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विश्लेषण: जो लोकशाही के निगहबान थे, वे बन गए चारण

पुण्य प्रसून वाजपेयी साल भर पहले राष्ट्रपति की मौजूदगी में राष्ट्रपति भवन में ही एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल ने अपना पच्चीसवां जन्मदिन मना लिया। तब कहा गया कि मनमोहन सिंह का दौर है। कुछ भी हो सकता है। पिछले दिनों एक न्यूज चैनल ने अपने एक कार्यक्रम के 21 बरस पूरे होने का जश्न मनाया […]

Author December 6, 2014 10:03 AM
एक न्यूज चैनल ने अपने एक कार्यक्रम के 21 बरस पूरे होने का जश्न मनाया जिसमें कॉरपोरेट जगत से लेकर राजनीति और उद्योग जगत की हस्तियां मौजूद थी। (फ़ोटो-पाटाआई)

पुण्य प्रसून वाजपेयी

साल भर पहले राष्ट्रपति की मौजूदगी में राष्ट्रपति भवन में ही एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल ने अपना पच्चीसवां जन्मदिन मना लिया। तब कहा गया कि मनमोहन सिंह का दौर है। कुछ भी हो सकता है। पिछले दिनों एक न्यूज चैनल ने अपने एक कार्यक्रम के 21 बरस पूरे होने का जश्न मनाया तो उसमें राष्ट्रपति समेत प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट के अलावा नौकरशाह, कॉरपोरेट हस्तियां, बॉलीवुड से लेकर हर तबके के सत्ताधारी पहुंचे।

मोदी-काल के इस मंजर के बीच हर किसी को वाजपेयी का दौर भी याद आ गया। दशक भर पहले लखनऊ के सहारा शहर में कुछ इसी तरह हर क्षेत्र के आला लोग पहुंचे थे। अटल बिहारी वाजपेयी समेत पूरा मंत्रिमंडल वहां शोभायमान था। संसद के भीतर एक-दूसरे के खिलाफ तलवार भांजने वाला विपक्ष भी सहारा शहर पहुंचा था। इसी तर्ज पर संसद के भीतर मोदी सरकार को घेरने वाले कांग्रेसी भी दिल्ली के इस चर्चित मीडिया जलसे में पहुंचे। ‘पूंजीपरस्त याराना’ का यह अद्भुत नजारा समाज में ताकतवर होते मीडिया की अनकही कहानी को कहता है।

मीडिया कैसे बदलता है, यह 16 मई के जनादेश के बाद खुलकर सामने आने लगा है। इस जनादेश ने मीडिया के उस तबके को दरकिनार कर दिया जो राजनीति को विचारधारा तले परखते थे। पहली बार जनादेश के आईने में मीडिया की समूची रिपोर्टिंग ही पलटी और यह सीख भी देने लगी कि विचारधारा से आगे की जरूरत गवर्नेंस की है। यानी सब कुछ ठप होने वाले हालात से निपटने के लिए जनादेश ने एक ऐसे नायक को खोजा जिसने अपनी ही पार्टी के धुरंधरों को पराजित किया। पहली बार मीडिया बंटा भी । बिखरा भी। झुका भी, और अपनी ताकत से समझौता करते हुए दिखा भी। यह सब इसलिए कि राजनीति के नए- नए आधारों ने मीडिया की उसी कमजोर नसों को पकड़ा जिसे साधने के लिए राजनीति के अंतरविरोध का लाभ मीडिया ही हमेशा उठाता रहा।

सरकारी सब्सिडी के दायरे से न्यूज प्रिंट निकल कर खुले बाजार में आया तो हर बड़े अखबार के लिए हितकारी हो गया। छोटे-मझोले अखबारों के सामने अखबार निकालने का संकट आया। समझौते शुरूहुए। न्यू चैनल का लाइसेंस पाने के लिए 20 करोड़ कौन सा पत्रकार दिखा सकता है, यह सवाल कभी किसी मीडिया हाउस ने सरकार से नहीं पूछा। पत्रकार सोच भी नहीं पाया कि न्यू चैनल वह पत्रकरिता के लिए शुरू कर सकता है। पैसे वालों के लिए मीडिया पर कब्जा करना आसान हो गया या कहें जो पत्रकारिता कर लोकतंंत्र के चौथे खंबे को पाएदार रख सकते थे, वे हाशिए पर चले गए।

