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जेटली ने किया पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों से सवाल: ‘विरोध सचमुच का या गढ़ा हुआ’

अरुण जेटली ने लेखकों की ओर से साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाने के सिलसिले को एक ‘‘गढ़े हुए संकट’’ पर सरकार के खिलाफ ‘‘एक गढ़ी हुई कागजी बगावत’’ करार दिया है..

Author नई दिल्ली | Updated: October 15, 2015 9:21 AM
अरुण जेटली ने लेखकों की ओर से साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाने के सिलसिले को एक ‘‘गढ़े हुए संकट’’ पर सरकार के खिलाफ ‘‘एक गढ़ी हुई कागजी बगावत’’ करार दिया है। (पीटीआई फोटो)

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने लेखकों की ओर से साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाने के सिलसिले को एक ‘‘गढ़े हुए संकट’’ पर सरकार के खिलाफ ‘‘एक गढ़ी हुई कागजी बगावत’’ करार दिया है।

‘‘एक गढ़ी हुई क्रांति – अन्य साधनों द्वारा राजनीति’’ शीर्षक से किए गए एक फेसबुक पोस्ट में जेटली ने लिखा, ‘‘दादरी में अल्पसंख्यक समुदाय के एक सदस्य की पीट-पीटकर की गई हत्या बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है। सही सोच रखने वाला कोई भी इंसान न तो इस घटना को सही ठहरा सकता है और न ही इसे कम करके आंक सकता है। ऐसी घटनाएं देश की छवि खराब करती हैं।’’

गौरतलब है कि दादरी कांड के बाद दर्जनों लेखकों ने अपने साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटा दिए हैं। उनका दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में असहनशीलता का माहौल बनाया जा रहा है। जेटली ने सवालिया लहजे में लिखा, ‘‘यह सचमुच का विरोध है या गढ़ा हुआ विरोध है? क्या यह वैचारिक असहनशीलता का मामला नहीं है?’’

भाजपा नेता ने कहा कि बड़े पैमाने पर वाम विचारधारा या नेहरूवादी विचारधारा की ओर झुकाव रखने वाले लेखकों को पिछली सरकारों द्वारा मान्यता दी गई थी। उन्होंने कहा, ‘‘उनमें से कुछ इस मान्यता के हकदार रहे होंगे। न तो मैं उनकी अकादमिक प्रतिभा पर सवाल उठा रहा हूं और न ही मैं उनके राजनीतिक पूर्वाग्रह रखने के अधिकार पर सवाल उठा रहा हूं। उनमें से कई लेखकों ने मौजूदा प्रधानमंत्री के खिलाफ उस वक्त भी आवाज बुलंद की थी जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे।’’

जेटली ने कहा कि लेकिन जब पिछले साल मोदी सत्ता में आए तो ‘‘पहले की सरकारों में संरक्षण का आनंद उठा रहे लोग जाहिर तौर पर मौजूदा सरकार से असहज हैं।’’

उन्होंने कहा कि कांग्रेस के और सिमटने के कारण उनकी यह ‘‘असहजता’’ पहले से बढ़ गई है। जेटली ने कहा, ‘‘लगता है कि मोदी-विरोधी, भाजपा-विरोधी तबकों की नई रणनीति ‘अन्य साधनों से राजनीति करना’ है। इसका सबसे आसान तरीका है कि एक संकट गढ़ो और फिर इस गढ़े हुए संकट पर सरकार के खिलाफ एक कागजी बगावत गढ़ दो।’’

वित्त मंत्री ने कहा कि देश में असहनशीलता का कोई माहौल नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘ये जो गढ़ी हुई बगावत है, वह दरअसल भाजपा के प्रति वैचारिक असहनशीलता का मामला है।’’

जेटली ने याद दिलाते हुए कहा कि जब एनडीए सरकार सत्ता में आई तो चर्चों सहित ईसाई समुदाय के खिलाफ एक के बाद एक कर हमलों की खबरें आईं। उन्होंने कहा, ‘‘यह आरोप लगाया गया कि देश में अल्पसंख्यक समुदाय असुरक्षित महसूस कर रहा है। हमलों के ऐसे हर एक मामलों की जांच कराई गई और उनमें से ज्यादातर चोरी या बोतलें फेंक देने या खिड़कियों के शीशे तोड़ देने जैसे छोटे-मोटे अपराध के मामले पाए गए। दिल्ली और इसके आसपास के स्थानों में ऐसे किसी भी हमले को धर्म या राजनीति से जुड़ा हुआ नहीं कहा जा सका।’’

आरोपियों की गिरफ्तारी हुई और उन पर मुकदमे चलाए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में एक नन से बलात्कार के मुख्य आरोपी को बांग्लादेशी मूल का पाया गया। जेटली ने कहा, ‘‘उस वक्त विरोध ने दो कारकों को उजागर किया। पहला यह कि यह अल्पसंख्यक समुदाय की संस्थाओं पर हमला था और दूसरा यह कि प्रधानमंत्री इसपर चुप थे। जब यह बात साबित हो गई कि ‘हमलों’ के ये मामले आपराधिक घटनाएं थीं, तो दुष्प्रचार और दुष्प्रचार करने वाले दोनों गायब हो गए।’’

वित्त मंत्री ने कहा कि विरोध कर रहे लेखकों ने मोदी सरकार के खिलाफ कोई मुद्दा तलाशने में बड़ी मशक्कत की है। उन्होंने कहा, ‘‘तर्कवादी एम एम कलबुर्गी की कर्नाटक में गोली मारकर हत्या की गई, जहां कांग्रेस की सरकार है। एक अन्य तर्कवादी एन दाभोलकर की हत्या महाराष्ट्र में 20 अगस्त 2013 को गई। उस वक्त वहां कांग्रेस-एनसीपी की सरकार थी। दोनों घटनाओं की स्पष्ट शब्दों में निंदा करने की जरूरत है।’’

जेटली ने कहा, ‘‘कानून-व्यवस्था बनाए रखना और हमले के आसान निशाने को सुरक्षा देना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। इसी तरह, दादरी कांड उत्तर प्रदेश में हुआ जहां समाजवादी पार्टी की सरकार है।’’

भाजपा नेता ने कहा, ‘‘अन्य साधनों के जरिए की जा रही राजनीति में एक वैकल्पिक रणनीति तैयार की गई है। तीन अपराधों को मिला दें, सच को छुपा दें और उन सभी को मौजूदा केंद्र सरकार के पाले में फेंक दें।’’

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन किसी बगावत को गढ़ने के लिए सच को छुपाना जरूरी है और यह छवि पैदा करना जरूरी है कि मोदी सरकार इन अपराधों के लिए जिम्मेदार है, भले ही ये घटनाएं कांग्रेस या सपा शासित सरकारों में हुई हों।’’

जेटली ने कहा, ‘‘2015 में विरोध कर लेखकों में से एक ने तो अपना पद्मश्री लौटाने का एक कारण 1984 के सिख दंगे को भी गिनाया। इस लेखक की अंतरात्मा को जागने में 30 साल लग गए।’’

विरोध कर रहे लेखकों से सवाल करते हुए जेटली ने कहा कि उनमें से कितनों ने आपातकाल के दौरान गिरफ्तारियां दी हैं, विरोध-प्रदर्शन किए हैं या इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है?

जेटली ने कहा, ‘‘1984 में सिखों के कत्लेआम या 1989 के भागलपुर दंगे के खिलाफ लेखकों ने कुछ बोला था? 2004 से 2014 के बीच हुए करोड़ों रुपए के घोटाले पर इन लेखकों की अंतरात्मा नहीं जागी थी?’’

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