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आजादी का अमृत महोत्सव: गाथा जन-गण-मन की

राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन…’ की रचना मौलिक रूप में रवींद्रनाथ ठाकुर ने बांग्ला भाषा में की थी।

आजादी का अमृत महोत्सव: गाथा जन-गण-मन की

हर देश के राष्ट्रीय प्रतीकों के पीछे कहानियां होती हैं। उनका इतिहास होता है। उनके बनने और स्वीकार किए जाने के पीछे लंबा संघर्ष होता है। हमारे राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान के पीछे भी लंबा इतिहास रहा है। उन्हें लेकर कभी मतभेद उभरे, तो उनमें संशोधन के रास्ते भी बने। हमारा राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान आज जिस रूप में स्वीकृत है, उनका शुरुआती स्वरूप ऐसा ही नहीं था। राष्ट्रगान के बनने और फिर अंतिम रूप में प्रस्तुत होने की कहानी बता रहे हैं राजेंद्र राजन।

राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन…’ की रचना मौलिक रूप में रवींद्रनाथ ठाकुर ने बांग्ला भाषा में की थी, जिसका हिंदी रूपांतरण 24 जनवरी, 1950 को ‘नेशनल एन्थम’ यानी राष्ट्रगान के रूप में अपना लिया गया था। राष्ट्रगान की स्वीकृति संविधान निर्माण के लिए गठित सभा ने की थी। ऐसा माना जाता है कि राष्ट्रगान की शब्द रचना और संगीत स्वयं रवींद्रनाथ ने 1911 में तैयार किए थे और इसे पहली बार कोलकाता में इंडियन नेशनल कांग्रेस के अधिवेशन में 27 दिसंबर, 1911 को प्रस्तुत किया गया था। यही नहीं, राष्ट्रगान के संपूर्ण संस्करण का बांग्ला से अंग्रेजी में अनुवाद हुआ था, तो इसमें संस्कृत भाषा के बहुत से कठिन शब्दों का प्रयोग किया गया था, जिसे उस समय साधुभाषा भी कहा जाता था, लेकिन जब रवींद्रनाथ के राष्ट्रगान को स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत परिष्कृत रूप में अपना लिया गया, तो इसकी अवधि केवल बावन सेकेंड थी। लेकिन राष्ट्रगान का संपूर्ण संस्करण पांच अंतरों में फैला हुआ है और इसकी अवधि तीन से पांच मिनट तक थी।

कांग्रेस अधिवेशन के बाद जनवरी 1912 में रवींद्रनाथ का यह गीत प्रकाशित रूप में लोगों के सामने आया। यह गीत ब्रह्म समाज की पत्रिका ‘तत्वबोधिनी’ में ‘भारत विधाता’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। इस पत्रिका के संपादक रवींद्रनाथ खुद थे। 1912 के जनवरी माह के उत्तरार्ध में ही ‘माघोत्सव समारोह’ में इस गीत को पुन: रवींद्रनाथ के जोड़ासांको स्थित अपने पैतृक घर में गाया गया था। उस जमाने में ‘जन गण मन’ की तुलना बांग्ला के लेखक और समाज सुधारक बंकिम चंद्र के एक अत्यंत लोकप्रिय गीत ‘वंदे मातरम्’ से की गई। राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा से ओतप्रोत गीत ‘वंदे मातरम्’ ने समस्त राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने का काम किया और यह गीत जन-जन की जुबान पर चढ़ गया था।

सन 1917 में कलकत्ता में पुन: कांग्रेस अधिवेशन संपन्न हुआ। यह सम्मेलन थियोसोफिकल सोसाइटी आफ इंडिया की संस्थापक ऐनी बेसेंट की अध्यक्षता में हुआ था। इसमें रवींद्रनाथ को भी संबोधन के लिए आमंत्रित किया गया था। उसमें सरला देवी ने पुन: ‘जन-गण-मन’ का गायन किया था। इस बार इसे स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरक गीत के रूप में गाया गया था। इसमें महाराज बहादुर नातोड़ ने भी संगीत प्रस्तुत किया था। और उनकी सहायता के लिए यह गीत प्रस्तुत किया गया था।