इस दौर में सियासत साधने के लिए मीडिया ताकतवर हुआ। सत्ता के ताकतवर होते ही मीडिया बिकने और नतमस्तक होने के लिए तैयार हो गया। जो मीडिया कल तक संसदीय राजनीति पर ठहाके लगाता था वही सत्ता के ताकतवर होते ही अपनी ताकत भी सत्ता के साथ खड़े होने में ही देखने-समझने लगा।

मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले यह सवाल अक्सर पूछा जाता था कि मीडिया से चुनाव जीते जाते तो राहुल कब के पीएम बन गए होते। यह धारदार बयान मीडिया और राजनीतिक प्रचार के बीच अक्सर जब भी दिया जाता पत्रकारिता हाशिए पर जाती हुई सी नजर आने लगती। लेकिन पत्रकारिता या मीडिया की मौजूदगी समाज में है ही क्यों, अगर इस परिभाषा को ही बदल दिया जाए तो कैसे-कैसे सवाल उठेंगे। मसलन, कोई पूछे- अखबार निकाला क्यों जाए , न्यूज चैनल चलाए क्यों जाएं।

यह एक ऐसा सवाल है जिससे भी आप पूछेंगे वह या तो आपको बेवकूफ समझेगा या फिर यही कहेगा कि यह भी कोई सवाल है। लेकिन 2014 के चुनाव के दौर में जिस तरह अखबार की अर्थव्यवस्था और न्यूज चैनलों के सरल मुनाफे राजनीतिक सत्ता के लिए होने वाले चुनावी प्रचार से जा जुड़े है, उसने अब खबरों के बिकने या किसी राजनीतिक दल के लिए काम करने के सोच को ही पीछे छोड़ दिया है।

लोकसभा चुनाव ने राह दिखाई और चुनाव प्रचार में कैसे, कहां, कितना, कब खर्च हो रहा है यह सब हर कोई भूल गया। चुनाव आयोग भी चुनावी प्रचार को चकाचौंध में बदलते तिलिस्म की तरह देखने लगा। खैर, आम चुनाव खत्म हुए तो लोकसभा का मीडिया प्रयोग कैसे उफान पर आया और उसने झटके में कैसे अखबार निकालने या न्यूज चैनल चलाने की मार्केटिंग के तौर तरीके ही बदल दिए, यह वाकई चकाचौंध में बदलते भारत की पहली तस्वीर है।

अब चुनाव का एलान होते ही राज्यों में अखबार और न्यूज चैनलों को पैसा पंप करने का अनूठा प्रयोग शुरू हो गया है। लोकसभा के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र में चुनाव हुए और फिर झारखंड और जम्मू-कश्मीर में। महाराष्ट्र चुनाव के वक्त बुलढाणा के एक छोटे से अखबार मालिक का टेलीफोन मेरे पास आया। उसका सवाल था कि अगर कोई पहले पन्ने को विज्ञापन के लिए खरीद लेता है तो अखबार में मास्टहेड कहां लगेगा और अखबार में पहला पन्ना हम दूसरे पन्ने को मानें या तीसरे पन्ने को, जो खोलते ही दाईं तरफ आएगा। अगर तीसरे पन्ने को पहला पन्ना मानकर मास्टहेड लगाते हैं तो फिर दूसरे पन्ने में कौन-सी खबर छापें क्योंकि अखबार में तो पहले पन्ने में सबसे बड़ी खबर होती है। मैंने पूछा, हुआ क्या? उसने बताया कि चुनाव हो रहे हैं तो एक राजनीतिक दल ने नौ दिन तक पहला पन्ना विज्ञापन के लिए खरीद लिया है।

