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अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन: प्रणब ने उठाए सवाल, गृहमंत्री तलब, कांग्रेस ने दी चुनौती

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने की जरूरत के बारे में सवाल पूछे हैं। इस सिलसिले में उन्होंने गृहमंत्री को भी तलब किया।

Author , नई दिल्ली | January 26, 2016 1:10 AM
कैबिनेट के सहयोगियों के साथ पीएम नरेंद्र मोदी (FILE: PTI)

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने की जरूरत के बारे में सवाल पूछे हैं। इस सिलसिले में उन्होंने गृहमंत्री को भी तलब किया। जबकि कांग्रेस ने केंद्र सरकार के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। राष्ट्रपति शासन के मुद्दे पर अदालत बुधवार को सुनवाई करेगी। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मिल कर कैबिनेट के फैसले पर सफाई दी। भाजपा सूत्रों के मुताबिक गृहमंत्री ने राष्ट्रपति को बताया कि राज्य में स्थिति खराब हो गई थी। समझा जाता है कि राष्ट्रपति ने राज्य में ऐसे समय पर राष्ट्रपति शासन लागू करने की जरूरत को लेकर कुछ सवाल पूछे जबकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि अंतिम फैसला करने से पहले वह कानूनी राय लेने पर विचार करेंगे। इस मुद्दे पर विवाद बढ़ने का असर अगले बजट सत्र में भी पड़ने का अंदेशा है।

शाम को गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़गे और कपिल सिब्बल सहित कांग्रेस के नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने एक ज्ञापन सौंपा जिसमें पार्टी ने कहा कि पहली बार ऐसा हुआ है जब अदालत में सुनवाई के बीच ही राष्ट्रपति शासन लागू करने का फैसला किया गया है। साथ ही पार्टी ने घटनाक्रम का सारांश भी दिया जिसके चलते राज्यपाल ने ‘गैरकानूनी कार्रवाइयां’ कीं।

राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने यहां संवाददाताओं से कहा ‘संविधान को कुचला जा रहा है। गणतंत्र दिवस के ठीक एक दिन पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल ऐसा निर्णय ले रहा है। हम पूरी तरह लड़ाई लड़ेंगे। हम संसद में लड़ेंगे, अदालत में लड़ेंगे और जनता के साथ लड़ेंगे। हम उन्हें बताएंगे कि लोकतंत्र कैसे खतरे में है।’

पार्टी के नेता और वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि यह चौंकाने वाली बात है कि अरुणाचल के राज्यपाल ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश की जबकि उन्हीं के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में आश्वासन दिया था कि कोई अप्रत्याशित कार्रवाई नहीं की जाएगी।

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रिमंडल के फैसले को चुनौती देने वाली कांग्रेस की अपील पर 27 जनवरी को सुनवाई करने का फैसला किया है। अतिशीघ्र सुनवाई करने का आग्रह करने वाली यह याचिका प्रधान न्यायमूर्ति टी एस ठाकुर के आवास पर पेश की गई जिन्होंने मामले को बुधवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश दिया।

डिप्टी रजिस्ट्रार वीरेन्द्र कुमार ने बताया, ‘याचिका प्रधान न्यायाधीश के समक्ष पेश की गई। उन्होंने इसे 27 जनवरी को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।’ उन्होंने कहा कि रजिस्ट्री की मामला सूचीबद्ध करने वाली शाखा इसे उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करेगी।

इस विवाद से जुड़े प्रकरण में संविधान में प्रदत्त राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों का दायरा और मुख्यमंत्री व उनके मंत्रिमंडल की सलाह के बगैर ही विधानसभा का सत्र आहूत करने के अधिकार जैसे मसलों पर न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की अध्यक्षता वाला पांच सदस्यीय पीठ पहले ही सुनवाई कर रहा है। नई याचिका राज्य विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के मुख्य सचेतक राजेश ताको ने दायर की है जिसमें आरोप लगाया गया है कि केंद्र और राज्यपाल ‘गैरकानूनी तरीके से’ प्रदेश की नबाम तुकी सरकार को अपदस्थ करने का प्रयास कर रहे हैं।

प्रख्यात न्यायविद फली एस नरीमन की ओर से दायर कांग्रेस की याचिका में कहा गया है कि मौजूदा मामले में राज्यपाल की सिफारिश केंद्र में सत्तारूढ़ दल के ‘राजनीतिक हित’ को बढ़ावा देने वाली है।

याचिका में कांग्रेस ने केंद्र और राज्यपाल को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश से संबंधित रिकार्ड पेश करने का निर्देश देने का अनुरोध किया है। इस याचिका में कहा गया है कि प्रतिवादी राज्यपाल के व्यक्तिगत कथन के अलावा संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत कार्रवाई को न्यायोचित ठहराने के लिए कोई सामग्री नहीं है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्यपाल ने केंद्र सरकार के एजंट और प्रवक्ता के रूप में काम करके अपने पद का दुरुपयोग किया है।

याचिका में छठी अरुणाचल प्रदेश विधानसभा को ‘दोबारा सक्रिय’ करके नबाम तुकी सरकार को उनके मंत्रिमंडल के साथ बहाल करने का अनुरोध किया गया है। मंत्रिमंडल के फैसले की ज्यादातर विपक्षी दलों ने आलोचना करते हुए केंद्र पर लोकतंत्र की ‘हत्या’ करने का आरोप लगाया है। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने केंद्र के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि कांग्रेस की अंदरुनी कलह की वजह से अरुणाचल प्रदेश में राजनीतिक संकट पैदा हुआ है।

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