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जुगलबंदीः द बीजेपी बिफोर मोदी’ किताब पर बोले आशुतोष- अटल बिहारी वाजपेयी से अधिक सिद्धांतवादी हैं लालकृष्ण आडवाणी

आशुतोष ने लिखा है कि 'मैंने अपने करियर में कई नेताओं और हस्तियों का साक्षात्कार किया लेकिन वाजपेयी जी जैसा कोई नहीं।

आशुतोष ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए एक घटना का जिक्र भी किया है।

लेखक विनय सीतापति द्वारा लिखित किताब ‘JUGALBANDI: THE BJP BEFORE MODI’ पर पत्रकार आशुतोष ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। आशुतोष ने कहा है कि बीजेपी के नेता लालकृष्ण आडवाणी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से ज्यादा सिद्धांतवादी थे। अपनी बात के समर्थन में एक घटना का जिक्र करते हुए आशुतोष ने लिखा है कि ‘एक बार मैं अटल बिहारी वाजपेयी का साक्षात्कार कर रहा था। उस वक्त वाजपेयी रायसीना रोड में रहते थे। साक्षात्कार के बीच में उनके सेवादार उनके लिए समौसा और लड्डू लेकर आए। उस वक्त वाजपेयी जी अपनी स्टाइल में साक्षात्कार के दौरान सवालों का जवाब दे रहे थे। खाना देखने के बाद वो बीच में ही रुक गए और मुस्कुराते हुए उन्होंने मुझसे कहा कि अरे आशुतोष जी लड्डू खाइए…इंटरव्यू कुछ पल बाद भी हो सकता है। उस वक्त मैं युवा था और उनके इस चुंबकीय व्यवहार के बीच मैं फंस गया।’

आशुतोष ने लिखा है कि ‘मैंने अपने करियर में कई नेताओं और हस्तियों का साक्षात्कार किया लेकिन वाजपेयी जी जैसा कोई नहीं। मैंने लालकृष्ण आडवाणी का भी इंटरव्यू लिया लेकिन उनसे जुड़ी मेरी कोई यादें नहीं हैं…यहीं अंतर है वाजपेयी और आडवाणी में…यह दोनों मजबूत हिंदुत्ववादी विचारधारा के थे..अपनी किताब Jugalbandi: The BJP Before Modi में विनय सीतापति ने दोनों के बीच बातचीत करने अंतर के जरिए साल 1952 से 2004 के बीच हिंदुत्व के विकास पर रोशनी डाली है।

इस किताब पर अपनी राय देते हुए आशुतोष आगे कहते हैं कि जब 1950 में वाजपेयी और आडवाणी की राजनीति में एंट्री हुई तब उस वक्त नेहरू का युग था। उस वक्त दुनिया पर राष्ट्रियता, अंतराष्ट्रियता, धर्मनिरपेक्षता, प्रजातंत्र और आधुनिकता जैसे विचारधारों का राज था और दुनिया दो खेमों में बंटी हुई थी। आरएसएस प्रमुख एमएस गोलवल्कर की बातें तिरस्कार की भावना से सुनी जाती थीं। गांधी की हत्या के बाद हिंदुत्व को एक चेहरे की जरुरत थी जो खुद को भारत के लोग के सामने निर्दोष साबित कर सके। धोती पहनने वाले वाजपेयी संघ परिवार के आधुनिक नेता बने। उनकी सोच गोलवल्कर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीन दलाय उपाध्याय जैसी हुबहू बिल्कुल नहीं थी।

आडवाणी भी इसे रास्ते पर थे और वो भी एक मॉडर्न इंसान थे। उनकी पढ़ाई क्रिश्चन मिशिनरी स्कूल में हुई थी लेकिन वो आरएसएस की विचारधारा से बंधे थे। हालांकि आडवाणी, वाजपेयी की तरह ही आजाद ख्यालों के बने रहना चाहते थे लेकिन वो हिंदुत्ववादी विचारधारा से प्रभावित थे। आशुतोष आगे लिखते हैं कि साल 1991 की रथ यात्रा और साल 2005 में जिन्ना की समाधी पर मौजूद आडवाणी दोनों अलग-अलग थे। वाजपेयी की तरफ आकर्षित होना आसान था। हालांकि ऐसा आडवाणी के साथ मुश्किल लेकिन यह बात सच है कि आडवाणी, वाजपेयी से ज्यादा सिद्धांतवादी थे।

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