खैर, उन्हें दिल्ली से निकलने वाले अखबारों के बारे में जानकारी दी कि कैसे यहां तो आए दिन पहले पन्ने पर पूरे पेज का विज्ञापन छपता है। और मास्टहेड हमेशा तीसरे पेज पर ही लगता है और वही फ्रंट पेज कहलाता है। यह बात भूलता, तब तक झारखंड के डाल्टनगंज से एक छोटे अखबार मालिक ने कुछ ऐसा ही सवाल किया और उसका संकट भी वही था। अखबार का फ्रंट पेज किसे बनाएं। वहां भी अखबार का पहला पेज सात दिन के लिए एकराजनीतिक दल ने बुक किया था। यानी पहली बार अखबारों को इतना बड़ा विज्ञापन थोक में मिल रहा है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती
बात सिर्फ विज्ञापन तक नहीं रुकी। अगला सवाल था कि इतने विज्ञापन से तो हमारा साल भर का खर्च निकल जाएगा तो इस पार्टी के खिलाफ कुछ क्यों छापा जाए? बहुत ही मासूमियत भरा यह सवाल भी था और जवाब भी। और संयोग से कुछ ऐसा ही सवाल और जवाब मिला, जब कश्मीर से निकलते एक अखबार के पहले पन्ने पर उर्दू में पूरे पेज पर छपा विज्ञापन देखा। मोदी की तस्वीर के साथ घाटी का चेहरा बदलने का सपना था।

उर्दू के शब्दों के बीच मोदी और पूरे पेज के विज्ञापन के लालच में संपादक का सवाल – क्या करें? इतना बड़ा विज्ञापन। इससे तो अखबार के सारे बुरे दिन दूर हो जाएंगे। और विज्ञापन छाप रहे हैं तो पार्टी के खिलाफ कुछ क्यों लिखें। वैसे भी चुनाव तो होते रहते हैं। नेता बदलते रहते हैं। घाटी में कभी तो कुछ बदला नहीं। तो हम किसी से कुछ मांग तो नहीं रहे, सिर्फ विज्ञापन चुनाव तक है। पैसे एडवांस में दे दिए गए हंै। सरकारी विज्ञापनों के तो पैसे भी मांगते-मांगते मिलते है। तो हमने सोचा है कि घाटी में क्या होना चाहिए और जनता किन मुश्किलों में है, इसी पर रिपोर्ट फाइल करेंगे। यानी नेता भ्रष्ट हो या आपराधिक छवि का, पार्टी की धारा कुछ भी हो। आतंक के साए से चुनावी उम्मीदवार निकला हो या आतंक फैलाकर चुनाव मैदान में उतरा हो। बहस कही नहीं, सिवाय सपने जगाने वाले चुनाव के आईने में लोकतंत्र को जीने की।

असर यही हुआ कि पूंजी कैसे किसकी परिभाषा इस दौर में बदल कर सकारात्मक छवि का अनूठा पाठ हर किसी को पढ़ा सकती है, यह कमोबेश देश के हर मीडिया हाउस में हुआ। इसका नायाब असर गवर्नेंस के दायरे में भ्रष्ट मीडिया हाउसों पर लगते तालों के बीच पत्रकार बनने के लिए आगे आने वाली पीढ़ियों के रोजगार पर पड़ा।

मनमोहन सिंह के दौर की आवारा पूंजी ने चिटफंड और बिल्डरों से लेकर सत्ता के लिए दलाली करने वालों के हाथों में चैनलो के लाइसेंस दिए। मीडिया का बाजार फैलने लगा। 16 मई के बाद पूंजी, मुनाफा चंद हथेलियों में सिमटने लगा तो मीडिया के नाम पर चलने वाली दुकाने बंद होने लगीं। सिर्फ दिल्ली में ही तीन हजार पत्रकार या कहें मीडिया के कामगार बेरोजगार हो गए। छह कारपोरेट हाउस सीधे मीडिया हाउसों के शेयर खरीद कर सत्ता के सामने अपनी ताकत दिखाने लगे या फिर मीडिया के नतमस्तक होने का खुला जश्न मनाने लगे।

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