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अशोक गहलोत: आम ब‍िस्‍क‍िट के साथ कड़क चाय और कड़े फैसले लेने वाला जादूगर का बेटा

राजनीति के पैंतरों में माहिर अशोक गहलोत जादूगरी से अपना लगाव बयां कर चुके हैं। कई मंचों से उन्होंने बताया है कि अगर वह राजनीति में नहीं होते तो जादूगर ही रहते। लेकिन, सियासी तौर पर उनका मैजिक खूब चला है। इसी का नतीजा है कि वह आज कांग्रेस के मजबूत स्तंभों में से एक हैं।

कांग्रेस के कद्दावर नेता अशोक गहलोत पहले एक जादूगर थे, जो बाद में राजनीति के जादूगर बन गए. (एक्सप्रेस फोटो/ रोहित जैन पारस)

अशोक गहलोत ने तीसरी बार मुख्यमंत्री के तौर पर राजस्थान की कमान संभाली  हैं, जबकि सचिन पायलट उनके जूनियर यानी उप मुख्यमंत्री पद पर काबिज हुए हैं। विधानसभा चुनाव (11 दिसंबर, 2018) के परिणाम घोषित होने के बाद 14 दिंसबर को कांग्रेस आलाकमान ने इन दोनों नेताओं के नाम का एलान कर दिया था। इस तरह गहलोत ने राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर अपना जादू दिखाया है। दरअसल, अशोक गहलोत मूल रूप से पेशे से जादूगर थे। उनके पिता भी जादूगरी के व्यावसाय से घर-परिवार चलाते थे लेकिन, उन्होंने अपना असली जादू राजनीति में दिखाया और राजस्थान का सियासी नजरिया ही बदल डाला।

उस दौर में जब राजस्थान की राजनीति में जाट और ब्राह्मण नेताओं का बोलबाला था, तब माली परिवार से आने वाले गहलोत 1998 में पहली बार मुख्यमंत्री बने। उस दौरान कांग्रेस ने 8 साल से सत्ता में काबिज बीजेपी को धूल चटाई थी। उस दौरान बीजेपी के सीएम कद्दावर नेता भैरो सिंह शेखावत थे। मगर शेखावत के तिलिस्म को उन्होंने पांच साल की कोशिश में छू-मंतर कर दिया। यही वजह है कि जब पार्टी को पायलट और गहलोत में से किसी को चुनना था, तब भी गहलोत बाजी मार ले गए।

राजनीति के पैंतरों में माहिर अशोक गहलोत जादूगरी से अपना लगाव बयां कर चुके हैं। कई मंचों से उन्होंने बताया है कि अगर वह राजनीति में नहीं होते तो जादूगर ही रहते। लेकिन, सियासी तौर पर उनका मैजिक खूब चला है। इसी का नतीजा है कि वह आज कांग्रेस के मजबूत स्तंभों में से एक हैं। राजस्थान की राजनीति के साथ-साथ केंद्रीय नेतृत्व में भी उनका काफी दखल है।

उनके करीबी बताते हैं कि कद्दावर राजनीतिक हैसियत होने के बावजूद भी उन्हें सामान्य जीवन जीना अच्छा लगता है। वह अपनी गाड़ी में साधारण बिस्किट और सड़क किनारे खोखे पर कड़क चाय पीने के शौकीन हैं। मगर, दूसरी तरफ वह राजनीतिक प्रतिद्वदियों के लिए हमेशा एक पहेली रहे हैं। कहा जाता है कि वह अपने विरोधियों की हरकतों को ना तो भूलते हैं और ना ही माफ करते हैं। यही वजह है कि उनके विरोधियों ने काफी कीमतें अदा की हैं। पार्टी के भीतर धुर विरोधी रहे सीपी जोशी से भला बेहतर कौन समझ सकता है।

गहलोत का एक बयान काफी चर्चा में रहा। उन्होंने कहा था, “हर गलती की एक सजा होती है।” उन्होंने यह फार्मूला शासन से लेकर अपने विरोधियों के खिलाफ खूब आजमाया। हालांकि, उन्होंने यह बयान 2003 चुनाव हारने के बाद दिया था। तब वसुंधरा राजे के नेतृत्व में बीजेपी ने बाजी पलटी थी और राजे राजस्थान की गद्दी पर बैठी थीं। जब 2003 में चुनाव चल रहे थे तब उसके पहले प्रदेश में गेहूं की किल्लत और अकाल ने जनता को बेचैन कर दिया था। स्थित को सही तरीके से नहीं संभालने का खामियाजा उन्हें चुनाव में शिकस्त खाकर चुकानी पड़ी थी।

अशोक गहलोत अपनी शख्सियत में छवि को लेकर भी काफी सजग नज़र आते हैं। इसी का नतीजा था कि उन्होंने अपने बेटे को प्रदेश कांग्रेस कमेटी में भी धुर विरोधी सीपी जोशी के जरिए कराया। वही, दूसरी तरफ उनके कट्टर विरोधी महिपाल मदेरणा ने उनकी काफी फजीहत की। लेकिन, भंवरी देवी कांड में फंसकर मदेरणा खुद जेल चले गए। उनके विरोधी मानते हैं कि वह किसी पर भी यकीन नहीं करते हैं। लेकिन, उनकी राजनीतिक छवि ऐसी है कि जनता का भरोसा उन पर पूरा रहता है। यही वजह है कि वह खुल कर अपने दांव इस्तेमाल करते रहे हैं।

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