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भारत रत्न एपीजे अब्दुल कलाम (1931-2015): मौत भी मिटाने में नाकाम

लिहाजा, मौत भी उनको मिटाने में नाकाम है। मौत भी उनके लिए कोई अंत नहीं वरन एक सतत घटनाक्रम का एक पड़ाव मात्र है। डॉ एवुल पाकिर जैनुलआबदीन अब्दुल कलाम एक व्यक्ति विशेष नहीं, बल्कि एक संस्था थे।

मौत भी मिटाने में नाकाम

‘अगर मेरी कामयाबी की परिभाषा मजबूत है तो नाकामी कभी मुझसे आगे नहीं निकल सकती’

अब्दुल कलाम

लिहाजा, मौत भी उनको मिटाने में नाकाम है। मौत भी उनके लिए कोई अंत नहीं वरन एक सतत घटनाक्रम का एक पड़ाव मात्र है। डॉ एवुल पाकिर जैनुलआबदीन अब्दुल कलाम एक व्यक्ति विशेष नहीं, बल्कि एक संस्था थे। उनका जीवन दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत था। उनका ज्ञान, उनकी शिक्षा, उनका रुतबा, उनकी जाति, उनका धर्म कभी उनके काम में आड़े नहीं आया।

सन 2003 में अप्रैल की गरम दुपहरी में वे हरियाणा के दौरे पर आए थे। हिसार के बाद उनको यमुनानगर पहुंचना था। सुरक्षा और दूसरे सरकारी तामझाम की वजह से वे दो घंटे देरी से पहुंचे। विलंब का कोई सुख हो नहीं सकता और न ही इंतजार से उपजी खीझ का खात्मा। जाहिर है कि सब लोग, जिनमें मैं भी शामिल था और यह दौरा कवर करना था, इस इंतजार से हलकान थे।

पूर्व राष्ट्रपति को पहले आंगनबाड़ी के बच्चों से मिलना था और फिर गांव में अनुसूचित जाति के परिवारों के घरों में जाना था। सरकार ने तब भी गांव में शौचालय बनाने की दिशा में प्रयास किए थे। बहरहाल, कलाम के मौके पर पहुंचते ही बच्चों ने रटे-रटाए तरीके से ‘जय हिंद’ के नारे लगाए। लेकिन शायद थकान के चलते उनकी आवाज में वैसा दम नहीं रह गया था। मुस्कराते हुए पूर्व राष्ट्रपति ने उनको टाफियां दीं और बुलंद आवाज में ‘जय हिंद’ का नारा लगाने को कहा।

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देश और उसकी जयकार के प्रति कलाम का उत्साह कमाल का था। उनके आने से उनके इंतजार से उपजी उकताहट जैसे काफूर हो गई और समय को पंख लग गए। अपने चिर-परिचित अंदाज में उन्होंने अपने रुतबे और रुआब को दरकिनार करते हुए बड़ी सहजता और आत्मीयता से बच्चों को दुलराया और पुचकारा। इस अहसास का असर न सिर्फ उन बच्चों पर, वरन उनके मां-बाप और इन लम्हों के साक्षी यानी हम सब पर एक अरसे तक रहा और ताउम्र रहेगा।

‘मिसाइल मैन’ की जनप्रिय उपाधि से अलंकृत कलाम ने देश के मिसाइल अभियान को मूर्त रूप देकर एक सशक्त भारत की जो परिकल्पना की, उसी को बुलंदी पर ले जाकर आज भारत पूरे विश्व में अपनी क्षमता और तैयारी के लिए जाना जाता है। रक्षा अनुसंधान कार्यशालाओं में अपने कार्यकाल के दौरान कलाम और उनकी टीम ने मिसाइल तकनीक पर बेमिसाल काम किया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र में अपने करीब दो दशक के कार्यकाल में कलाम ने रॉकेट प्रक्षेपण तकनीक में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

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कलाम का कद

कलाम को सलाम

पहले एक वैज्ञानिक के रूप में और फिर देश के राष्ट्रपति के तौर पर कलाम का फोकस कभी भी धूमिल नहीं हुआ। देश के युवा और बच्चे हमेशा उनके ध्यान-बिंदु रहे। देश के स्कूल, कॉलेज और दूसरे शिक्षण संस्थानों में जाना उनका खास मिशन था जहां वे इन सबको दिशा प्रदान करके आते थे। शिलांग के राजीव गांधी इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ मैनेजमेंट में ऐसे ही एक पल में मौत ने उनके जीवन का अवसान कर दिया। लेकिन कमाल के कलाम अंतिम सांस तक अपने मिशन में लगे रहे। और जिस तरह वे अपने कदमों के निशान छोड़ गए हैं, उस पर चलकर आने वाली कई पीढ़ियां उनसे मार्गदर्शन लेती रहेंगी।

