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बुनियादी बदलावों से शुरुआत करे आप

प्रचंड बहुमत से दिल्ली विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद शनिवार को ऐतिहासिक रामलीला मैदान में दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे आम आदमी पार्टी (आप) के नेता अरविंद केजरीवाल के सामने वादों का पहाड़ खड़ा है। उनके लिए पिछली 49 दिनों की सरकार से आगे बढ़ने और दिल्ली की बुनियादी चीजों में […]

Author Published on: February 14, 2015 9:15 AM

प्रचंड बहुमत से दिल्ली विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद शनिवार को ऐतिहासिक रामलीला मैदान में दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे आम आदमी पार्टी (आप) के नेता अरविंद केजरीवाल के सामने वादों का पहाड़ खड़ा है। उनके लिए पिछली 49 दिनों की सरकार से आगे बढ़ने और दिल्ली की बुनियादी चीजों में बदलाव का अवसर है। शपथ लेने से पहले पिछली बार के जनलोकपाल की तरह दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाने की प्राथमिकता बताकर केजरीवाल ने फिर से पुराने संघर्ष के रास्ते पर चलने के खतरनाक संकेत दिए हैं।

दिल्ली देश की राजधानी है। इस नाते यहां शुरू से ही बहुशासन प्रणाली है। जो चीजें सोलह आने दिल्ली सरकार के अधीन हैं उनमें ही तमाम सुधार की जरूरत है। अगर केजरीवाल की टीम वहीं से शुरुआत करे तो यह जनआकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में अच्छी शुरुआत हो सकती है। बिजली, पानी सस्ता करने से लेकर उनकी आपूर्ति में सुधार से लेकर दिल्ली सरकार के स्कूलों, अस्पतालों की हालत सुधारने के साथ-साथ जनता की सीधी जरूरतों के विभाग-परिवहन, राशन आदि को भ्रष्टाचार रहित बनाने की शुरुआत हो सकती है।

दिल्ली सरकार के विभागों में बाधा रहित बदलाव की शुरुआत करने के बाद स्वशासी दिल्ली के तीनों निगमों और केंद्र के अधीन के विभागों-पुलिस और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) में बदलाव के लिए केंद्र पर दबाव डाला जा सकता है।

दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए तो लंबे संघर्ष से लेकर सीधे केंद्र सरकार से टकराव लेना पड़ सकता है। उसकी तैयारी ठीक से करनी होगी। जिस तरह का जनादेश उन्हें मिला है उसमें वे काम करने के बजाए आंदोलन करेंगे तो उनके समर्थक जल्द आहत होंगे।

पिछली 49 दिनों की सरकार और इस सरकार में जमीन-आसमान का अंतर है। पिछली बार आप को विधानसभा में बहुमत नहीं था। तब अपनी जिद पर छुट्टियों के दिन विधानसभा की बैठक बुलाना, खुले में विधानसभा की बैठक बुलाने की जिद करना या शनिवार को छुट्टी के दिन रामलीला मैदान में शपथ लेने जैसी घोषणा के मायने केवल सांकेतिक हैं। निकट भविष्य में दिल्ली में तो कोई चुनाव नहीं होने वाले हैं और अगले साल होने वाले दूसरे राज्यों के चुनाव में भागीदारी अभी आप की प्रथमिकता नहीं बताई जा रही है।

अब तक केजरीवाल और उनके प्रमुख सहयोगी मनीष सिसोदिया को अधिकारियों ने दिल्ली की वित्तीय हालत का ब्योरा दे दिया होगा। कुल 36-37 हजार करोड़ के बजट में सरकार के पास ज्यादा कुछ तुरंत नया करने की गुंजाइश नहीं है। पहले से ही दिल्ली जल बोर्ड, दिल्ली परिवहन निगम, दिल्ली मेट्रो, दिल्ली नगर निगम को दिए जाने वाले पैसों को कम करना आसान नहीं है। इतना ही नहीं राजस्व वसूली की दर दस फीसद से घट कर छह फीसद रह जाना भी नई सरकार के लिए कम चुनौती नहीं रहने वाली। केजरीवाल ने बिना छापा मारे राजस्व वसूली में बढ़ोतरी के दावे चुनाव प्रचार में किए थे।

