Madhya Pradesh News: पिछले 10 सालों में मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या देश के औसत से ज्यादा तेजी से बढ़ी है। अब यहां बाघों की संख्या करीब 1000 तक पहुंच रही है। इसके बाद एक नई समस्या आ गई है कि क्या राज्य में बाघों की संख्या जरूरत से ज्यादा हो गई है। राज्य सरकार ने देहरादून में मौजूद वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से संपर्क किया है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि राज्य के जंगल कितने बाघों को संभाल सकते हैं।

2004 में सरिस्का में बाघों के खत्म हो जाने की घटना के बाद कई सुधार किए गए। इन सुधारों की वजह से पूरे देश में बाघों की संख्या बढ़ने लगी। हर चार साल में आने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 से 2022 के बीच भारत में बाघों की संख्या 65% बढ़ी है, यानी 2226 से बढ़कर 3682 हो गई। इसी समय में मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या और भी तेजी से बढ़ी। यहां 155% की बढ़ोतरी हुई, जिससे संख्या 308 से बढ़कर 785 हो गई। राज्य के अधिकारियों का कहना है कि तब से यह रुझान लगातार बना हुआ है।

ज्यादा बाघों का मतलब ज्यादा टकराव

लेकिन ज्यादा बाघों का मतलब है ज्यादा टकराव। पूरे भारत में, बाघों के हमले में मारे गए लोगों की संख्या 2014-2019 के दौरान 224 से बढ़कर 2020-2025 के अगले छह साल के चक्र में 418 हो गई। यह 87% की बढ़ोतरी है।

मध्य प्रदेश ने महाराष्ट्र (ताडोबा) या उत्तर प्रदेश (पीलीभीत) जैसे क्षेत्रों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। हालांकि, पालतू जानवरों के नुकसान का बदला लेने के लिए बिजली का झटका देकर बाघों को मारने की घटनाएं और इंसानों पर हमले बढ़ रहे हैं। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि मध्य प्रदेश में कितने बाघ ज्यादा हैं।

डॉ. राजेश गोपाल ने कहा कि पानी की उपलब्धता, शिकार न होना जैसे अन्य कारकों में बदलाव नहीं होने पर किसी जंगल में बाघों की आबादी का आकार शिकार के लिए उपलब्ध जानवरों की संख्या पर निर्भर करता है। सरल शब्दों में, यह इस बात से निकाला जाता है कि जंगल में हर साल शिकार बनने वाले जानवरों की संख्या कितनी है और एक बाघ को साल भर में कितना खाना चाहिए।

शिकार जानवरों का वजन अलग-अलग होता है, लेकिन आसान अंदाजा यह है कि एक बाघ को जीने के लिए लगभग 350 खुर वाले जानवर (जैसे हिरण आदि) के बराबर शिकार की जरूरत होती है।

वाइल्ड लाइफ बॉयोलोजिस्ट मिलिंद पारिवाकम ने कहा, “चूंकि ‘X’ संख्या में शिकार केवल ‘Y’ संख्या में बाघों को ही पाल सकते हैं, इसलिए ज्यादा बाघ या तो आपस में लड़कर मर जाएंगे या इसकी ज्यादा संभावना है कि उन्हें बफर जोन में धकेल दिया जाएगा या वे तितर-बितर हो जाएंगे।” उन्होंने आगे कहा, “जब ऐसे बाघ सफल होते हैं, तो वे नए क्षेत्रों में फिर से अपनी आबादी बसा लेते हैं। या फिर वे ऐसा करने की कोशिश में मारे जाते हैं।”

मानव-पशु संघर्ष

सड़क, रेल, सिंचाई परियोजनाओं के तेजी से बढ़ने, खनन और पेड़ों की कटाई की वजह से मध्य भारत के जंगल आपस में जुड़े नहीं रह गए हैं। इसका असर यह हुआ है कि जो ज्यादा बाघ हैं, वे एक जंगल से दूसरे जंगल में सुरक्षित तरीके से नहीं जा पाते। ऐसे में उनका इंसानों से सामना होने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है।

लेकिन, प्राकृतिक फैलाव के माध्यम से वन संपर्क को बहाल करना एक लंबा समाधान है। इसी वजह से विशेषज्ञ कहते हैं कि बाघों की ज्यादा आबादी को संभालने का हल ढूंढने से आसान है यह पता लगाना कि जंगल कितने बाघों को सही तरीके से संभाल सकते हैं। डॉ. धर्मेंद्र खंडाल बताते हैं, “प्राकृतिक गलियारों की कमी और वन संपर्क टूटने की स्थिति में कुछ राज्यों में बाघों को एक जगह से दूसरे जगह पर ले जाने या सहायता प्राप्त फैलाव की विधि आजमाई जा रही है। लेकिन पर्याप्त संख्या में बाघों के पालन-पोषण के लिए पर्याप्त शिकार पशुओं वाले अच्छे वन बहुत कम हैं।”

प्राकृतिक आवास को ठीक करना बेहतरीन उपाय

डब्ल्यूआईआई के डायरेक्टर डॉ. गोबिंद सागर भारवाज कहते हैं कि जंगल और प्राकृतिक आवास को फिर से ठीक करना ही सबसे जरूरी उपाय है। वे बताते हैं कि आमतौर पर ध्यान बाघ जैसे बड़े जानवरों पर जाता है, लेकिन असली जरूरत है पूरी खाद्य श्रृंखला को बचाए रखने की। इसके लिए सबसे पहले बुनियादी चीजों को सुरक्षित करना जरूरी है।

