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आशुतोष का ब्‍लॉग: आरएसएस की अखंड भारत की सोच और हिटलर की पॉलिसी एक जैसी

बीजेपी के जनरल सेक्रेटरी और कभी राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के चेहरा रहे राम माधव ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान अखंड भारत के दबे सपने के बारे में बातचीत करके दुखती नस पर हाथ रख दिया। उनके इंटरव्यू की टाइमिंग बेहद खराब थी।

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बीजेपी के जनरल सेक्रेटरी और कभी राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के चेहरा रहे राम माधव ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान अखंड भारत के दबे सपने के बारे में बातचीत करके दुखती नस पर हाथ रख दिया। उनके इंटरव्यू की टाइमिंग बेहद खराब थी। यह एक ऐसे दिन सामने आया, जब पीएम नरेंद्र मोदी लाहौर पहुंचे थे। पाकिस्‍तान उलझन में था। दुनिया भी कन्‍फ्यूज थी। मोदी सरकार भी पशोपेश में थी। यह किस तरह की डिप्‍लोमेसी थी? एक तरफ पाकिस्‍तान से बंद पड़ी बातचीत को शुरू करने की कोशिश और दूसरी ओर पाकिस्‍तान को भारत से मिलाने के पुराने मकसद से उसे डराना। बीजेपी ने खुद को माधव के बयान से दूर कर लिया लेकिन नुकसान हो चुका था। दुनिया ने एक बार फिर आरएसएस का छिपा हुआ एजेंडा जाना।

राम माधव ने बाद में लिखा कि भारत, पाक और बांग्‍लादेश बल पूर्वक नहीं बल्‍कि लोकतांत्रिक ढंग से एक होंगे। माधव ने जिस बात का खुलासा नहीं किया वो यह है कि आरएसएस आज भी खुद को विभाजन को भुला नहीं पाई है। विभाजन जिसके लिए उसने मुसलमानों को ‘माफ’ नहीं किया। आरएसएस पाकिस्‍तान के खिलाफ नफरत पाले बैठा है, जो गाहे बगाहे उसके बयानों से पता भी चलता है। अगर उन्‍होंने मौका मिल जाए तो वे इस देश को दुनिया के नक्‍शे से मिला देंगे। वे ऐसा इसलिए करेंगे क्‍योंकि पाकिस्‍तान का अस्‍त‍ित्‍व आरएसएस और हिंदुत्‍व के उस तर्क के खिलाफ है, जिसके मुताबिक हिमालय से लेकर सिंधु नदी और समुद्र तक रहने वाले सभी लोग हिंदू हैं। यह क्षेत्र एक देश है और सभी एक ही वंश के हैं। आरएसएस की मानें तो यहां हम सभी सदियों से एक सभ्‍यता के तौर पर रह रहे हैं और हम सबकी जीवनशैली एक ही है। जो लोग इस्‍लाम या ईसाई बन गए, वे बाहर से नहीं आए, वे तो यहां वैदिक काल से रह रहे थे। वे भी हिंदू हैं। आरएसएस के मुताबिक, धार्मिक तौर पर अलग होने के बावजूद हम सभी की नसों में एक ही खून बहता है, इसलिए हम एक हैं और हमें एक साथ रहना चाहिए। इसी वजह से विभाजन भी हमारी सभ्‍यता के ढांचे पर एक चोट है।

आरएसएस की बेचैनी के बीच, अलगाववादी मुस्‍लिम नेताओं ने दो देशों के सिद्धांत को सफलतापूर्वक लोगों तक पहुंचाया। इससे आरएसएस के एक हिंदू राष्‍ट्र का तर्क खारिज हो गया। पाकिस्‍तान के लिए लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्‍क‍ि सांस्‍कृतिक थी। आरएसएस को लगता था कि गांधीजी शायद ‘हिंदुओं’ को विभाजन से बचा सकते थे, अगर वे बंटवारे के लिए तैयार नहीं होते। सावरकर भी इसी भावना से पीडि़त थे, जो गांधीजी की हत्‍या में उनकी कथित भूमिका की वजह बना। सावरकर के खिलाफ मामला चला लेकिन तकनीकी आधार पर वे दोषी साबित होने से बच गए। विभाजित भारत को दोबारा से एकजुट करना आरएसएस का अधूरा काम है। इसकी तुलना हिटलर की पॉलिसी से की जा सकती है।

हिटलर के प्रोपेगैंडा मिनिट जोसफ गोबल्‍स अक्‍सर ऑस्‍ट्र‍िया के बारे में कहते थे, ”यह देश हकीकत में देश नहीं है। इसके लोग हमारे हैं और हमारे पास आएंगे। विएना में हिटलर की एंट्री से एक दिन इस देश के लिए सबसे गर्व करने वाले क्षण आएंगे।” वहीं, हिटलर ने लिखा, ”ऑस्‍ट्र‍िया के जर्मन लोगों को अपने महान देश जरूर वापस लौट जाना चाहिए।” गोबल्‍स इसी तरह से चेकोस्‍लोवाकिया के बारे में भी बात करता था। 1930 के मध्‍य में नाजी पार्टी के लिए ग्रेटर जर्मनी एक उत्‍साह पैदा करने वाला आइडिया था, लेकिन इससे पूरी दुनिया में तबाही आई। इसी तरीके से आज के उग्र राष्‍ट्रवादी युग में अखंड भारत की सोच भी काफी प्रभावित करता है। इसके खिलाफ बोलने से शायद आप इंटरनेट पर यूजर्स के निशाने पर आए जाएं, लेकिन हकीकत यही है कि उप महाद्वीप में देशों की सीमाएं अनंत काल के लिए खींची जा चुकी हैं। इस बात को भूलना ही कई अनकहे दुर्भाग्‍य का कारण बनेगा। हिटलर की राष्‍ट्रवादी सोच जर्मनी के लिए खतरनाक थी। माधव जब अखंड भारत की बात करते हैं तो उसी तरह की कपकपी महसूस होती है।

लेखक पूर्व पत्रकार और आम आदमी पार्टी के प्रवक्‍ता हैं।

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