यह आदर्श स्थिति है लेकिन आसान नहीं है। दिल्ली में भाजपा की 1993 में बनी सरकार का बिक्री कर की दर कम करने का फार्मूला कारगर हुआ था। लेकिन अब शायद ही आला अफसर इसके लिए तैयार हो पाएं। कुछ चीजें तो हर सरकार को ढोनी पड़ती है। पहले खर्च से ज्यादा राजस्व वसूली के बावजूद केंद्रीय बचत योजनाओं का पैसा दिल्ली सरकार को लेना पड़ता था। उसके लिए कई हजार करोड़ ब्याज देना पड़ता था। अब आमदनी घटने पर इस तरह की योजना से मिले 32 हजार करोड़ का उपयोग सरकार कई गैर योजना मदों पर करके हर साल करीब पांच हजार करोड़ रुपए केंद्र सरकार को ब्याज दे रही है। 400 यूनिट तक बिजली की दर आधा करने या पानी एक सीमा तक सस्ता करने के लिए तो अतिरिक्त धन चाहिए ही, चुनावी वादे पूरे करने के लिए काफी बड़ी रकम सरकार को चाहिए। इसलिए जरूरत उन वादों पर आराम से अमल करने की है जो सीधे दिल्ली सरकार के अधीन है।

आजादी के बाद 1952 में दिल्ली को पहले कम अधिकारों वाली विधानसभा दी गई थी। लेकिन केंद्र के समानांतर सत्ता बन जाने के कारण दूसरे बहाने से उसे खत्म कर दिया गया। फिर 1958 में नगर निगम और 1967 में महानगर परिषद बना। लंबे आंदोलन के बाद 1993 में पुलिस (दिल्ली पुलिस) और जमीन (डीडीए) के बिना विधानसभा दी गई। दिल्ली के वीआइपी इलाके यानी एनडीएमसी और दिल्ली छावनी के इलाकों को इससे अलग रखा गया।

नगर निगम भी अलग रखा गया। शीला दीक्षित के प्रयासों के बाद 2011 में दिल्ली नगर निगम को तीन हिस्सों में बांट तो दिया गया लेकिन उसे सीधे दिल्ली सरकार के अधीन नहीं किया गया। दिल्ली के शहरी विकास विभाग के माध्यम से उस पर दिल्ली सरकार का अप्रत्यक्ष नियंत्रण है। दिल्ली की सरकार ने अपने प्रयासों से निगम से बिजली, पानी, परिवहन, दमकल, सीवरेज और बड़ी सड़कें अपने अधीन किया। लेकिन जब दिल्ली और केंद्र में टकराव की नौबत आई तो केंद्र ने अपने अधिकार कम नहीं होने दिए।

भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने तो सरकार जाते हुए चाहे दिखावे के लिए ही सही 18 अगस्त 2003 को दिल्ली राज्य विधेयक 2003 संसद में पेश किया। उसमें नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) इलाका केंद्र सरकार के पास रखने और वीआइपी सुरक्षा को छोड़कर बाकी पुलिस दिल्ली सरकार को देने की बात थी। उस विधेयक में गैर एनडीएमसी इलाके की जमीन के अधिकार दिल्ली सरकार को होते। मौजूदा अधिकारों में थोड़ी ही बढ़ोतरी होती। लेकिन दिल्ली तकनीकि रूप से भी केंद्र शासित प्रदेश से पूर्ण राज्य का दर्जा पा जाती। बाद में सरकार की ओर से पहल करके उसमें कई संशोधन कराए जा सकते थे। यह विधेयक भी राजनीतिक मुद्दे से ज्यादा कुछ साबित नहीं हुआ। इसे प्रवर समिति में भेजा गया और फिर इसे दफन ही कर दिया गया। कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार तो दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाना तो दूर कुछ भी अतिरिक्त देने को तैयार न थी।

2002 में शीला दीक्षित और तब के उपराज्यपाल विजय कपूर के विवाद में तब की भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने उपराज्यपाल का साथ दिया और बिलों के बारे में जो अधिकार दिल्ली विधानसभा को मिले थे उसमें कटौती की। उसी के बाद कांग्रेस ने रणनीति बदली और 11 सितंबर 2002 को दिल्ली विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर दिल्ली को पूर्ण राज्य देने का प्रस्ताव पास किया। प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ। जाहिर है, इसे भाजपा का समर्थन था और भाजपा के नेतृत्व ने अपनी पुरानी घोषणा पर अमल करने के लिए संसद में 2003 में विधेयक पेश किया। कांग्रेस ने तो इस बार भी अपने घोषणापत्र में पूर्ण राज्य का वादा किया है। लेकिन इसकी शुरुआत करने वाली भाजपा चुप्पी साधे हुई है। दिल्ली में कई मुद्दे हैं जिन पर काफी विवाद है। लेकिन अभी तो आप की सरकार को इनसे बचना होगा। आप अपनी नई राजनीति की शुरुआत शनिवार से करने वाली है, उस पर देश की निगाहें लगी हुई हैं।

 

मनोज मिश्र

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