1919 में रवींद्रनाथ आंध्रप्रदेश में मदनपाले में स्थित थियोसोफिकल कालेज में आयरलैंड के कवि जेम्स एच काजिन्स के साथ पांच दिन रहे, जो उन दिनों कालेज के प्रधानाचार्य थे। 28 फरवरी, 1919 को रवींद्रनाथ ने स्वयं पहली बार कालेज के छात्रों और स्टाफ के समक्ष राष्ट्रगान गाकर प्रस्तुत किया। रवींद्रनाथ के स्वर में ‘जन-गण-मन’ की वह प्रथम प्रस्तुति थी। उस वक्त इसे आध्यात्मिक गीत के रूप पेश किया गया था। बांग्ला भाषा से रवींद्रनाथ ने स्वयं इस गीत का अनुवाद अंग्रेजी भाषा में किया था। फिर जेम्स एच काजिन्स की पत्नी मार्गरेट ने इसकी सरगम तैयार की और धुन भी बनाई थी।

वे पाश्चात्य संगीत में पारंगत थीं। मगर उनकी धुन भी वही थी, जो आज मौजूद है, कहना मुश्किल है। मारगरेट की म्यूजिक कंपोजीशन के बाद ‘जन-गण-मन’ हमारे देश की हदों को पार कर अंतरराष्ट्रीय संगीत प्रेमियों के दिलों में ख्याति प्राप्त करता चला गया। 14 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को इंडियन कान्स्टीच्येूंट असेंबली के अधिवेशन का आरंभ ‘वंदेमातरम्’ से हुआ और ‘जन-गण-मन’ से समापन हुआ था। ये कुछ ऐसे ऐतिहासिक तथ्य हैं, जिन्हें न तो झुठलाया जा सकता है और न ही बदला जा सकता है।

विवाद
रवींद्रनाथ ने ‘जन-गण-मन’ की रचना ब्रिटिश किंग जार्ज पंचम और महारानी मेरी की दिसम्बर 1911 में भारत की यात्रा के वक्त की थी। इसलिए कुछ लोगों का कहना था कि यह कविता भारतमाता के प्रति लगाव, प्रेम या भक्ति का संकेत कतई नहीं देती। उन लोगों की ‘अधिनायक’ शब्द पर आपत्ति जायज-सी प्रतीत होती है। ‘जन-गण-मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता…’ में ‘अधिनायक’ शब्द का प्रयोग क्यों हुआ, इसे लेकर अनेक राष्ट्रभक्तों को आपत्ति रही। ‘अधिनायक’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘लार्ड’’ या ‘रूलर’ है। यानी शासक। यानी जब यह कविता जार्ज पंचम के स्वागत में रवींद्रनाथ ने प्रस्तुत की थी, तो इसका अर्थ यह निकाला गया कि रवींद्रनाथ भारत में ब्रितानी हुकूमत के ‘लार्ड’ या ‘रूलर’की तारीफ कर रहे हैं।

