात को सही साबित करने के लिए उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि 'कोई अपीलकर्ता यह कैसे साबित करेगा कि वो धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हुआ है?

बीजेपी नेता ने पूछा कि कोई भी इंसान कैसे साबित करेगा कि वो धार्मिक उत्पीड़न का शिकार हुआ है? फोटो सोर्स – ANI

Citizenship Amendment Act (CAA) Protest: संसद के दोनों सदनों में नागरिकता संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान देश के गृहमंत्री अमित शाह ने साफ कर दिया था कि इसके तहत अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का आधार धार्मिक उत्पीड़न है। यानी जो अल्पसंख्यक वहां धार्मिक उत्पीड़न का शिकार हुए हैं सिर्फ उन्हें ही भारत की नागरिकता दी जाएगी। लेकिन अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ही एक अन्य नेता ने सीएए पर अमित शाह से उलट अपनी राय रखी है। असम सरकार में वित्त मंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा ने कहा है कि नागरिकता पाने के लिए धार्मिक उत्पीड़न आधार नहीं है। अपनी बात को सही साबित करने के लिए उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि ‘कोई अपीलकर्ता यह कैसे साबित करेगा कि वो धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हुआ है? या वो यह कैसे साबित करेगा कि वो धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होकर ही भारत में आया है।?’

सीएए पर पार्टी की लाइन से अलग राय रखने वाले पार्टी नेता हेमंत बिस्वा ने अपने इस बयान के बाद इसे और विस्तारपूर्वक समझाते हुए कहा कि ‘यह किसी भी इंसान के लिए असंभव है कि वो बांग्लादेश जाए और धार्मिक प्रताड़ना के खिलाफ थाने में दर्ज कराई गई अपनी शिकायत का कोई प्रमाण पत्र लेकर आए।’ उन्होंने आगे कहा कि ‘अगर किसी इंसान को यह साबित करना है कि वो धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हुआ है तो उसे थाने में दर्ज कराई गई शिकायत की कॉपी लाने के लिए वापस बांग्लादेश जाना होगा…बांग्लादेश का वो पुलिस स्टेशन उसे एफआईआर की कॉपी क्यों देगा? इसलिए मैंने यह कहा कि नागरिकता संशोधन कानून के तहत किसी के लिए यह साबित करना नामुमकिन है कि वो धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हुआ है।’

आपको बता दें कि पिछले ही साल केंद्र सरकार ने साल नागरिकता संशोधन कानून बनाया था। यह कानून 10 जनवरी से पूरे देश में लागू भी हो चुका है। इस कानून के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के शिकार होकर आए सिख, बौद्ध, ईसाई, हिंदू और पारसी धर्म को मानने वाले लोगों को भारत की नागरिकता देने की बात कही गई है। इस कानून में मुस्लिम समुदाय का जिक्र नहीं है। हालांकि कानून के सामने आने के बाद देश के अलग-अलग राज्यों में विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं। विरोधियों का कहना है कि यह कानून असंवैधानिक है और इसके जरिए धार्मिक रूप से भेदभाव किया गया है।

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