scorecardresearch

क्या अभी और भड़केगी ‘आप की आग’

अब तो यह तय सा लगने लगा है कि आम आदमी पार्टी (आप) का विवाद योजनाबद्ध तरीके से बढ़ाया जा रहा है। अन्यथा चार मार्च की शाम राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में बहुमत से राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से हटाने के बावजूद योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के सकारात्मक रुख के बाद मामले को […]

आम आदमी पार्टी,अरविंद केजरीवाल,राजेश गर्ग,केजरीवाल का स्टिंग,योगेंद्र यादव,प्रशांत भूषण,Aam Aadmi Party,Arvind Kejriwal,AAP politics,Yogendra Yadav,Prashant bhushan,AAP sting
पार्टी के पूर्व विधायक राजेश गर्ग ने पार्टी प्रमुख केजरीवाल के खिलाफ एक टैप जारी कर दिया जिससे नाराज होकर महाराष्ट्र में आप का चेहरा अंजलि दमानिया ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया।

अब तो यह तय सा लगने लगा है कि आम आदमी पार्टी (आप) का विवाद योजनाबद्ध तरीके से बढ़ाया जा रहा है। अन्यथा चार मार्च की शाम राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में बहुमत से राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से हटाने के बावजूद योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के सकारात्मक रुख के बाद मामले को दबा दिया जाना चाहिए था। लेकिन वरिष्ठ नेता मयंक गांधी के कार्यकर्ताओं के नाम लिखे खुले पत्र के पांच दिन बाद पार्टी के चार बड़े नेताओं ने वह सब सार्वजनिक कर दिया जिसकी केवल बैठक में चर्चा होनी थी। उनमें केवल अधिकृत पंकज गुप्ता थे जबकि पत्र उनके अलावा उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, मंत्री गोपाल राय और संजय सिंह के नाम से जारी किया गया है।

पत्र की भाषा ऐसी है जिससे साफ है कि कोई सुलह-सफाई की बात नहीं होने वाली है। इतना ही नहीं इसे लंबी और निर्णायक लड़ाई बनाने के संकेत भी साफ मिलने लगे हैं।

पार्टी के पूर्व विधायक राजेश गर्ग ने पार्टी प्रमुख केजरीवाल के खिलाफ एक टैप जारी कर दिया जिससे नाराज होकर महाराष्ट्र में आप का चेहरा अंजलि दमानिया ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। बेवजह इस लड़ाई में विधायकों को शामिल किया जा रहा है जिसके दूरगामी और खतरनाक परिणाम पार्टी को भुगतने पड़ेंगे।

प्रचंड बहुमत से 14 फरवरी को सरकार बनाने वाली आप के विधायकों पर इस झगड़े की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। बावजूद इसके उन पर दबाव डाल कर योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के खिलाफ दस मार्च को सार्वजनिक किए गए पत्र के समर्थन में और प्रशांत भूषण, उनके पिता शांति भूषण और योगेंद्र यादव को पार्टी से निकलवाने के लिए हस्ताक्षर करवाए जा रहे हैं। अब तक 67 में से करीब 60 के हस्ताक्षर हो चुके हैं। विधायकों में संभावित टूट-फूट को रोकने के लिए परंपरा तोड़ कर 15 संसदीय सचिव बनाए जा रहे हैं। इनके अलावा विभिन्न बोर्ड और संस्थाओं के उन्हें पद देने के प्रस्ताव दिए गए हैं। दिल्ली महिला आयोग और दिल्ली खादी और ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष के पद को लाभ का पद न मानते हुए उस पर विधायक की नियुक्ति हो सकती है। इसके अलावा बाकी पदों पर नियमों में संशोधन करके नियुक्ति की जा सकती है। दिल्ली में मुख्यमंत्री समेत सात ही मंत्री हो सकते हैं।

पूर्व सरकारों में भी संसदीय सचिव नियुक्त किए गए थे। उन्हें दफ्तर, गाड़ी आदि मिलता था लेकिन कोई भत्ता नहीं। शीला दीक्षित ने बाद में एक के बजाए तीन संसदीय सचिव बना दिए थे। लेकिन 15 बनाने की बात पहली बार सामने आई है। वैसे दिल्ली जल बोर्ड उपाध्यक्ष, डीडीए सदस्य, जिला विकास समिति के अध्यक्ष, विधानसभा की विभिन्न कमेटियों के प्रमुख आदि तमाम पद पहले से ही हैं जिन पर विधायकों की नियुक्ति होती है।

पढ़ें: वह 8 कारण जिसने उड़ा दिए योगेंद्र यादव, शांति और प्रशांत भूषण के होश 

यह भी कहा जा रहा है कि मंत्रिमंडल में किसी महिला को मंत्री न बनाने या सबसे कम सक्रिय दलित विधायक और सबसे ज्यादा पैसे वाले अल्पसंख्यक विधायक को मंत्री बनाने के अलावा दिल्ली देहात से किसी को मंत्री न बनाने जैसे मुद्दों को लोग पहले से ही हवा दे रहे हैं। मयंक गांधी इस पर निशाना साध चुके हैं। अरविंद केजरीवाल के बाद नंबर दो माने जाने वाले चार नेताओं ने प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव पर पार्टी और केजरीवाल को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए, उसके बाद तो किसी बातचीत की भी कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है।

