एक दौर ऐसा भी था जब अदालत की चौखट तक महिलाओं का पहुंचना असाधारण माना जाता था और न्यायाधीश की कुर्सी पर किसी महिला की कल्पना तक नहीं की जाती थी। कानून की दुनिया पुरुषों के वर्चस्व में थी जहां महिलाओं की भूमिका पर सवाल उठाए जाते थे। ऐसे समय में केरल की एक युवा वकील ने न केवल इन सामाजिक धारणाओं को चुनौती दी बल्कि भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा अध्याय लिखा जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए नए दरवाजे खोल दिए। उनका नाम था अन्ना चांडी…वह महिला जिन्होंने भारत की पहली महिला जज और बाद में पहली महिला हाई कोर्ट जज बनने का गौरव हासिल किया।

उनका सफर सिर्फ व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं बल्कि उस बदलाव की मिसाल है जिसने यह साबित किया कि न्याय की कुर्सी पर बैठने की योग्यता का संबंध लिंग से नहीं बल्कि प्रतिभा, ज्ञान और निष्पक्षता से होता है। अन्ना चांडी ने भारतीय न्याय व्यवस्था में महिलाओं की मौजूदगी का रास्ता खोला। जनसत्ता की स्पेशल सीरीज कोर्टरूम फाइल्स मेंं आज हम बात करेंगे भारत की पहली महिला जज अन्ना चांडी की।

जब कानून पढ़ना भी महिलाओं के लिए आसान नहीं था

20वीं सदी के शुरुआती दशकों में महिलाओं की शिक्षा सीमित थी और पेशेवर क्षेत्रों में उनकी भागीदारी बेहद कम। कानून की पढ़ाई करने वाली महिलाओं की संख्या तो उंगलियों पर गिनी जा सकती थी। अदालतों में महिला वकील भी विरले दिखाई देती थीं और जज बनने की कल्पना लगभग असंभव मानी जाती थी।

इसी माहौल में 1905 में उस समय त्रावणकोर कहे जाने वाले आज के केरल में जन्मी अन्ना चांडी ने उच्च शिक्षा हासिल की और कानून को अपना पेशा चुना। उन्होंने सरकारी लॉ कॉलेज, तिरुवनंतपुरम से कानून की पढ़ाई पूरी की और वकालत शुरू की।

कोर्टरूम फाइल्स सीरीज की अन्य कड़ियां पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

महिलाओं के अधिकारों की मुखर आवाज

अन्ना चांडी सिर्फ अदालत तक सीमित नहीं रहीं। वह महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी की प्रबल समर्थक थीं। उन्होंने लेखन के जरिए भी महिलाओं के अधिकारों पर खुलकर विचार रखे। उनके लेख उस समय की सामाजिक रूढ़ियों पर सवाल उठाते थे। उनका मानना था कि महिलाओं को केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित रखना समाज और लोकतंत्र- दोनों के लिए नुकसानदायक है।

चुनाव लड़ा, विरोध झेला

1930 के दशक में जब महिलाओं की सार्वजनिक जीवन में भागीदारी सीमित थी तब अन्ना चांडी ने त्रावणकोर की विधान परिषद का चुनाव भी लड़ा। शुरुआत में उन्हें हार का सामना करना पड़ा लेकिन बाद में वह परिषद की सदस्य बनीं। उनकी राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता ने उन्हें एक ऐसे चेहरे के रूप में स्थापित किया जो महिलाओं के अधिकारों की मजबूत पैरवी करता था।

भारत की पहली महिला जज बनने का ऐतिहासिक क्षण

1937 में अन्ना चांडी को त्रावणकोर की न्यायिक सेवा में मुंसिफ (Munsiff) नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति भारतीय उपमहाद्वीप के न्यायिक इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई क्योंकि वह न्यायिक सेवा में नियुक्त होने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।

हालांकि इस फैसले का विरोध भी हुआ। कुछ लोगों ने यह तर्क दिया कि महिलाएं न्यायिक दायित्व निभाने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। लेकिन अन्ना चांडी ने किसी बहस का जवाब भाषणों से नहीं बल्कि अपने काम से दिया।

