लेखक-प्रकाशक-पाठक के त्रिकोण पर बोले अरुण माहेश्वरी, लोक से जुड़ें लेखक

'युवा लेखक प्रकाशक से जुड़ता है तो प्रकाशक खुद को तरुण महसूस करता है। वहीं वरिष्ठ लेखक हमारे प्रकाशन की शोभा और सम्मान हैं। साहित्य में सिर्फ उम्र से युवा की बात नहीं होती। साहित्य हमेशा युवा ही होता है।'

किताब को लेकर जमीन पर उतरिए, लोगों के बीच जाइए। नरेंद्र कोहली को अच्छी रॉयल्टी मिलती है और वे किताब को लोगों से जोड़ते हैं।

विश्व पुस्तक मेला 2020 का आज अंतिम दिन है। कड़ाके की ठंड और बारिश के बीच भी जिस तरह से हर उम्र के पाठक मेले में पहुंचे वह लेखकों और प्रकाशकों के लिए उत्साहवर्धक रहा। प्रकाशकों के चेहरों पर इस बात की खुशी है कि आम लोगों के बजट में किताबें अहम स्थान रखती हैं। प्रकाशन के क्षेत्र के सशक्त हस्ताक्षर वाणी प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी ने कहा कि इस बार का मेला हमारे लिए अप्रत्याशित रहा। हमने पचास लाख रुपए का लक्ष्य रखा था और मुझे इस बात की खुशी है कि आज हम इस लक्ष्य को पार भी कर सकते हैं। ऐसा हमारे साथ पहली बार हुआ है यह हमारे लिए गर्व करने का क्षण है।

हृदयनारायण दीक्षित से लेकर वीरू सोनकर तक
इस मेले में युवा लेखक बड़ी संख्या में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं जिसमें स्त्री रचनाकारों की मुखरता उत्साहजनक है। लेखक और पाठकों के बीच के रिश्ते पर माहेश्वरी ने कहा कि एक प्रकाशक के नाते युवा लेखक समय की आवश्यकता होते हैं। हमने अरुण कमल की पहली किताब लगभग 30 साल पहले प्रकाशित की थी जब वे युवा थे। अरुण कमल अपनी कविता की भाषा में आज भी युवा हैं। हृदयनारायण दीक्षित उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष और अहम रचनाकार हैं। वेदों पर उनकी तीन महीने के अंदर दूसरी किताब आ गई है। वेदों को आधुनिक विमर्श से कैसे देखें, इसकी युवाओं तक पहुंच कैसे बने इस पर उनका कार्य उल्लेखनीय है। हम वैदिक ग्रंथमाला शुरू कर रहे हैं। मेरे लिए तो हर लेखक अहम है। युवा लेखक प्रकाशक से जुड़ता है तो प्रकाशक खुद को तरुण महसूस करता है। वहीं वरिष्ठ लेखक हमारे प्रकाशन की शोभा और सम्मान हैं। साहित्य में सिर्फ उम्र से युवा की बात नहीं होती। साहित्य हमेशा युवा ही होता है। कानपुर के युवा कवि वीरू सोनकर की पहली किताब ‘मेरी राशि का अधिपति एक सांड़ है’ को हम प्रकाशित कर रहे हैं तो हृदयनारायण दीक्षित 75 साल के लेखक हैं। सोनकर और दीक्षित दोनों की रचना का अपना-अपना साहित्यिक सुख है।

लेखक-प्रकाशक का साझा उत्पाद है किताब
लेखक-प्रकाशक संबंधों पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। इस मुद्दे पर अरुण माहेश्वरी ने कहा कि यह तो एक साझा रिश्ता होता है जिसे क्लिष्ट बना दिया गया है। उन्होंने कहा कि मैं एक साहित्यिक कार्यक्रम में गया था। वहां इस मसले पर बात उठी और एक लेखक ने कहा कि लेखकों के कारण प्रकाशक की गाड़ी लंबी और मकान बड़ा हो जाता है। ऐसी बहुत सी बातें होती हैं। मेरा कहना है कि हमारे देश में तुलसीदास हुए। उन्होंने पांच सौ साल पहले रामायण लिखी। उसके बाद भी कई रामायण लिखी गई। लेकिन आज के लेखकों को सोचना चाहिए कि पांच सौ साल बाद भी तुलसीदास की ही रामायण क्यों लोकप्रिय है।

कारण यह है कि तुलसीदास लोक के मानस में पहुंचे और उनके लिए लिखा। हमारे आज के लेखकों को सोचना चाहिए कि वे लोक के बीच कितना पहुंचे। मेरे पास एक नया उदाहरण है बालेंदु द्विवेदी का। उनके उपन्यास ‘मदारीपुर जंक्शन’ को आए महज डेढ़ साल हुए लेकिन उनके तीन संस्करण आ गए। वे जनमानस में उतरने वाले लेखक हैं। उन्हें किताब को लेकर जो रॉयल्टी मिली वे उसका एक भाग आने-जाने पर खर्च कर लोगों के बीच किताब लेकर पहुंचे। किताब पर नाटक करवाया। किताब लिखने के बाद उसे लोक से जोड़ने के लिए विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल किया। मैं लेखकों को नसीहत देना चाहता हूं कि कटुता और खींचातानी करके संतोष नहीं करना चाहिए। उसकी जरूरत ही क्या है।

किताब को लेकर जमीन पर उतरिए, लोगों के बीच जाइए। नरेंद्र कोहली को अच्छी रॉयल्टी मिलती है और वे किताब को लोगों से जोड़ते हैं। अरविंद गौड़ को देखिए, नुक्कड़ नाटक करते हैं अपनी बात जमीन पर आकर कहते हैं। वे आए थे तो बोले कि मैंने सोचा भी नहीं था कि मुझे इतनी अच्छी रॉयल्टी मिलेगी। माहेश्वरी ने कहा कि किताब बिकने का कोई तय फार्मूला नहीं है। जो प्रकाशक अधिक से अधिक प्रचार करेगा, सोशल मीडिया से लेकर विभिन्न माध्यमों तक तो किताब पाठकों तक पहुंचेंगी। इसमें लेखक को भी प्रकाशक के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए। किताब तो लेखक-प्रकाशक का साझा उत्पाद है तो फिर दोनों में कटुता क्यों हो? दोनों को साथ चलना ही पड़ेगा।

पाठक बड़ी संख्या में
अरुण माहेश्वरी ने कहा कि इस बार मेले की खासियत यह है कि इसमें सिर्फ पाठक होते हैं। यह कोई खान-पान का मेला नहीं है। यह मिथ पूरी तरह टूट रहा है कि पाठक नहीं हैं और किताबें नहीं बिकती हैं। हर स्टॉल पर युवा पाठक हैं। वाणी प्रकाशन के स्टॉल का माहौल तो ऐसा रहा कि कुछ किताबें आर्इं और हाथों-हाथ बिक गईं। कुछ किताबें लोकार्पण के लिए सौ-डेढ़ सौ प्रतियां आई थीं जो कुछ ही समय में खत्म हो गईं।

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