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कृत्रिम मेधा से लगेगा स्मृति लोप का पूवार्नुमान

स्मृति लोप के 60 फीसद मामलों की वजह एवं उससे जुड़े जोखिमों का अब भी पता नहीं चल पाया है।

कृत्रिम मेधा से लगेगा स्मृति लोप का पूवार्नुमान
Alzheimer's Disease: उम्र के बढ़ने पर शरीर और दिमाग कमजोर हो जाता है। (Image: Freepik)

यदि किसी व्यक्ति के भविष्य में स्मृति लोप (डिमेंशिया) से पीड़ित होने का खतरा है, तो कृत्रिम मेधा (एआइ) से इसका पूर्वानुमान लगाने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे मरीज की निजता से जुड़ी चुनौतियां पैदा होती हैं। दुनिया में कहीं न कहीं हर तीन सेकंड में स्मृति लोप का एक नया मामला सामने आता है। स्मृति लोप की बीमारी में पीड़ित बातों-घटनाओं को भूलने लगता है।

अनुसंधान से पता चलता है कि इस बीमारी के कम से कम 40 फीसद मामले रोके जा सकते थे या इसके लक्षणों को टाला जा सकता था, लेकिन इसके लिए बड़ी मात्रा में आंकड़ों को एकत्र करने एवं उनका विश्लेषण करने की आवश्यकता होती है। एआइ की मदद से 90 फीसद तक की सटीकता के साथ यह पता लगाया जा सकता है कि किस व्यक्ति के भविष्य में इस बीमारी से पीड़ित होने का खतरा है, लेकिन मरीज की निजता और आंकड़ों की सुरक्षा जैसे नैतिक मामलों का प्रबंधन करने की आवश्यकता है।

हालांकि स्मृति लोप के 60 फीसद मामलों की वजह एवं उससे जुड़े जोखिमों का अब भी पता नहीं चल पाया है, लेकिन हाल के अध्ययन से जानकारी मिली है कि 12 परिवर्तनीय कारक दुनिया भर में इस बीमारी के लगभग 40 फीसद मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। एआइ की मदद से मरीज के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण करके और उसके हिसाब से सुझाव देकर भूलने की बीमारी के जोखिम को कम किया जा सकता है। एआइ स्मृति लोप से जुड़ी मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहार संबंधी संभावित जटिलताओं का आकलन कर सकती है, स्वास्थ्य पर इसके पड़ सकने वाले परिणाम का सटीकता से पता लगा सकती है और निर्णय लेने में मदद कर सकती है।

अवसाद के लक्षणों को अक्सर स्मृति लोप के लक्षण समझने की गलती की जाती है और मशीन लर्निंग माडल से इन दोनों में अंतर करने में मदद सकती है, लेकिन इन माडल को पूरी तरह विकसित करने के लिए इस बीमारी से संबंधित आंकड़े अब भी सीमित मात्रा में उपलब्ध है। मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में डिजिटल प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल करते समय सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है और नैतिकता संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए विश्लेषण के उपकरणों का चयन भी सोच-समझकर किया जाना चाहिए।

इनमें मरीजों संबंधी आंकड़ों को सुरक्षित करना और आंकड़ों के स्वामित्व का कानूनी आश्वासन दिया जाना शामिल है। खासकर मानसिक बीमारी के संबंध में किसी मरीज के आंकड़े को साझा करने से उसके कल्याण पर बड़ा असर पड़ सकता है।

चिकित्सीय फैसलों में एआइ का इस्तेमाल अब भी नया है और उपचार पद्धतियों में इसका इस्तेमाल करने से पहले अब भी कई बाधाओं को पार करने की आवश्यकता है। इसके लिए और अनुसंधान किया जाना जरूरी है। चिकित्सकीय पेशेवरों, हितधारकों, सरकार और अन्य लोगों के लिए अब आदर्श समय है कि वे नई प्रौद्योगिकियों के लाभ और जोखिम के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए मिलकर काम करें।

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