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ऑक्सीजन लंगर: सांस है तो आस

कोराना महामारी ने हमें सिर्फ सेहत के मोर्चे पर ही नहीं घेरा है बल्कि इस कारण हमारी संवेदना भी कसौटी पर खरी नहीं उतरी है।

कोरोना मरीजों की मदद के लिए ‘आॅक्सीजन लंगर’ के तौर पर शुरू हुई इस पहल ने अब तक हजारों लोगों की डूबती सांसें लौटाई हैं। फाइल फोटो।

कोराना महामारी ने हमें सिर्फ सेहत के मोर्चे पर ही नहीं घेरा है बल्कि इस कारण हमारी संवेदना भी कसौटी पर खरी नहीं उतरी है। इस दौरान जिस तरह की मानवीय करुणा अपेक्षित रही, वह उस तरह से नहीं दिखी। अलबत्ता इस दौरान कई ऐसे छोटे-बड़े प्रयास जरूर हुए, जो उम्मीद बंधाते हैं।

कोविड-19 की दूसरी लहर के बीच देशभर में गुरुद्वारों ने लंगर संस्कृति को मानवीय सहायता की नई पहल का जिस तरह हिस्सा बनाया, उसकी आज हर तरफ सराहना हो रही है। कोरोना मरीजों की मदद के लिए ‘आॅक्सीजन लंगर’ के तौर पर शुरू हुई इस पहल ने अब तक हजारों लोगों की डूबती सांसें लौटाई हैं। इस दौरान देश के कई और धार्मिक स्थलों और संस्थआओं ने इसी तरह की पहल शुरू की है। बिहार में महावीर आरोग्य संस्थान ने आॅक्सीजन सिलेंडर से लेकर कोरोना मरीजों के लिए जरूरी दूसरी मदद को जिस तरह रातोंरात सर्वसुलभ बनाया, उसने एक बड़ी निराशा को तोड़ा है।

एक ऐसे समय में जब भारत में लोग खासी परेशानी से गुजर रहे हैं, अमेरिका और यूरोप में कार्यरत भारतीय समुदाय के चिकित्सकों के कई समूह कोरोना मरीजों की दिन-रात आॅनलाइन सहायता कर रहे हैं। जाहिर है कि ऐसी तमाम कोशिशें एक मुश्किल समय को हताशा में बदलने से रोकने में बड़ी भूमिका नभा रही हैं।

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