1911 में भारत की तकदीर को तय करने वाला कौन था? स्पष्ट है, ब्रिटिश हुकूमत के अलावा दूसरा नहीं हो सकता, क्योंकि 1911 में भारत में उसी का राज था। यह गीत कांग्रेस पार्टी के दिसंबर 1911 में हुए कलकत्ता अधिवेशन के दूसरे दिन गाया गया था। यह सम्मेलन किंग जार्ज पंचम के प्रति लायल वेलकम यानी ‘निष्ठा स्वागत’ में प्रस्तुत किया गया था। 1905 में जार्ज-पंचम ने बंगाल का विभाजन किया था। अत: उनका धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए यह गीत प्रस्तुत किया गया था। ‘कलकत्ता कान्फ्रेंस’ जिसमें रवींद्रनाथ का यह गीत प्रस्तुत किया गया था, के दूसरे दिन के एजेंडा में विशेष तौर पर जार्ज पंचम के ‘निष्ठा स्वागत’ यानी लायल वेलकम के लिए समय निर्धारित किया गया था। यही नहीं, गीत की प्रस्तुति के उपरान्त सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसमें किंग जार्ज और महारानी मेरी का हार्दिक स्वागत किया गया था और कांग्रेस पार्टी ने उनके प्रति निष्ठा जाहिर की थी।

ऐसा प्रतीत होता है कि 1911 में कांग्रेस पार्टी में भारतवर्ष को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराने का जज्बा और जोश पैदा नहीं हुआ था और स्तुति गान के माध्यम से अंग्रेजी शासन को और पुख्ता किया जा रहा था। इस कथित आपत्तिजनक घटनाक्रम के सत्ताईस साल बाद 1939 में रवींद्रनाथ ने स्वयं को राष्ट्रभक्त के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया, क्योंकि जंगे-ए-आजादी की मशाल समूचे भारतवर्ष को रोशन करने लगी थी। ऐसे वक्त में रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे महान कवि, लेखक और विचारक के मन में यह विचार उत्पन्न होना स्वाभाविक था, कि वे एक सच्चे राष्ट्रभक्त हैं और देश के प्रति समर्पित हैं। इन सत्ताईस सालों से लगातार टैगोर जार्ज पंचम का गुणगान करने के दंश को झेलते आ रहे थे और अब वे पूरी तरह उसे उतार फेंकने की मानसिकता में आ चुके थे। लेकिन घटित इतिहास को तोड़-मरोड़ कर तो प्रस्तुत किया जा सकता है, पर ऐतिहासिक तथ्यों को चाह कर भी छिपाया नहीं जा सकता।

यह खेदजनक स्थिति है कि जो गीत करीब 111 सालों का सफर तय कर चुका है और यह एक सौ तीस करोड़ भारतवासियों के दिलों में राष्ट्रप्रेम की हिलोरें जागृत करने में सक्षम रहा है, इसकी शुरुआत एक विवाद से हुई थी। 27 दिसंबर, 1911 को पहली बार रवींद्रनाथ ठाकुर की भतीजी सरला देवी चौधरानी ने कुछ स्कूल छात्राओं के साथ यह गीत गाया था। तत्कालीन ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ के अध्यक्ष विश्व नारायण डार के समक्ष और अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की उपस्थिति में यह गीत प्रस्तुत किया गया था। उनमें भूपेंद्रनाथ बोस और अंबिका चरण मजूमदार भी शामिल थे।

1911 में इंग्लैण्ड से जार्ज चतुर्थ भारत आए थे और ऐसा माना जाता है कि उनकी शान और प्रशंसा में रवींद्रनाथ ने ‘जन-गण-मन’ गीत लिखा और गाया था। लेकिन 19 मार्च, 1939 को लिखे एक पत्र में रवींद्रनाथ ने स्पष्ट किया है कि ‘मैं स्वयं को अपमानित समझूंगा अगर मैं उन लोगों के प्रश्नों का उत्तर दूं, जो मुझे जार्ज चतुर्थ या जार्ज पंचम की प्रशंसा में यह गीत गाने का गलत श्रेय देते हैं।’ लेकिन रवींद्रनाथ की काव्य-यात्रा का गहराई से परख रखने वाले ‘राइटर्स’ न्यूज एजेंसी के पत्रकार और लेखक रवींद्रनाथ के विरुद्ध टिप्पणियां करने से कतई नहीं चूके। यों भी राइटर्स न्यूज एजेंसी की स्थापना और उसका संचालन इंग्लैंड में ही आरंभ हुआ था।

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