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असम के मंत्री बोले- नहीं चाहता मेरे कदमों पर चले मेरा बेटा, राजनीति से दूर रखना चाहता हूं

सरमा के मुताबिक, "मैं अपने बेटे को राजनीति की दुनिया में कदम नहीं रखवाना चाहता हूं, जिस तरह की चुनौतियां मैंने झेली हैं, मुझे नहीं लगता कि आज की पीढ़ी ऐसी चुनौतियां झेल सकती है।"

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र गुवाहाटी | Updated: April 7, 2021 3:53 PM
Himanta biswa sarma, Assam Assembly Election 2021असम विधानसभा चुनाव में वोट डालने के बाद हिमंत बिस्व सरमा, उनकी पत्नी और बेटा। (फोटो- डेक्कन हेराल्ड)

असम सरकार में मंत्री हिमंत बिस्व सरमा राज्य के सबसे कद्दावर नेताओं में जाने जाते हैं। आलम यह है कि मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल से ज्यादा असम में शिक्षा मंत्री सरमा ही चर्चा में रहते हैं। दरअसल, सरमा राज्य के पहली पीढ़ी के नेताओं में से एक रहे हैं। हालांकि, सरमा नहीं चाहते कि उनका बेटा उनके पदचिह्नों पर चले और राजनीति में हिस्सा ले।

गौरतलब है कि हिमंत बिस्व सरमा का राजनीतिक करियर छात्र जीवन में ही शुरू हो गया था। जब वे स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे, उस दौरान राज्य में अवैध बांग्लादेशियों के ख़िलाफ़ ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के नेतृत्व में असम आंदोलन की शुरुआत हुई थी। वे छात्र राजनीति की तरफ आकर्षित हुए और आसू में शामिल हो गए। इस दौरान उन्हें प्रफुल्ल कुमार महंत और भृगु कुमार फुकन के साथ रहने का मौका मिला। हालांकि, उन्हें चुनाव लड़ने का मौका पहली बार 1996 में मिला था। इसके बाद से उन्होंने कांग्रेस से भाजपा तक में लंबा अनुभव हासिल किया।

अपने 25 साल से ज्यादा लंबे राजनीतिक करियर के बावजूद सरमा बेटे को राजनीति के गलियारों में नहीं लाना चाहते। सरमा का कहना है कि उनका बेटा नंदिल अभी 18 साल का है। यह बेहतर होगा कि वह राजनीति से जितना हो सके दूर रहे। सरमा के मुताबिक, “मैं अपने बेटे को इस दुनिया में कदम नहीं रखवाना चाहता हूं, जिस तरह की चुनौतियां मैंने झेली हैं, मुझे नहीं लगता कि आज की पीढ़ी ऐसी चुनौतियां झेल सकती है।” उन्होंने कहा कि उनका बेटा अगले कुछ महीनों में लॉ यूनिवर्सिटी जॉइन करेगा। नंदिल भी साफ कहता है कि वह राजनीति में हिस्सा नहीं लेगा।

उतार नहीं, सिर्फ चढ़ाव भरा रहा है हिमंत बिस्व सरमा का राजनीतिक करियर: जब 2001 में तरुण गोगोई असम के मुख्यमंत्री बने, उसके बाद हिमंत का सुनहरा दौर शुरू हुआ। गोगोई ने 2002 में हिमंत को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया। शुरू में हिमंत को कृषि और योजना एवं विकास विभाग में राज्य मंत्री बनाया गया था, लेकिन इसके कुछ ही सालों में उन्हें वित्त, शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे कई बड़े विभागों की ज़िम्मेदारी मिल गई और वे धीरे-धीरे राज्य में गोगोई के बाद नंबर दो की हैसियत में आ गए। हालांकि, 2011 के विधानसभा चुनाव के बाद उनकी मुख्यमंत्री बनने की मंशा के चलते उन्हें गोगोई परिवार की तरफ से किनारे किया जाने लगा था। अगले कुछ सालों में ही सरमा ने भाजपा से नजदीकियां बढ़ाईं और 2016 के चुनाव में सरमा ने पार्टी को निराश नहीं किया।

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