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Ambedkar Jayanti 2018: डॉ. भीमराव आंबेडकर के ये कोट्स कर सकते हैं SMS, Whatsapp

डॉ. अंबेडकर अक्सर लोगों से कहा करते थे कि जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती, वह कौम कभी भी इतिहास नहीं बना सकती। वो लोगों को भाग्य के बजाय अपने को मजबूत करने की बात किया करते थे।

डॉ. अंबेडकर (फाइल फोटो)

14 अप्रैल को संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की 127वीं जयंती है। इस मौके पर पूरा देश उन्हें नमन करते हुए उनके आदर्शों पर चलने की कसमें खा रहा है। डॉक्टर आंबेडकर का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान डॉक्टर आंबेडकर बचपन में ही अनाथ हो गए। इससे उनका बचपन गरीबी में बीता। थोड़े बड़े हुए तो सामाजिक दुत्कार और बहिष्कार का सामना करना पड़ा। बहुत मेधावी होने के बावजूद उन्हें क्लास के बाहर रहकर पढ़ने को विवश होना पड़ा। जातीय जकड़बंदी और छुआछूत के शिकार होने के बावजूद डॉक्टर आंबेडकर ने देश-विदेश में उच्च अध्ययन किया और कई विषयों में एमए किया। उनका पूरा जीवन एक दर्शन है। उन्होंने अपने भाषणों में तत्कालीन जातीय-सामाजिक व्यवस्था और व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ न केवल हमला बोला बल्कि लोगों को इसके खिलाफ जागरूक भी किया।

अछूतोद्धार के उद्देश्य से उन्होंने 1924 में ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ का गठन किया था। डॉ. आंबेडकर ने 1927 में 19-20 मार्च को सत्याग्रह करते हुए महाराष्ट्र के महाड में करीब पंद्रह हजार दलितों के साथ तालाब में प्रवेश कर दोनों हाथों से जल पिया था। इससे पहले दलितों के लिए जलस्रोत तक पहुंचना या छूना प्रतिबंधित था।

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Ambedkar Jayanti 2018:

इस घटना के बाद दोनों तरफ से लंबा संघर्ष चला। अंत में लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 17 मार्च, 1937 को तालाबों को दलितों के लिए भी खोल दिया गया। डॉ. आंबेडकर अक्सर लोगों से कहा करते थे कि जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती, वह कौम कभी भी इतिहास नहीं बना सकती। वो लोगों को भाग्य के बजाय अपने को मजबूत करने की बात किया करते थे।

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अपने भाषणों में भीम राव आंबेडकर कहा करते थे कि जीवन लंबा होने की बजाए महान होना चाहिए।

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वो कहते थे कि उदासीनता लोगों को प्रभावित करने वाली सबसे खराब किस्म की बीमारी है। ऐसा कहकर डॉ. आंबेडकर लोगों को हीनभावना से बाहर निकालना चाहते थे।

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जातीय भेदभाव का दंश झेल रहे आंबेडकर सामाजिक बदलाव चाहते थे। वो कहा करते थे कि किसी का भी स्‍वाद बदला जा सकता है लेकिन जहर को अमृत में परिवर्तित नही किया जा सकता।

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भीमराव आंबेडकर समाज में महिलाओं के उत्थान के प्रबल समर्थक थे। वो महिलाओं के उत्थान से ही किसी भी कौम का विकास मापते थे।

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आंबेडकर कहते थे कि रात रातभर मैं इसलिये जागता हूँ क्‍योंकि मेरा समाज सो रहा है। उनमें समाज को लेकर बड़ी पीड़ा थी। वो कहा करते थे, “इस दुनिया में महान प्रयासों से प्राप्‍त की गई चीज को छोडकर दूसरा कुछ भी बहुमूल्‍य नहीं है।”

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आंबेडकर ने राजनीति में प्रवेश पर कहा था, “मैं राजनीति में सुख भोगने नहीं बल्कि अपने सभी दबे-कुचले भाइयों को उनके अधिकार दिलाने आया हूँ।” वो कहते थे कि जो व्यक्ति अपनी मौत को हमेशा याद रखता है वह सदा अच्छे कार्य में लगा रहता है।

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आंबेडकर मनुवाद को जड़ से समाप्‍त करना चाहते थे। वो कहते थे कि जो धर्म जन्‍म से एक को श्रेष्‍ठ और दूसरे को नीच बनाए रखे, वह धर्म नहीं, गुलाम बनाए रखने का षडयंत्र है। आंबेडकर का कहना था, “मैं ऐसे धर्म को मानता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता, और भाईचारा सिखाए।”

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डॉ. आंबेडकर लोगों को कहा करते थे, “अच्छा दिखने के लिए मत जिओ बल्कि अच्छा बनने के लिए जिओ! मैं तो जीवनभर कार्य कर चुका हूँ अब इसके लिए नौजवान आगे आएं।” वो युवा वर्ग से अपील करते थे “मेरे नाम की जय-जयकार करने से अच्‍छा है, मेरे बताए हुए रास्‍ते पर चलें।”

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