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विश्लेषण: चुनावी बिसात पर प्यादा बना मीडिया

पुण्य प्रसून वाजपेयी सोलह मई 2014 की तारीख के बाद क्या भारतीय मीडिया पूंजी और खौफ तले दफन हो गया। इसका जवाब किस्तों में है। मसलन कांग्रेस की सत्ता के तीस बरस बाद जैसे ही नरेंद्र मोदी की सत्ता जनादेश से निकली वैसे ही मीडिया हतप्रभ हो गया। क्योंकि तीस बरस के दौर में दिल्ली […]

पुण्य प्रसून वाजपेयी

सोलह मई 2014 की तारीख के बाद क्या भारतीय मीडिया पूंजी और खौफ तले दफन हो गया। इसका जवाब किस्तों में है। मसलन कांग्रेस की सत्ता के तीस बरस बाद जैसे ही नरेंद्र मोदी की सत्ता जनादेश से निकली वैसे ही मीडिया हतप्रभ हो गया। क्योंकि तीस बरस के दौर में दिल्ली में सड़ा-गला लोकतंत्र था। इस लोकतंत्र में कोई तबका सत्ता का पसंदीदा हो गया तो किसी ने पसंदीदा तबके की आजादी पर ही सवालिया निशान लगाया। इसी लोकतंत्र ने कारपोरेट को लूट के हर हथियार दे दिए। मीडिया को भी दलाल बना दिया और नागरिक उपभोक्ता हो गए।

इस लोकतंत्र पर पत्रकारों की कलम चली और बिकी भी। मीडिया घराने ताकतवर हुए तो झटके में सत्ता साधने की राजनीति और कारपोरेट के मुनाफे के बीच पत्रकारिता झूली भी और हमला करने से भी नहीं चूकी । राजस्व की लूट व्यवस्था का हिस्सा बन गया। 2-जी स्पेक्ट्रम और बेल्लारी से झारखंड तक में खनन संपदा की लूट से लेकर कोयला खदानों के बंदरबांट का खुला खेल ‘पॉलीसी’ के तहत खेला गया जिसमें मीडिया संस्थानों की भागीदारी भी सामने आई। लेकिन पत्रकारिता ने इन मुद्दों को उठाया भी और भ्रष्ट होती सियासत को आईना भी दिखाया। ऐसे दौर में लोकसभा चुनाव के जनादेश ने उस मीडिया को सकते में ला दिया जिसके सामने बीते तीस बरस के संसदीय राजनीतिक सत्ता के अंतर्विरोध में काफी कुछ पाना था और काफी कुछ गंवाना भी था।

ध्यान दें तो मीडिया का विकास जिस तेजी से तकनीकी माध्यमों के जरिए इस दौर में होता चला गया उसके सामने वह सियासी राजनीति भी छोटी पड़ने लगी जो आम लोगों के एक-एक वोट से सत्ता पाती। मीडिया एक ऐसे दोधारी तलवार के तौर पर उभरा जिसमें सत्ता दिलाना और सत्ता से बेदखल कराने की भूमिका निभाना सौदेबाजी का सियासी खेल बना दिया गया। तो दाग दोनों जगह लगे। राजनेता दागदार दिखे। मीडिया घराने मुनाफा कमाने के धंधेबाज दिखे। लेकिन विकल्प की खोज की ताकत ना तो मीडिया के पास रही और ना ईमानदार नेताओं के पास।

ऐसे में 16 मई के जनादेश से पहले चुनावी बिसात पर मीडिया वजीर से कैसे प्यादा बना यह प्रचार के चुनावी तंत्र में पैसे के खेल ने आसानी से बता दिया। लेकिन यह खेल तो चुनावी राजनीति में हमेशा खेला जाता रहा है। माना यही गया कि 2014 में भी यही खेल खेला जा रहा है। लेकिन यह किसी को समझ नहीं आया कि जो पूंजी चुनावी राजनीति के जरिए लोकतंत्र के चौथे खंभे को कुंद कर सकती है, वही पूंजी जनादेश के साथ खड़े होकर लोकतंत्र को अपनी जरूरत के हिसाब से क्यों नहीं चला सकती।

सोलह मई के जनादेश के बाद पहली बार मीडिया का वह अंतर्विरोध खुल कर सामने आया जिसने राजनीति के अंतर्विरोध को छुपा दिया। संकट मीडिया के सामने आया कि अब सत्ताधारियों की गुलामी कर अपनी साख बनाए या सत्ताधारियों पर निगरानी रख अपनी खबरों से जनता को समझाए कि राजनीतिक सत्ता ही सबकुछ नहीं होती है। लेकिन इसके लिए पत्रकारिता की ताकत का होना जरूरी है। पत्रकारिता ही जब मीडिया घरानों की चौखट पर सत्ताधारियों के लिए पायदान में बदल जाए तो रास्ता किधर जाएगा। सत्ता के करीब जाने के लिए पायदान पर कब्जा करने की मुहिम कॉरपोरेट कल्चर का हिस्सा बनने लगी।

