मार्च-अप्रैल में होने वाले असम विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार अभी शुरुआती दौर में है लेकिन राज्य में ध्रुवीकरण पहले ही स्पष्ट रूप से सामने आ चुका है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा लंबे समय से ‘मियां’ समुदाय को अपने निशाने पर रखे हुए हैं। उनके बयानों पर कई बार विवाद हो चुका है। हिमंता बिस्वा सरमा ने हाल ही में कहा कि जब तक वह सत्ता में हैं, मियां समुदाय के लोगों को मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि मियां समुदाय के लोगों को लगातार मुश्किलों का सामना करना चाहिए जिससे वे इस राज्य को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएं।

ऊपरी असम के शिवसागर जिले से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के एक हिस्से पर असम युवा मंच और जातीय संग्रामी सेना जैसे कट्टरपंथी असमिया राष्ट्रवादी समूहों द्वारा लगाए गए कई पोस्टर दिखाई दिए। इन पोस्टरों पर ‘मियाओं का पीछा करो, असम को बचाओ’, ‘असम को बांग्लादेश बनने से बचाने के लिए मियाओं का पीछा करो’ और ‘मियाओं का पीछा करो, देश को बचाओ’ जैसे नारे लिखे थे। पिछले अगस्त में, इन समूहों के सदस्यों ने ऊपरी असम के विभिन्न शहरों, विशेष रूप से शिवसागर में रहने और काम करने वाले बंगाली मूल के मुसलमानों के घरों में जाकर उन्हें ऊपरी असम छोड़ने का आदेश दिया था। उन्होंने अगस्त 2024 में भी वहां इसी तरह का अभियान चलाया था। असम में बांग्ला भाषा बोलने वाले मुसलमानों के लिए आमतौर पर मियां शब्द का प्रयोग किया जाता है।

चुनाव में मियां विरोधी बयानबाजी और ध्रुवीकरण बीजेपी का मुख्य मुद्दा होगा

सीएम के नेतृत्व में, भाजपा ने यह बात छिपाई नहीं है कि आगामी चुनावों में मियां विरोधी बयानबाजी और ध्रुवीकरण उसका मुख्य मुद्दा होगा। गुवाहाटी विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर अखिल रंजन दत्ता का तर्क है कि 2016 के विधानसभा चुनावों से शुरू होकर असम चुनावों के लिए भाजपा की रणनीति स्थिति के अनुसार बदल गई है और इस प्रक्रिया में ध्रुवीकरण कई स्तरों पर सामने आया है।

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2016 में, भाजपा ने विभिन्न जातीय और आदिवासी समुदायों के बीच अपने समर्थन आधार को मजबूत करने के लिए हर संभव प्रयास किया, जिसमें स्वदेशी समुदायों की भूमि और अधिकारों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जो ‘जाति, माटी, भेटि’ (राष्ट्र, भूमि और घर) के नारे पर आधारित था। यह सब सर्वानंद सोनोवाल के नेतृत्व में हुआ जो आगे चलकर राज्य में पार्टी के पहले मुख्यमंत्री बने। दत्ता का तर्क है कि मार्च-अप्रैल 2021 के विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा के अभियान में सभ्यता के खतरे पर भाजपा की भाषा अधिक आक्रामक रही।

‘मौजूदा चुनाव में हिंदुत्व की राजनीति आक्रामक मोड़ ले रही’

दत्ता ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान कहा, “मौजूदा चुनाव में हिंदुत्व की राजनीति और भी आक्रामक मोड़ ले रही है क्योंकि वे एक ऐसे बिंदु पर पहुंच चुके हैं जहां वे इन सभी मुद्दों पर पहले ही बात कर चुके हैं जबकि सरकार ने राज्य में कॉरपोरेट्स को जिनमें आदिवासी क्षेत्र भी शामिल हैं, काफी जमीन और संसाधन दिए हैं।”

प्रोफेसर अखिल रंजन ने कहा, “इसके अलावा, राज्य की राजनीति में गौरव गोगोई की एंट्री ने भी बीजेपी के अभियानों प असर डाला है। इस सबके बीच कांग्रेस और दो क्षेत्रीय दलों रायजोर डोल (आरडी) और असम जातीय परिषद (एजेपी) के बीच गठबंधन की संभावना भी है, जिसमें तीनों प्रमुख व्यक्ति (गौरव गोगोई, आरडी के अखिल गोगोई और एजेपी के लुरिंज्योति गोगोई) ऊपरी असम के अहोम समुदाय के नेता हैं।”

भाजपा की ध्रुवीकरण की रणनीति 2021 में विशेष रूप से प्रभावी साबित हुई

भाजपा की ध्रुवीकरण की रणनीति 2021 में विशेष रूप से प्रभावी साबित हुई, जिसका कारण बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व वाले अखिल भारतीय संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (एयूआईडीएफ) के साथ कांग्रेस का गठबंधन था। एयूआईडीएफ का प्राथमिक समर्थक आधार बंगाली मूल के मुस्लिम हैं। परिणामस्वरूप, भाजपा-एजीपी गठबंधन ने ऊपरी और उत्तरी असम के जिलों की 42 सीटों में से 6 को छोड़कर बाकी सभी सीटों पर जीत हासिल की। ​​इन जिलों में मुख्य रूप से असमिया समुदाय के लोग रहते हैं। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन की 2021 के चुनावों में जीत के बाद हिमंता ने सोनोवाल की जगह मुख्यमंत्री का पद संभाला।

भाजपा के खिलाफ कांग्रेस की रणनीति

आगामी चुनावों में, कांग्रेस ने ऊपरी और उत्तरी असम में अपनी खोई हुई जमीन को कुछ हद तक वापस पाने की कोशिश में, सरमा की विवादास्पद टिप्पणियों और उनकी सरकार के कड़े कदमों पर अपनी प्रतिक्रिया को संयमित रखने का विकल्प चुना है ताकि सत्ताधारी सरकार के ध्रुवीकरण के दांव को हवा न मिले। कांग्रेस छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ अपने गठबंधन को मजबूत करने की भी कोशिश कर रही है, जो सीट बंटवारे के कारण अटका हुआ है। कांग्रेस और रायजोर डोल दोनों ही राज्य के अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों से समर्थन जुटाने को लेकर आशावादी हैं क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनावों में एआईयूडीएफ अपना खाता खोलने में विफल रही थी, जब मध्य और निचले असम के अल्पसंख्यक मतदाताओं ने कांग्रेस का समर्थन किया था।

असम में 2023 में हुए परिसीमन के मद्देनजर, विभिन्न दलों का अनुमान है कि अल्पसंख्यक मतदाताओं की निर्णायक भूमिका निभाने वाले निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या राज्य की 126 सीटों में से लगभग 35 से घटकर लगभग 23 हो गई है। इसके चलते चुनावी परिदृश्य बदल गया है और अन्य सीटों के लिए मुक़ाबला कड़ा हो गया है।

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