यह तय सा लगने लगा है कि 28 मार्च की राष्ट्रीय परिषद की बैठक तक ऐसा माहौल बना दिया जाए कि वे दोनों खुद पार्टी छोड़ दें अन्यथा उस बैठक में उन्हें निकाला जाएगा। इसके संकेत चार मार्च की बैठक में दे दिए गए थे। कार्यकारणी के ज्यादातर सदस्यों की राय थी कि दोनों नेताओं के खुद इस्तीफा देने या बिना अधिकार दिए उन्हें पीएसी में बनाए रखने का विकल्प देने से लेकर सभी को इस्तीफा देकर नई पीएसी बनाने का अधिकार पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल को सौंपने पर सहमति बनाई जाए।

लेकिन यह मंजूर नहीं किया गया। मनीष सिसोदिया बैठक से बाहर गए। बाहर आशुतोष, आशीष खेतान और दिलीप पांडेय से बात की और बताया गया कि केजरीवाल से फोन पर बात करके खुला मतदान करवाने का प्रस्ताव किया जिसका संजय सिंह समेत अनेक लोगों ने समर्थन किया। जिस तरह का माहौल बनाया गया है उसमें तो यही लग रहा है कि जो भी केजरीवाल के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं उन्हें पार्टी बाहर का रास्ता दिखाएगी चाहे यादव और प्रशांत भूषण या मयंक गांधी हों या उन्हें वोट देने वाले आनंद कुमार, अजीत झा, राकेश सिन्हा, सुभाष वारे, यशवंत गुप्ता और क्रिस्तीना सैमी। यह संख्या कहीं ज्यादा न हो जाए और इस लपेटे में कई विधायक न आ जाएं।

योगेंद्र और प्रशांत केवल आप के दो नेताओं के नाम नहीं हैं। पार्टी की बुनियाद रखने से लेकर पूरे देश में इसकी पहचान बनाने में इनका अहम योगदान है। यह भी कहा जा रहा है कि कार्यकारिणी की बैठक में चार लोगों ने प्रस्ताव के समर्थन में केवल इसलिए वोट किया कि उन्हें अंदेशा था कि इस प्रस्ताव के न पास होने से अरविंद केजरीवाल का पार्टी संयोजक बने रहना कठिन हो जाएगा।

विवाद की शुरुआत लोकसभा चुनाव के समय से ही शुरू हो जाने के बावजूद यादव और भूषण उसे ढकने में लगे थे। इन लोगों के प्रयास से जो लोग जुड़े वे वैचारिक रूप से भी केजरीवाल के कई खास लोगों से अलग हैं। अब तो यह भी लगने लगा है कि कहीं यह विचारधारा की लड़ाई में न बदल जाए। दागदार लोगों को टिकट देने का भारी विरोध हुआ। यह मुद्दा चार मार्च को भी प्रशांत भूषण ने उठाया।

चुनाव में दो करोड़ रुपए कालाधन का मुद्दा भी उठा। चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने की मांग हुई। यह साफ हो गया कि कार्यकारिणी में जो कुछ हुआ वह केजरीवाल की सहमति से हुआ और मंगलवार को जो पत्र सार्वजनिक किया गया वह भी उनकी जानकारी में हुआ। कार्यकारिणी के बैठक के दिन वे पूरे समय दिल्ली सचिवालय में रहे लेकिन बैठक में आकर सीधे बात करना उन्होंने जरूरी नहीं समझा। वें बंगलूर से दस दिन का उपचार करवाकर रविवार को दिल्ली लौटने वाले हैं।

केजरीवाल ने 14 फरवरी को रामलीला मैदान में शपथ लेते हुआ घमंड न करने की सलाह दी थी। पार्टी में जो चल रहा है उसे कुछ लोगों के घमंड का ही परिणाम माना जा रहा है। सरकार ने अभी ढंग से अपने काम की शुरुआत भी नहीं की है। बेहतर दिल्ली बनाने के लिए दिल्ली के 54 फीसद लोगों ने पहली बार किसी एक पार्टी का साथ दिया है। लाखों लोगों के सपने इस सरकार से जुड़े हैं। चाहे जो दावे किए जाएं, लेकिन इस कलह का असर तो पार्टी के साथ सरकार पर भी हो ही रहा है। ऐसे में पार्टी में मचा घमासान लोगों के अरमानों को तोड़ने वाला साबित होगा। पहले तो लगता यही था कि केजरीवाल आगे बढ़कर अपने पुराने वरिष्ठ साथियों प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव आदि को मना लेंगे। अब ऐसा होने की उम्मीद कम लग रही है।

 

मनोज मिश्र

पढें नई दिल्ली (Newdelhi News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.

अपडेट

X