1998 में पोकरण में हुए परमाणु परीक्षण से पूरे संसार में भारत की धाक जमी थी। कलाम इसके मंत्रदाता थे। उन्हें एक ‘रॉक स्टार’ जैसा दर्जा पूरे विश्व में हासिल हुआ और फिर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पसंद से वे रायसीना हिल्स के ‘रॉक स्टार’ भी बने। वे शायद आजाद भारत के अभी तक के एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति थे जो इस पद पर आसीन होकर लोगों से दूर होने के बजाय उनके उतना ही करीब रहे। यहां तक कि राष्ट्रपति भवन में रहते हुए वे अपनी कर्मभूमि के भी उतने ही नजदीक रहे, जितना कि अपने आम जीवन में। सभी अनुसंधान संस्थानों से उनका जुड़ाव बदस्तूर रहा।

PHOTOS: ‘Missile Man’ अब्दुल कलाम की 10 खास बातें…

राष्ट्रपति भवन से रुख्सत होकर वे फिर से अपनी कर्मभूमि और युवाओं को दिशा प्रदान करने के मिशन में वैसे ही जुट गए , जैसे कभी पहले थे। आजादी से पहले और आजादी के बाद जैसे सशक्त भारत का सपना स्वतंत्रता सेनानियों और नेताओं ने देखा था। लेकिन मिसाइलों के अथक स्वप्नद्रष्टा कलाम ने उसे साकार करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। जिस लगन और धुन के साथ वे अपने मिशन में जुटे थे, उसी के साथ उन्होंने राष्ट्रपति के तौर पर अपनी जिम्मेदारियां भी निभाईं और यह साबित किया कि राष्ट्रपति कोई ‘रबर स्टैंप’ नहीं।

उनके कार्यकाल के दौरान उन्होंने लाभ केपद से जुड़ा एक अहम विधेयक संसद को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया था। यह विधेयक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लोकसभा सदस्य के तौर पर अयोग्य घोषित होने से संरक्षण देने की नीयत से लाया गया था। यह अलग बात है कि बाद में सोनिया गांधी ने इस्तीफा दिया और फिर से चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंची। खैर, बाद में कलाम ने भी विधेयक को मंजूरी दे दी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की इच्छा के विरुद्ध कलाम ने गुजरात के दंगा पीड़ित इलाकों का दौरा करने का कार्यक्रम बनाया। एनडीए सरकार की इच्छा के विपरीत उन्होंने वहां का दौरा किया भी।

शायद यह लोकतंत्र की विडंबना है कि देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के लिए आप को राजनीति की सीढ़ी चढ़कर ही जाना है। वाजपेयी ने कलाम को देश के सर्वोच्च पद के लिए चुना। कलाम ने इस पद की गरिमा को बढ़ाया। इससे जुड़े अनावश्यक शिष्टाचार को दरकिनार करके इसे सही मायने में आम आदमी से जोड़Þने की एक नायाब कोशिश की। उनको देश के लिए अपनी यह भूमिका पसंद भी आई।

ऐसे में हैरत नहीं कि वे चाहते थे कि इस पद पर आगे सुशोभित रहें, लेकिन जैसे ही उनको यह अहसास हो गया कि इस पर पहुंच खालिस अंकगणित है, उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए। उनके नाम पर सभी घटक दलों में सहमति न होने के कारण वे इस दौड़ से बाहर हो गए। लेकिन ज्ञान के प्रचार की उनकी मैराथान जारी रही जिसमें ऐसे ही एक पड़ाव पर उन्होंने सोमवार को आइआइएम, शिलांग के परिसर में दम तोड़ दिया।

कलाम आज नहीं हैं। लेकिन यह रिक्तता महज उनके शरीर की है। उनकी मौजूदगी हमेशा रहने वाली है। देश-दुनिया के लिए अपने अमूल्य योगदान, प्रेरक ज्ञान के कारण वे सदा हमारे और हमारे बीच रहेंगे।

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