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अग्निपरीक्षा चेहरे और मुखौटे की

किसी को दिल्ली का चुनावी बादशाह दिल्ली में जीत का ठग लग रहा है। कोई लोकतंत्र की हत्या करार दे रहा है तो कोई जनतंत्र पर हावी सत्ताधारी राजनीति को आईना दिखाने वाली राजनीति का पटाक्षेप देख रहा है। सीधे-सीधे यह कोई नहीं कह रहा है कि आम आदमी पार्टी का प्रयोग तो राजनीतिक विचारधाराओं […]

Author March 31, 2015 12:18 pm
दिल्ली का चुनावी बादशाह दिल्ली में जीत का ठग लग रहा है! (फोटो: प्रवीण खन्ना)

किसी को दिल्ली का चुनावी बादशाह दिल्ली में जीत का ठग लग रहा है। कोई लोकतंत्र की हत्या करार दे रहा है तो कोई जनतंत्र पर हावी सत्ताधारी राजनीति को आईना दिखाने वाली राजनीति का पटाक्षेप देख रहा है। सीधे-सीधे यह कोई नहीं कह रहा है कि आम आदमी पार्टी का प्रयोग तो राजनीतिक विचारधाराओं को तिलांजलि देकर पनपा है। जहा राजनेता तो है ही नहीं। जहां समाजवादी-वामपंथी या राइट-लेफ्ट का सोच है ही नहीं। जहां राजनीतिक धाराओं को दिशा देने का सोच है ही नहीं। यहां तो शुद्ध रूप से अपना घर ठीक करने का सोच है।

संयोग से इस घर का मतलब दिल्ली है जहां संघर्ष के लिए उठे हाथों को राजधानी ने नहीं थामा बल्कि यह नगरी उठे हुए हाथ में बदल गई। उसने उस सत्ता को हरा दिया जो शुद्ध राजनीतिक पार्टियां हैं। लेकिन सत्ता को हराने के बाद भी सत्ता का चरित्र बदलता नहीं है या जीत का सेहरा पहनते ही सत्ता चरित्र में उतरना पड़ता है। अब केजरीवाल ने खुद को सत्ता माना है तो दिल्ली के सवालों को सुलझाते वक्त सत्ता चरित्र बदलेगा कैसे?


अगर दिल्ली के वोटरों की सत्ता को हराने की समझ ने केजरीवाल को सत्ता थमा दी तो वे राजनीति के कीचड़ से सने हुए दिखाई क्यों नहीं देगें। केजरीवाल की समझ कैसे पूर्व की पारंपरिक सत्ता से अलग होती है, इसका इंतजार और फैसला तो वाकई अब 2020 में ही होना है। लेकिन यह सवाल इस मायने में अहम है कि सत्ता का नया चेहरा केजरीवाल गढ़ेंगे कैसे। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण से लेकर लोकपाल एडमिरल रामदास के खिलाफ खुली और हंगामेदार कार्रवाई ने संकेत दे दिए कि केजरीवाल ‘निंदक नियरे राखिए’ को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है।

केजरीवाल राजनेता नहीं हंै इसलिए 2013 में दिल्ली का मुख्यमंत्री बनकर भी मुख्यमंत्री की तरह नजर नहीं आते हैं। 2014 में लोकसभा चुनाव हारकर सामाजिक तानों को सह नहीं पाते और फिर दिल्ली की गद्दी तिकड़मों से पाने की जुगाड़ करते हैं। और 2015 में दिल्ली में ऐतिहासिक जीत हासिल करने के महीने भर के भीतर ही तानाशाह बनकर अपनी सत्ता को बिना अवरोध बनाने से हिचकते भी नहीं हैं।

यानी राजनीतिक खेल का ऐसा खुलापन कभी कोई राजनेता करेगा यह संभव नहीं है। जो काम खामोशी से हो सकता हो, उसे हंगामे के साथ गली-मोहल्ले की तर्ज पर पूरा करने के रास्ते पर अगर केजरीवाल चल निकले हंै तो संकेत साफ है कि वे राजनीतिक वर्ग से खुद को अलग करना-दिखना चाह रहे हंै। वे हर सियासी चाल को खुले तौर पर हंगामे के साथ दिखाना चाहते हैं।

सत्ता को लेकर जो गुस्सा और आक्रोश हाशिए पर ढकेल दिए गए लोगों में है, उसके साथ केजरीवाल तभी खडेÞ हो सकते हैं जब सत्ता चरित्र ही उन्हें खारिज कर दे। ध्यान दें तो मौजूदा राजनीति में प्रधानमंत्री ही नहीं बल्कि हर राज्य का मुख्यमंत्री और कमोबेश हर राजनीतिक दल का नेता किसानों से लेकर कारपोरेट और स्वदेशी से लेकर विदेशी निवेश तक, किसी भी मुद्दे पर लंबा-चौड़ा बखान करने में वक्त नहीं लेंगे।

लेकिन किसान को सब्सिडी कैसे मिलेगी, समर्थन मूल्य उत्पादन खर्च से ज्यादा कैसे मिलेगा और कारपोरेट की लूट कौन बंद करेगा। विकास का ढांचा ज्यादा उत्पादन या उत्पादन से ज्यादा लोगों के जुड़ाव से तय कैसे होगा, इस पर भी हर सत्ता खामोश हो जाएगी।

