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अमेरिकी थिंक टैंक एक्‍सपर्ट ने कहा- खाते में 6000 डालने से ज्‍यादातर किसानों का नहीं होगा भला, ज्‍यादा बोझ ही बढ़ेगा

एक्सपर्ट के मुताबिक भारत में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिससे साबित होता है कि किसी खास समूह तक किसी योजना विशेष का लाभ पहुंचाना कितना मुश्किल है।

Author February 5, 2019 8:06 PM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप में किया गया है।(Photo: REUTERS)

किसानों के पास कितनी जमीन है, इसके आधार पर उनको आर्थिक मदद देने से भारत की ग्रामीण आबादी के बहुत बड़े हिस्से को शायद ही फायदा पहुंचेगा। इससे असल समस्या का हल तो नहीं निकलेगा, लेकिन सरकार पर आर्थिक बोझ जरूर बढ़ जाएगा। यह राय एक अमेरिकी थिंक टैंक के एक्सपर्ट की है। बता दें कि मोदी सरकार ने हाल ही में भारत के करीब 12 करोड़ किसानों को 6 हजार रुपये सालाना की सीधी आर्थिक मदद देने का ऐलान किया था। अमेरिकी एक्सपर्ट सरकार द्वारा बजट में किए इस प्रस्ताव पर पूछे गए सवालों का जवाब दे रहे थे।

बता दें कि बजट में इस ऐलान से पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी सरकार में आने पर न्यूनतम आय की गारंटी देने का ऐलान किया था। एक्सपर्ट अंकित मुखर्जी ने विभिन्न दलों की इन कोशिशों को राजनीतिक नौटंकी करार दिया है। सेंट्रल फॉर ग्लोबल डिवलपमेंट थिंक टैंक के पॉलिसी फेलो मुखर्जी ने समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में कहा, ‘इस बात के प्रमाण हैं कि जमीन के मालिकाना हक के आधार पर किसानों को लक्षित करना ग्रामीण आबादी के बहुत सारे हिस्से को फायदा नहीं पहुंचाएगा। यह कदम राजनीतिक तौर पर बैकफायर भी कर सकता है अगर सरकार पहले से संपन्न किसानों की मदद करते हुए नजर आती है।’

मुखर्जी विकासशील देशों में गवर्नेंस, पब्लिक फाइनेंस और सर्विस डिलिवरी के मुद्दे पर काम के लिए जाने जाते हैं। वर्तमान में वह बायोमीट्रिक आईडी और डिजिटल पेमेंट सिस्टम के लोगों को मिल रही सरकारी सब्सिडी पर असर, वित्तीय समावेशन की बेहतरी आदि पर रिसर्च कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ”राहुल गांधी के न्यूनतम आय की गारंटी और सरकार के आय संबंधित सहयोग स्कीम को यूनिवर्सल बेसिक इनकम या यूबीआई कहना भ्रामक है। दोनों में ही शहरी गरीबों को पूरी तरह बाहर कर दिया जाता है, जिनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। राजनीतिक पार्टियां उन्हें प्रभावशाली वोट बैंक नहीं मानतीं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि इन योजनाओं का कोई आर्थिक आधार नहीं है।

मुखर्जी ने कहा कि इन्हें वैसे ही देखा जाना चाहिए जैसे कि वे हैं- ये चुनावों से पहले राजनीतिक नौटंकी से बढ़कर कुछ नहीं।’ मुखर्जी ने माना कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम का फायदा यह है कि इसके लिए किसी लक्षित समूह की आवश्यकता नहीं है। उनके मुताबिक, भारत में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिससे साबित होता है कि किसी खास समूह तक किसी योजना विशेष का लाभ पहुंचाना कितना मुश्किल है। ऐसा न होने पर गलत शख्स को योजना का लाभ मिलने, भ्रष्टाचार आदि की समस्याएं सामने आती हैं।

मुखर्जी के मुताबिक, जनोपयोगी योजनाओं से लाभांवित होने वाले समूह विशेष की पहचान करने की समस्या आधार और जनधन के जरिए भी दूर नहीं होगी। मुखर्जी ने कहा कि ‘आधी-अधूरी’ योजनाओं से फायदे से ज्यादा नुकसान होगा, फिर चाहे छोटे वक्त में या लंबे अंतराल में। उनके मुताबिक, इससे असल समस्या हल होने के बजाए अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा। उन्होंने कहा, ‘आप बस किसान कर्ज माफी के बारे में सोचें। इससे कितना नुकसान पहुंचा है लेकिन राजनेता यही समझते हैं कि यह वोट पाने का इकलौता तरीका है। मैं उम्मीद करता हूं कि कैश ट्रांसफर योजना के साथ ऐसा न हो।’

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