पहली महिला हाई कोर्ट जज बनने तक का सफर

लगातार न्यायिक सेवा में बेहद शानदार प्रदर्शन के बाद 1959 में उन्हें केरल हाई कोर्ट का जज नियुक्त किया गया। इसके साथ ही वह भारत की पहली महिला हाई कोर्ट जज बन गईं। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि उस समय देश को स्वतंत्र हुए एक दशक से थोड़ा ही अधिक समय हुआ था और न्यायपालिका में महिलाओं की मौजूदगी लगभग नगण्य थी। उन्होंने 1967 तक हाई कोर्ट में न्यायाधीश के रूप में सेवाएं दीं।

न्याय के साथ सामाजिक बदलाव की सोच

अन्ना चांडी का मानना था कि कानून केवल विवाद सुलझाने का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी साधन है। महिलाओं की समानता, शिक्षा और सम्मान से जुड़े मुद्दों पर उनकी सोच अपने समय से काफी आगे मानी जाती थी।

अन्ना चांडी का मानना था कि कानून केवल विवाद सुलझाने का जरिया नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी साधन है। उन्होंने कई लेख और पुस्तकें भी लिखीं जिनमें महिलाओं की स्थिति, अधिकार और सामाजिक बदलाव जैसे विषय प्रमुख रहे।

आज क्यों याद की जाती हैं अन्ना चांडी?

आज भारतीय न्यायपालिका में हजारों महिलाएं वकील और सैकड़ों महिलाएं विभिन्न अदालतों में न्यायाधीश हैं। हालांकि शीर्ष अदालतों और उच्च न्यायालयों में उनकी संख्या अभी भी अपेक्षाकृत कम है। ऐसे समय में अन्ना चांडी का संघर्ष याद दिलाता है कि संस्थागत बदलाव अचानक नहीं आते। किसी एक व्यक्ति का साहस आने वाली पीढ़ियों के लिए नए रास्ते खोल सकता है।

भारत की पहली महिला जज के रूप में उन्होंने सिर्फ इतिहास नहीं रचा बल्कि यह भी साबित किया कि न्याय की कुर्सी पर बैठने की योग्यता का संबंध लिंग से नहीं, बल्कि क्षमता, ज्ञान और निष्पक्षता से होता है।

अन्ना चांडी के कुछ अहम फैसले

State of Kerala v. Samuel (1960)
इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत जांच और अभियोजन से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों पर फुल बेंच ने फैसला दिया। जस्टिस अन्ना चांडी इस पीठ का हिस्सा थीं। यह निर्णय भ्रष्टाचार के मामलों में जांच प्रक्रिया की वैधता और कानूनी प्रक्रिया को स्पष्ट करने वाला माना जाता है।

Bhargavi Amma Chellamma v. State of Kerala (1963)
यह हत्या के एक मामले से जुड़ी अपील थी। जस्टिस अन्ना चांडी और जस्टिस पी. गोविंद मेनन की पीठ ने साक्ष्यों और आपराधिक प्रक्रिया का गहन परीक्षण करते हुए निचली अदालत के फैसले को पलट दिया। यह फैसला इस बात का उदाहरण माना जाता है कि आपराधिक मामलों में केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।

State of Kerala v. Nanoo Vydian (1966)
इस मामले में आयुर्वेदिक दवा और आबकारी कानून (Excise Law) की व्याख्या से जुड़े प्रश्न थे। जस्टिस अन्ना चांडी ने अपने फैसले में कानून की तकनीकी व्याख्या और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला दिया।

यह भी पढ़ें: जब विश्व युद्ध में भारत नहीं लौट सके जज, लंदन में लिखा फैसला; कलकत्ता हाई कोर्ट में पढ़ा गया

भारतीय के न्यायिक इतिहास में कई ऐसे मुकदमे दर्ज हैं जिनकी कहानी किसी फिल्म से कम नहीं लगती। लेकिन भवाल संन्यासी मामला इन सबसे अलग था। एक राजकुमार जिसे मृत मान लिया गया था। करीब एक दशक बाद एक संन्यासी सामने आया जिसने खुद को वही राजकुमार बताया। सालों तक अदालतों में लड़ाई चली। दूसरे विश्व युद्ध के शुरू होने के चलते इस मामले की सुनवाई कर रहे जज भारत नहीं लौट पाए। लेकिन कोर्ट का काम नहीं रुका और जज ने इंग्लैंड में अपना फैसला तैार किया, उस पर हस्ताक्षर किए और निर्णय भारत भेज दिया गया। बाद में कलकत्ता हाई कोर्ट की खुली अदालत में पढ़ा गया।