केजरीवाल का रास्ता किस दिशा में जाएगा यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन सीधे तौर पर कारपोरेट इकॉनामी पर अंगुली उठाना ही नहीं बल्कि प्राथमिकी दर्ज कराना और सत्ता से हारे हुए तबको के लिए सुविधाओं की पोटली खोलना एक नई राजनीति का आगाज है। या फिर जिस वैचारिक राजनीति की पीठ पर सवार होकर बौद्धिक तबका अकसर हाशिए पर पड़े तबकों के लिए राजनीतिक लकीर खींचना चाहता है, उसे सरेआम पीटकर केजरीवाल ने पहली बार यह संकेत दे दिए कि उनकी राजनीति उस मध्यम वर्ग की नहीं है जहां घर के भीतर झगड़े को पत्नी, पति से पिटाई के बाद भी मेहमान के आते ही छुपा लेती है।

केजरीवाल की राजनीति तो उस झोपड़पट्टी की है जहां पति-पत्नी का झगड़ा बस्ती में खुले तौर पर चलता है। और पत्नी भी पति को दो-दो हाथ लगाती है, और छुपाया किसी ने नहीं जाता। बराबरी का हक, बराबरी का व्यवहार।

दिल्ली की बस्तियों में रहने वाले लोगों को केजरीवाल ने ताकत नहीं दी बल्कि केजरीवाल को दिल्ली की बस्तियों में रहने वाले लाखों वोटरों ने ताकत दी। यह राजनीतिक प्रयोग दूसरे राज्य में हुआ नहीं है। सबसे बेहतर मिसाल तो महाराष्ट्र चुनाव में बारामती की है। वहां से अजित पवार चुनाव सबसे ज्यादा अंतर से उस हालत में जीत गए जब प्रधानमंत्री मोदी ने बारामती जाकर उन्हें भ्रष्ट कहा। साठ हजार करोड़ के सिंचाई घोटाले में अजित पवार का नाम भाजपा ने पूरे चुनाव प्रचार में लिया। लेकिन महीने भर पहले अजित पवार के साथ महाराष्ट्र के सीएम और पीएम तक उसी बारामती के एक प्रोजेक्ट में अजित पवार के साथ मंच पर बैठे।

सत्ता इसे प्रोटोकाल कह सकती है। आने वाले वक्त में सियासत की जरूरत उन्हें एक साथ भी कर सकती है। लेकिन केजरीवाल क्या इनसे अलग चेहरा बना पाएंगे। या फिर केजरीवाल सत्ता के जिस नए चेहरे को गढ़ना चाह रहे है असल में वह मुखौटे से इतर कुछ भी नहीं। ध्यान दें तो जिस दिन योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा था, उसी दिन केजरीवाल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिल रहे थे। इससे पहले नीतीश जेल जाकर चौटाला से मिल चुके थे। यानी नीतीश राजनीति साधने निकले थे और केजरीवाल आप के भीतर मची धमाचौकड़ी से ध्यान बंटाने के लिए उनसे बेहिचक मिले।

केजरीवाल को लेकर असल सवाल यहीं से शुरू होता है कि जब मनमोहन कैबिनेट के दागी मंत्रियों से लेकर तब के भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को कटघरे में खड़ा करने की बात थी, तब उन्हें प्रशांत-योगेंद्र की दरकार थी। जब रिलायंस-वाड्रा को घेरा तब भी प्रशांत भूषण की जरूरत थी। उसी वक्तआम आदमी पार्टी की छवि देश में गढ़ी जाने लगी थी। इसे प्रचार-प्रसार में वैचारिक तौर पर वही चेहरे मजबूती दे रहे थे जो अब निकाले गए हैं।

जब बनारस में मोदी को हराने के लिए केजरीवाल निकले तब योगेंद्र और प्रशांत भूषण से लेकर प्रो आंनद कुमार और अजीत झा सरीखेलोगों ने ही समाजवादी-वामपंथी चिंतन तले वैचारिक आवाज दी। केजरीवाल बनारस में हारे जरूर, लेकिन उनकी छवि मौलाना मुलायम और लालू यादव ही नहीं बल्कि कांग्रेस से भी ज्यादा मजबूत बनी।

केजरीवाल की छाती पर लोकपाल से आगे के कई वैसे तमगे खुद-ब-खुद लगते चले गए जिसे वामपंथी अपने संघर्ष में गंवा बैठे थे और समाजवादी अपनों से ही लड़-भिड़ कर कभी ले नहीं पाए। सिर्फ केजरीवाल ही नहीं, योगेंद्र और प्रशांत भी जो कामयाबी अपने वैचारिकी के आसरे इससे पहले नहीं पा सके, उसे आप के संघर्ष ने सामूहिक तौर पर हर किसी को मान्यता दे दी। इसलिए जीत कभी आम आदमी पार्टी की नहीं हुई बल्कि आम जनता की हुई जो हाशिए पर है।

हाशिए पर ढकेली जा चुकी जनता ने ही दिल्ली में केजरीवाल को ताकत दी। अब इसे कोई सत्ता मानकर चले तो फिर सत्ता चरित्र हर चेहरे को मुखौटा करार देने में कितना वक्त लगाएगा। इंतजार कीजिए , क्योंकि अग्निपरीक्षा तो चेहरे और मुखौटे की है। ।

पुण्य प्रसून वाजपेयी, (टिप्पणीकार आजतक से संबद्ध हैं)

 

 

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