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आसाराम केस: जानिए कौन हैं वो वकील जो सुब्रमण्‍यम स्‍वामी, केटीएस तुलसी, सलमान खुर्शीद जैसों पर भी पड़े भारी

Asaram Bapu Rape Case Verdict (आसाराम बापू रेप केस वर्डिक्ट फैसला): इस केस से पीसी सोलंकी की प्रतिबद्धता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उन्होंने इस पूरे मामले में कोई फीस नहीं ली।

आसाराम की फाइल फोटो।

आसाराम को जेल में भिजवाने के पीछे सालों तक वकीलों की एक टीम लगी रही, जिन्होंने मिशन की तरह इस केस को लड़ा। आसाराम ने अपनी अकूत संपत्ति का इस्तेमाल करते हुए खुद को बचाने के लिए देश के नामी वकीलों की फौज खड़ी कर दी। आसाराम की ओर से बीजेपी सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी, कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद और केटीएस तुलसी, रामजेठमलानी जैसे दिग्गजों ने पैरवी की। लेकिन इंसाफ का तराजू आखिरकार सत्य की ओर की ही झुका। इस केस को अंजाम तक पहुंचाने में पीड़िता के वकील पीसी सोलंकी और प्रमोद वर्मा का अहम रोल रहा। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक पीसी सोलंकी को इस केस से किनारा करने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन दिये गये। उन्हें धमकियां भी मिली लेकिन उनका फोकस पीड़िता को इंसाफ दिलाने पर रहा। वह धमकियों ने ना विचलित हुए ना ही लालच उनका ईमान खरीद पाया। सोलंकी बताते हैं कि वह जनवरी 2014 में इस केस से जुड़े। सोलंकी बताते हैं कि जब उनके हाथ में यह केस आया तो उन्होंने तय किया कि वकालत के पेशे में कुछ ऐसा कर जाएं जिसका संतोष उन्हें ताउम्र रहे। सोलंकी साहब आसाराम की बाकी जिंदगी को जेल में गुजारने के अदालत के फैसले को अपनी आत्मिक संतुष्टि कहते हैं और इसे जीवन का सबसे बड़ा तोहफा मानते हैं।

इस केस की पैरवी करने के लिए उन्हें कई बार शॉर्ट नोटिस पर पैरवी के लिए दिल्ली आना पड़ता। लेकिन धमकियों को ध्यान में रखकर वह ना तो होटल में रुकते और ना ही कार से चलते। हमेशा उन्होंने मेट्रो का सहारा लिया और धर्मशाला में रुके। जैसे-जैसे केस से वीआईपी वकील जुड़े मामले को प्रचार मिला, पर उनका विश्वास नहीं डिगा, उन्हें यकीन था कि फैसला तथ्यों और कानून की किताब के मुताबिक ही होगा। इस केस से पीसी सोलंकी की प्रतिबद्धता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उन्होंने इस पूरे मामले में कोई फीस नहीं ली।

पीड़िता के दूसरे वकील प्रमोद वर्मा बताते हैं कि जिस तथाकथित धर्मगुरु को लोग ‘भगवान’ मानते थे उसे बेनकाब करना जरूरी था। प्रमोद वर्मा के मुताबिक बचाव पक्ष ने केस को लंबा करने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए। पीड़िता से अदालत में तीन महीने तक जिरह की गई। इस दौरान पीड़िता ने वही कहानी अदालत को बताई जो उसने पहले दिन पुलिस को कहा था। इस बयान में कहीं हेर-फेर नहीं था। प्रमोद वर्मा के मुताबिक अगर लड़की के बयान में जरा भी तब्दीली होती तो बचाव पक्ष उसे झूठा साबित कर देता। इस केस के इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर ने भी एक साल तक मामले की जांच की, लेकिन इस दौरान भी पीड़िता के बयान में कोई बदलाव देखने को नहीं मिला। प्रमोद वर्मा कहते हैं कि हर दिन कोर्ट में उनके सामने नया चैलेंज होता और वह सबूतों के आधार पर उसे निराधार साबित करते। प्रमोद वर्मा ने भी इस केस में पीड़ित परिवार से कोई फीस नहीं लिया, सिर्फ खर्चे के ही पैसे लिये। प्रमोद वर्मा कहते हैं कि दो गवाहों की हत्या के बावजूद इस केस को अंजाम तक पहुंचाना ऐतिहासिक है।

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