वे जोर देकर कहते हैं कि हमारे घास के मैदान जितने स्वस्थ होंगे, उतना ही अच्छा शिकार (जैसे हिरण आदि) मिलेगा और इसी पर अंत में बाघों की संख्या भी निर्भर करती है।

परिवाकम का कहना है कि मध्य प्रदेश, झारखंड और ओडिशा के बड़े इलाकों में अभी बहुत कम बाघ हैं। अगर इन जगहों के जंगलों को फिर से ठीक किया जाए, तो ये ज्यादा बाघों को संभाल सकते हैं, खासकर उन जंगलों से जहां पहले से बाघ ज्यादा हैं। लेकिन अगर ज्यादा बाघों को ऐसे खराब हो चुके जंगलों में भेज दिया जाए, जहां जंगली शिकार कम है या बिल्कुल नहीं है, तो इससे समस्या हल नहीं होगी। इससे बस बाघों और इंसानों के बीच टकराव एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाएगा।

किसी इलाके में जितना ज्यादा शिकार (खाने के जानवर) होगा, उतने ही ज्यादा बाघ वहां रह सकते हैं और फैल सकते हैं। इसलिए जंगल के प्रबंधक सिर्फ गणित से नहीं, बल्कि यह भी सोचते हैं कि किसी जगह पर कितने बाघ होना सही रहेगा।

डॉ. भारद्वाज कहते हैं कि सिर्फ शिकार की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक बातें भी तय करती हैं कि बाघों की संख्या कितनी होनी चाहिए। कुछ लोग इसे “सामाजिक वहन क्षमता” कहते हैं, लेकिन वे इसे आसान शब्दों में उस जगह पर “चाहे जाने वाली बाघों की संख्या” कहते हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि वह सीमा पार हो चुकी है। सरिस्का आपदा के बाद, शिकारियों से बेहतर सुरक्षा और सक्रिय प्रबंधन, जैसे कि जलस्रोत निर्माण, चिकित्सा हस्तक्षेप आदि ने बाघों को शिकार से भरपूर बाघ अभ्यारण्यों की पूरी क्षमता का एहसास कराने में मदद की है। हैरानी की बात यह है कि जंगली खुर वाले जानवर अब उस शिकार आधार का मुख्य हिस्सा नहीं रह गए हैं।

बांधवगढ़ में 47% बाघ पालतू पशुओं का शिकार कर रहे थे

हाल के सालों में भारत में बाघों के खाने में पालतू जानवरों (जैसे गाय-भैंस) का हिस्सा बढ़ गया है। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में पिछले साल हुए एक अध्ययन में पाया गया कि बांधवगढ़ के करीब 47% बाघ पालतू पशुओं का शिकार कर रहे थे।

राजस्थान में भी ऐसा ही देखा गया। 2016 से 2018 के बीच सरिस्का टाइगर रिजर्व में मारे गए 737 जानवरों के अध्ययन में पाया गया कि इनमें सबसे ज्यादा भैंस (44%) थीं, फिर गाय (22%), सांभर हिरण (12%), बकरियां (11%), चीतल (4%) और नीलगाय (2%) शामिल थीं। रणथंभौर में एक हालिया अध्ययन में यह भी पता चला कि बाघों के खाने का लगभग 40% हिस्सा पालतू जानवरों से आता है।

मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ वन अधिकारी (जिन्होंने नाम नहीं बताया) का कहना है कि गायों के वध पर रोक लगने के बाद मवेशियों की संख्या बढ़ गई है। लेकिन जब ये मवेशी बाघ अभयारण्यों के अंदर पहुंच जाते हैं, तो इससे खास तरह की समस्याएं पैदा होती हैं।

वे कहते हैं कि जंगल (रिजर्व) के बाहर अगर बाघ मवेशियों का शिकार करते हैं, तो उनके लिए खतरा ज्यादा होता है, क्योंकि लोग बदला लेने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन रिजर्व के अंदर बाघ ज्यादा सुरक्षित रहते हैं, इसलिए वहां मवेशियों को खाने पर उन्हें कम खतरा होता है। साथ ही, बाहर के इलाकों में बाघों के पास अक्सर मवेशियों के अलावा कोई और शिकार नहीं होता, जबकि अभयारण्य के अंदर उन्हें जंगली जानवर भी मिल जाते हैं।

इसलिए, अभयारण्य के बाहर मवेशियों की ज्यादा संख्या इंसान और बाघ के बीच टकराव बढ़ाती है, जबकि अभयारण्य के अंदर यह बाघों की संख्या बढ़ाने में मदद करती है।

पन्ना टाइगर रिजर्व के सेंसिटिव जोन में बना लिया रिसॉर्ट

मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व के वन अधिकारियों ने भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) के एक अधिकारी और सर्वोच्च न्यायालय में कार्यरत उनकी पत्नी से स्पष्टीकरण मांगा है। उन पर आरोप है कि उन्होंने पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में एक होटल/रिसॉर्ट का निर्माण किया है। इंडियन एक्सप्रेस को इसकी जानकारी मिली है। पढ़ें पूरी खबर…