इसलिए 16 मई के जनादेश ने हर उस परिभाषा को बदला जो पिछले तीस सालों में गढ़ी गई। मीडिया घराने चलाने के लिए पूंजी बनाने के तरीके बदले। सत्ता और मीडिया के बीच पाठक या दर्शक के सोच को बदला। झटके में उस तबके का गुस्सा मीडिया का साथ छोड़ सत्ता के साथ जा खड़ा हुआ जो पिछले 30 साल से नैतिकता का पाठ मीडिया से पढ़ रहा था, लेकिन मीडिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिए उसके पास कोई हथियार नहीं था। ऐसे में जिस तरह 16 मई के जनादेश ने राजनीतिक सत्ता के उस दाग को छुपा दिया जो भ्रष्ट और आपराधिक होती राजनीति को लेकर देश का सच बन चुका है, उसी तरह गैर जिम्मेदाराना पत्रकारिता और सोशल मीडिया की जिम्मेदारी विहीन पत्रकारिता का दाग भी स्वतंत्र अभिव्यक्ति तले दब गया।
तीन बड़े बदलाव खुकर सामने आए। पहला जनादेश के सामने कोई तर्क मायने नहीं रखता है। दूसरा राजनीतिक सत्ता की ताकत के आगे लोकतंत्र का हर पाया विकलांग है। और तीसरा विचारधारा से ज्यादा अहम गवर्नेंस है।

यानी जो पत्रकारिता लगातार विकल्प की तलाश में वैचारिक तौर पर देश को खड़ा करने के हालात पैदा करती है उसे खुद सियासी सत्ता की लड़ाई लड़नी होगी। ये हालात कितने खतरनाक हो सकते हैं यह इससे समझा जा सकता है कि जब महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन बचेगा या नहीं इसके कयास लगाए जा रहे थे तब संघ के शिवसेना के साथ गठबंधन बनाए रखने की खबर से अपनी सियासी सौदेबाजी का दांव कमजोर पड़ने पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह खबर देने वाले पत्रकार को फोन पर यह धमकी देने से नहीं चूकते हैं कि यह खबर वापस ले लो या फिर अगले दिन इसके लिए भुगतने को तैयार हो जाओ। इतना ही नहीं, खबर को राजनीति का हिस्सा बताकर राजनीति के मैदान में आकर हाथ आजमाने का सुझाव भी दिया जाता है। कारपोरेट की छांव में पत्रकारिता को पायदान बनाने के बाद राजनीतिक सत्ता का पहला संदेश यही है कि चुनाव जीतकर सत्ता पाओ तो ही आपकी बात सही है। तो क्या 16 मई के बाद देश की हवा में सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि ढहते हुए संस्थानों को खड़ा करने की जगह मरता हुआ बताकर उसे विकल्प करार दिया जा सकता है। यहां कोई भी यह सवाल खड़ा कर सकता है कि मीडिया को दबाकर सियासत कैसे हो सकती है। लेकिन समझना यह भी होगा कि पहली बार मीडिया को दबाने या ना दबाने से आगे की बहस हो रही है।

सीबीआइ, सीवीसी, कैग, चुनाव आयोग, जजों की नियुक्ति सरीखे दर्जनों संस्थान हैं जिनके दामन पर दाग 16 मई से पहले चुनाव प्रचार के दौर में बार-बार लगाया गया। मीडिया भी दागदार है यह आवाज भी उठी। यानी जिस राजनीति के भ्रष्ट और आपराधिक होने तक का जिक्र 1992-93 में वोहरा कमेटी की रिपोर्ट में किया गया और संसद के भीतर पहुंचने वाले दागदारों की कतार में कोई कमी 16 मई के बाद भी नहीं आई। उस राजनीतिक सत्ता की चौखट पर इस दौर में हर संस्था बेमानी करार दे गई। यानी पत्रकार, वकील, टीचर, समाजसेवी या कोई भी जो चुनाव लड़ना नहीं चाहता है और अपने नजरिए से अपनी बात कहता है, उसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि सत्ता के पास बहुमत का जनादेश है।

यह सवाल राजनीतिक सत्ता के संघर्ष को लेकर भी है जहां सत्ताधारी को इस बार 31 फीसद वोट मिले हैं। सवाल उन पत्रकारों को लेकर भी है जो पत्रकारिता तो करते हैं और उनकी तादाद भी मीडिया हाउस में काम करने वालों से ज्यादा है। लेकिन उनकी पत्रकारिता को कोई महत्व नहीं दिया जाएगा और उन्हें भी उसी कठघरे में खड़ा किया जाएगा जहां पत्रकार पायदान बना दिया जा रहा है। इसके समानांतर तकनीकी विकास को ही विकल्प बनाने का प्रयास होगा चाहे देश की भौगोलिक, सामाजिक-आर्थिक स्थिति उसके अनुकूल ना हो। यानी मौसम बिगड़े, रोजगार ना मिले, चंद हथेलियों पर ही सारा मुनाफा सिमटे। समाज में खाई और ज्यादा बढ़े। विकास की तकनीकी धारा गांव खत्म कर दे, उपभोक्ताओं का समूह बनाए रखने या उसे बढ़ाने पर जोर हो। और यह सब होते हुए, देखते हुए पत्रकारिता सरकारों का गुणगान करे और इसे सकारात्मक पत्रकारिता मान लिया जाए। तो फिर 16 मई से पहले और 16 मई के बाद पत्रकारिता कैसे और कितनी बदली है इसका एहसास भी कहां होगा।

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