अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एस.वी.राजू ने गुरुवार को कहा कि जब अदालतें मूल अपराधों में आरोपियों को बरी कर देती हैं या उन्हें आरोप-मुक्त कर देती हैं तो ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) को ऐसे नतीजों को मामले का अंत नहीं समझना चाहिए, बल्कि उन्हें नए सिरे से जांच फिर से शुरू करनी चाहिए।
एएसजी एस वी राजू की ये बातें दिल्ली शराब नीति मामले से जोड़ कर देखी जा रही है। इस मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल भी आरोपी हैं। मामले में अभी मूल अपराधों और मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम के तहत कार्यवाही चल रही है।
दिल्ली शराब नीति से जोड़ी जा रही बात
27 फरवरी 2026 को दिल्ली की एक निचली अदालत ने दिल्ली शराब नीति मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य लोगों को सबूतों के अभाव में आरोप-मुक्त कर दिया था। हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने इन निष्कर्षों को प्रथम दृष्टया गलत पाया और सीबीआई की चुनौती पर सुनवाई 4 मई 2026 को होनी है।
भारत मंडपम में एक ‘ईडी डे’ लेक्चर में एएसजी राजू ने कई स्थितियों के जरिए समस्या को सामने रखा और कहा, सभी आरोपियों का बरी होना, ट्रायल से पहले ही केस से बरी होना और यहां तक कि कोर्ट द्वारा चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार करना। उन्होंने तर्क दिया कि हर स्थिति में पीएमएलए के तहत कार्यवाही को अपने-आप बंद करने के बजाय, एक रणनीति की जरूरत होती है।
राजू ने पूछा, “हम हमेशा कहते हैं मनी लॉन्ड्रिंग अपने आप में एक अलग अपराध है तो फिर जब मूल अपराध खत्म हो जाता है, तो यह भी क्यों खत्म हो जाता है? फिर उन्होंने खुद ही जवाब देते हुए कहा, मौजूदा कानून के मुताबिक, यह अपराध से हासिल संपत्ति के अस्तित्व से जुड़ा है, जो बदले में एक शेड्यूल किए गए या अपराध पर निर्भर करता है।” उन्होंने कहा, “बिना किसी शेड्यूल किए गए अपराध के मनी लॉन्ड्रिंग हो ही नहीं सकती।”
ED का केस भी खत्म हो जाता है- एएसजी
इस निर्भरता की वजह से कोर्ट उन पीएमएलए मामलों को रद्द कर देते हैं, जहां मूल अपराध जैसे कि बीएनएस की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का बनना साबित नहीं हो पाता। उन्होंने कहा, अगर कोर्ट कहता है कि धारा 420 के तहत कोई अपराध नहीं हुआ है, तो फिर मनी लॉन्ड्रिंग का मामला भी नहीं बनता। इसी तरह मूल अपराध में सभी आरोपियों के पूरी तरह बरी हो जाने पर ईडी का केस भी खत्म हो जाता है।
एएसजी राजू ने गुण-दोष के आधार पर बरी होने और न्यायिक रूप से केस बंद होने के अन्य तरीकों के बीच में एक अंतर बताया। उन्होंने कहा कि कोर्ट अगर मानता है कि मूल अपराध हुआ है लेकिन सबूतों की कमी के कारण आरोपी को बरी कर देता है तो फिर सवाल उठता है कि क्या मनी लॉन्ड्रिंग का केस भी जरूरी तौर पर खत्म हो जाना चाहिए। इस तरह उन्होंने कानून में बदलाव की गुंजाइश का संकेत दिया।
एएसजी राजू ने माना कि आजकल आम राय यह है कि अगर सभी आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया जाए तो पीएमएलए की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकती। फिर उन्होंने तर्क दिया कि इस पर और गहराई से विचार किया जाना चाहिए।
ईडी को चुनौती देनी चाहिए- एएसजी
उन्होंने इसी तर्क का जांच एजेंसियों द्वारा दायर की गई क्लोजर रिपोर्ट पर भी लागू किया। ऐसे में मामलों का हवाला देते हुए जहां केस इसलिए बंद कर दिए गए क्योंकि आरोपी का पता नहीं चल पाया था, एएसजी राजू ने कहा कि ऐसे नतीजों का मतलब यह जरूरी नहीं है कि कोई प्रेडिकेट ऑफेंस हुआ ही नहीं था। उन्होंने कहा, “ईडी को इसमें दखल देना चाहिए और एजेंसी पर आरोपियों के साथ मिलीभगत का आरोप लगाते हुए उसे चुनौती देनी चाहिए।”
अदालतों द्वारा प्रेडिकल ऑफेंस का संज्ञान लेने से इनकार करने के मामलों में अक्सर मंजूरी न मिलने के कारण एएसजी राजू ने जोर देकर कहा कि ऐसे आदेश अपराध के मेरिट पर कोई फैसला नहीं होते।
उन्होंने लिमिटेशन पीरियड जैसी तकनीकी बाधाओं की ओर भी ध्यान दिलाया। ऐसे अपराधों में जिनके दो साल तक की सजा हो सकती है, शिकायतें तीन साल के भीतर दायर की जानी चाहिए, ऐसा न करने पर वे टाइम-बार्ड हो जाती हैं।
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प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के एक कारोबारी जॉय एस कामदार को जमीन हड़पने और मनी लांड्रिंग के एक मामले में गिरफ्तार कर लिया है। सन इंटरप्राइजेज के मैनेजिंग डायरेक्टर जॉय एस कामदार पर शेल कंपनी के जरिए लगभग 1100 करोड़ रुपये के अवैध लेनदेन में मदद करने का आरोप है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
