कोरोना में भी गाय पर रिसर्च में कोताही नहीं- देरी पर नाराज हुए स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री, मीटिंग में लगाई क्‍लास!

2016 में शुरू हुए कार्यक्रम में अब तक शून्य है प्रगति, हर्षवर्धन ने कहा-मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन से पहले ठोस प्रगति जरूरी।

Vaccination, Covid-19केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन। (फोटो- ट्विटर हैंडल)

गो-विज्ञान के काम में ढिलाई क्यों चल रही है? इस बात को लेकर केंद्रीय विज्ञान मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने विभिन्न मंत्रालयों को लताड़ लगाई है। एक वर्चुअल मीटिंग के दौरान उन्होंने गो-विज्ञान से जुड़े रिसर्च प्रोजेक्टों की मंजूरी और उन्हें धन मुहैया कराने में हो रही ढिलाई पर नाराजगी जताई। सरकार चाहती है कि अनुसंधान के जरिए भारतीय गायों और उनके उत्पादों की विशिष्टता वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित की जाए। विज्ञान मंत्री ने कहा कि इन प्रोजेक्टों का काम शीघ्रता के साथ, फास्ट-ट्रैक पर डालकर किया जाए। उनकी मंशा है कि प्रधानमंत्री के 15 अगस्त के भाषण के पहले गो-विज्ञान पर कुछ ठोस काम हो जाए।

इस मीटिंग पर अंग्रेज़ी न्यूज पोर्टल द प्रिंट ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि गो-विज्ञान का यह अंतर-मंत्रालय कार्यक्रम एक साल पहले शुरू किया गया था। इसमें विज्ञान एवं टेक्नॉलजी, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान, आयुष मंत्रालय तथा सीएसआइआर, आइसीएआर व आइसीएमआर जैसी सरकारी एजेंसियां शामिल हैं।

इस कार्यक्रम के मकसद में देसी गायों के उत्पादों (मूत्र और गोबर भी शामिल) से टूथपेस्ट, शैंपू और मॉस्किटो रेपलेंट जैसी चीज़ों को विकसित करने के अलावा कैंसर व डायबिटीज़ जैसी बीमारियों की दवा खोजना भी शामिल है।

डॉ हर्षवर्धन ने अफसोस जताया कि पांच साल पहले, 2016 में आइआइटी-दिल्ली में इस कार्यक्रम की रूपरेखा बनी थी लेकिन अब तक कोई प्रगति नहीं हुई है। आइआइटी दिल्ली में बनी रूपरेखा के बाद 2017 में यह कार्यक्रम साइंटिफिक वैलिडेशन एण्ड रिसर्च ऑन पंचगव्य (स्वरोप) नाम से शुरू हुआ था। आप जानते ही हैं कि पंचगव्य का माने होता है (गाय के) दूध, दही, घी, गोबर और मूत्र का मिश्रण।

कार्यक्रम बनने के बाद भी जब इसके तहत जब किसी प्रोजेक्ट की फंडिंग नहीं हुई तो इसे 2020 में एक बार फिर लॉन्च किया गया। नया नाम रखा गया, साइंटिफिक यूटिलाइज़ेशन थ्रू रिसर्च ऑगमेंटेशन प्राइम प्रोडक्ट्स फ्रॉम इंडिजनस काउज़। संक्षिप्त नाम हुआ सूत्रा-पिक।

लेकिन, नए नाम के बावजूद कार्यक्रम में प्रगति नहीं हुई। इसी कारण केंद्रीय मंत्री को क्षुब्ध होकर फटकार लगानी पड़ी। मीटिंग में कोविड-19 का तर्क मानने से इन्कार करते हुए उन्होंने पूछा कि अगर महामारी के बावजूद अन्य कामकाज हो सकता है तो गो-विज्ञान का काम क्यों नहीं?

उन्होंने साफ़ लफ़्ज़ों में ज़ोर देकर समझाया कि स्वदेशी गायों को आगे बढ़ाना नरेंद्र मोदी सरकार के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि हम लोग गाय के साथ भावनात्मक लगाव रखते हैं। दरअसल, देसी गाय और उसके उत्पादों में आर्थिक संभावनाएं भी बहुत ज़्यादा हैं।

उन्होंने दूध, दही, घी, गोबर और मूत्र के मिश्रण का जिक्र करते हुए कहा कि आयुर्वेद तो पंचगव्य के नाम से विख्यात इस मिश्रण के फ़ायदे हमेशा से जानता था लेकिन आजकल के लोगों को हर बात के लिए वैज्ञानिक आधार भी चाहिए। मंत्री ने अपनी सरकार की प्रशंसा करते हुए कहा कि 2019 में अगर मोदी सरकार दोबारा जीत कर न आती तो गो-विज्ञान का यह कार्यक्रम कूड़ेदान में फेंक दिया गया होता।

बाद में विज्ञान एवं टेक्नॉलजी सचिव आशुतोष शर्मा ने बताया कि फरवरी में प्रपोज़ल मांगे गए थे, जिसके जवाब में आए 337 प्रपोज़लों में 174 को शॉर्टलिस्ट किया गया है। मौजूदा समय में ये प्रपोज़ल कार्यक्रम में शामिल विभिन्न मंत्रालयों के पास पड़े हैं।

वर्चुअल मीटिंग के अंत में डॉ हर्षवर्धन ने कहा कि अब से वे कुछ महीनों के अंतराल में कार्यक्रम की नियमित समीक्षा किया करेंगे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के 15 अगस्त वाले संबोधन से पहले गो-विज्ञान कार्यक्रम में ठोस प्रगति आवश्यक है, क्योंकि इस बार भारत स्वतंत्रता दिवस की 75वीं सालगिरह मनाने जा रहा है।

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