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सिंहस्थ स्नान: अमित शाह ने आगे बढ़ाया दलित एजंडा, वोट बैंक के लिए हर तरकीब अपना रही भाजपा

उत्तर प्रदेश में 11 फीसद दलित के बूते बसपा की मायावती और 11 फीसद यादव के बूते मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन सकते हैं तो 11 फीसद ब्राह्मण को अपने पक्ष में करके भाजपा या कांग्रेस की सरकार क्यों नहीं बन सकती है।
Author नई दिल्ली | May 13, 2016 02:21 am
भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने बुधवार (11 मई को उज्‍जैन में सिंहस्‍थ कुंभ में क्षिप्रा नदी के वाल्मीकि घाट पर दलित साधुओं के साथ स्नान किया।(Photo: ANI)

उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ में बुधवार को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने वाल्मीकि संत उमेश नाथ को आगे करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दलित एजंडे को आगे बढ़ाने का काम किया। संतों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आएसएस) परिवार के किसान संघ के विरोध के चलते समरसता स्नान भले ही संत समागम में बदला लेकिन भाजपा अध्यक्ष ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सहयोग से अमित शाह ने इस कुंभ में नई परंपरा डाल ही दी। भाजपा अपने वोट बैंक बढ़ाने के लिए हर तरकीब अपना रही है। अभी हो रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा को जो मिलेगा, वह उसकी उपलब्धि ही होगी। उसकी असली परीक्षा तो अगले साल होने वाले पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में होने वाली है जहां भाजपा के वोट बैंक बढ़े बिना उसे सत्ता नहीं मिल पाएगी।

पंजाब में तो देशभर में सबसे ज्यादा 22 फीसद दलित मतदाता हैं। उत्तर प्रदेश में 11 फीसद दलित मतदाताओं के बूते मायावती कई बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं तो 22 फीसद मतदाता वाले राज्य पंजाब में दलित मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता है। इसलिए भाजपा ने वहां दलित प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। कांग्रेस से अलग होने के बाद उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण बड़ी तादात में भाजपा से जुड़े लेकिन मजबूत स्थानीय नेतृत्व न होने के चलते वे अलग-अलग दलों में चले गए। यह आम धारणा बनी है कि उत्तर प्रदेश में 11 फीसद दलित के बूते बसपा की मायावती और 11 फीसद यादव के बूते मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन सकते हैं तो 11 फीसद ब्राह्मण को अपने पक्ष में करके भाजपा या कांग्रेस की सरकार क्यों नहीं बन सकती है। इस पर गंभीरता से चर्चा होने पर संतोषजनक सुझाव न आने पर उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जाति से अध्यक्ष बनाया गया।

फिर देश भर में दलितों को अपने पक्ष में करने की मुहिम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बड़े पैमाने पर डा. भीमराव अांबेडकर को देश-दुनियां में ज्यादा महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाने का अभियान चला रखा है। वैसे तो अांबेडकर को पूरे दलित समाज में आदर मिलता है लेकिन गैर वाल्मीकि उन्हें ज्यादा आदर देते हैं। वाल्मीकियों में ज्यादा मान्यता महर्षि वाल्मीकि की है।
अलग से वाल्मीकि समाज को जोड़ने में महर्षि वाल्मीकि को सबसे ज्यादा उपयोगी मान कर ही भाजपा ने सिंहस्थ कुंभ में पहली बार इस तरह का प्रयोग किया। जो संत और किसान संघ आदि इसका विरोध कर रहे थे, उनका कहना था कि कुंभ में तो हर जाति के लोग समान ढंग से स्नान करते रहे हैं।

कुंभ में आने वालों से कभी जाति नहीं पूछी जाती है। इससे हिंदू समाज विभाजित दिखेगा। इस विरोध से अमित शाह ने आयोजन के नाम में बदलाव किया और वाल्मीकि धाम के संत समागम में अन्य मठों के संतों को शामिल किया। फिर उनके साथ रातों रात वाल्मीकि घाट बनाकर स्नान किया। यह अलग बात है कि स्नान करने के समय समागम के सारे संत साथ स्नान करते नहीं दिखे। फिर भी एक संदेश जो भाजपा अध्यक्ष देने चाहते थे, वह लोगों में पहुंच गया। उन्होंने विरोध पर कोई सफाई नहीं दी, इस विषय को अलग अंदाज से पेश किया जैसे कोई नई बात हुई ही नहीं हो।

आयोजन में मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश समेत अनेक राज्यों से लोग खास कर महिलाएं बड़ी तादात में आई थीं और वे वाल्मीकि संत उमेश नाथ को सम्मानित किए जाने पर भाजपा की सराहना कर रही थी। अनेक महिलाओं ने मुखर होकर अपने समाज की उपेक्षा किए जाने की जानकारी दे रही थी। वाल्मीकि धाम को मध्य प्रदेश सरकार ने सात एकड़ जमीन दिया है जहां पर रातों-रात निर्माण करके सभागार, अतिथि निवास आदि बनाए गए हैं। पहले से बने मंदिर में उमेश दास के गुजरात मूल के गुरुमोहन दास की समाधि के अलावा महर्षि वाल्मीकि की भव्य फोटो लगाई गई है। पूरे सभागार और संत समागम के मंच पर शंकराचार्य और महाकाल के अलावा केवल दलित महापुरुषों के फोटो लगाए गए थे।

संतों के माध्यम से उनके समर्थकों को पार्टी में जोड़ने की तो भाजपा का पुराना इतिहास रहा है। कई साधु-संत सांसद, मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक बने हैं। श्री श्री रविशंकर या स्वामी रामदेव के माध्यम से उनके लोगों को जोड़ने का प्रयास तो 2014 के लोकसभा चुनाव में भी किए गए थे और उसमें भाजपा को काफी सफलता मिली भी है। भाजपा के समर्थक संतों में सवर्ण संतों के अलावा अन्य पिछड़ी जाति के संत भी बड़े पैमाने पर हैं लेकिन वाल्मीकि संत उमेश नाथ के बहाने दलित संत को आगे लाने का भाजपा का पहला बड़ा प्रयास उज्जैन सिंहस्थ कुंभ में दिखा। आयोजन स्थल पर कई लोग बता रहे थे कि उमेश नाथ के शिष्य पूरे हिंदी भाषी प्रदेश में हैं और जाहिर है कि उनमें ज्यादातर वाल्मीकि हैं। भाजपा वोट बैंक बढ़ाने के अभियान में क्या-क्या प्रयोेग कर सकती है, बुधवार को उज्जैन के आयोजन से इसे परखा जा सकता है।

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