जेटली ने न्यायपालिका को बताई लक्ष्मण रेखा, कहा- सरकारी फैसले कार्यपालिका को ही करने दें

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जोर दिया, ‘सरकारी निर्णय (एक्जक्यूटिव) कार्यपालिका द्वारा ही लिए जाने चाहिए और न्यायपालिका द्वारा नहीं।’

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केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली। (पीटीआई फाइल फोटो)

न्यायिक सक्रियता पर एक बार फिर चिंता व्यक्त करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सोमवार (16 मई) को कहा कि सक्रियता के साथ संयम का मिश्रण होना चाहिए और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के नाम पर संविधान के बुनियादी ढांचे के अन्य आयामों के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। वित्त मंत्री ने कहा, ‘न्यायिक समीक्षा न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का वैध पहलू है लेकिन फिर सभी संस्थाओं को स्वयं लक्ष्मण रेखा खींचनी होगी। लक्ष्मणरेखा महत्वपूर्ण है।’ उन्होंने जोर दिया, ‘सरकारी निर्णय (एक्जक्यूटिव) कार्यपालिका द्वारा ही लिए जाने चाहिए और न्यायपालिका द्वारा नहीं।’

जेटली ने इसका विस्तार से कारण बताते हुए कहा कि अगर कोई सरकारी निर्णय कार्यपालिका लेती है तब उसमें विभिन्न स्तरों पर जवाबदेही तय की जा सकती है। इसे चुनौती दी जा सकती है, इसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है और जनता भी अगर पाती है कि ये जनहित में नहीं है तो वोट के माध्यम से उस सरकार के खिलाफ जनादेश दे सकती है। अदालतें भी इसे कानून सम्मत नहीं पाने पर रद्द कर सकती हैं। लेकिन अगर अदालत की ओर से सरकारी फैसला लिया जायेगा तक ये सभी विकल्प उपलब्ध नहीं होंगे।

इंडियन वुमन प्रेस कोर में जेटली ने संवाददाताओं से कहा, ‘अदालतें, कार्यपालिका का स्थान नहीं ले सकतीं और यह नहीं कह सकती कि वह कार्यकारी शक्ति का उपयोग करेंगी। अगर वह (अदालत) ऐसा करेंगी तब ये तीन विकल्प उपलब्ध नहीं होंगे।’ वित्त मंत्री से उनकी पूर्व की उस टिप्पणी के बारे में पूछा गया था जिसमें उन्होंने न्यायपालिका द्वारा विधायिका और कार्यपालिका के अधिकारों का अतिक्रमण करने से जुड़ी बात कही थी।

जेटली ने हालांकि स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बेहद महत्वपूर्ण है और इस विषय पर न्यायपालिका ने सही रूप से जोर दिया है। उन्होंने कहा, ‘जिस तरह से न्यापालिका की स्वतंत्रता बुनियादी ढांचे का हिस्सा है, उसी तरह से नीति निर्माण में विधायिका की सर्वोच्चता भी बुनियादी ढांचे का हिस्सा है।’ वित्त मंत्री ने कहा, ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता के नाम पर हम अन्य दो बुनियादी ढांचों के साथ समझौता नहीं कर सकते।’

उन्होंने जोर दिया कि एक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा पर्याप्त नहीं होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किसी विशिष्ठ मुद्दे पर नहीं बोल रहे हैं बल्कि संवैधानिक मुद्दे पर बात रख रहे हैं। जेटली ने कहा, ‘सक्रियता के तत्व के साथ संयम के कारक का मिश्रण हमेशा होना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि जब दोनों संतुलित रहते हैं तक दिशा सही रहती है।

उल्लेखनीय है कि इस विषय पर राज्यसभा में जेटली ने सांसदों से आग्रह किया था कि बजटीय और कराधान की शक्ति न्यायपालिका को देने से बचें। हैदराबाद में भी रविवार (15 मई) को जेटली ने कहा था कि वह शीर्ष अदालत का सम्मान करते हैं लेकिन किसी को भी एक दूसरे के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

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