इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने भरण-पोषण के मामले में एक मुस्लिम महिला को बड़ी राहत दी है। अदालत ने प्रयागराज परिवार न्यायालय के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें महिला को अपने दूसरे पति से भरण-पोषण नहीं मिलने की बात कही गई थी। दरअसल, निचली अदालत ने यह आदेश पारित किया था कि याचिकाकर्ता ने तलाक की प्रक्रिया कानूनी रूप से पूरी होने के पहले ही दूसरा निकाह कर लिया, इससे उसका अपने दूसरे पति से भरण-पोषण लेने का अधिकार समाप्त हो जाता है।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस आदेश को खाजिर कर दिया। अदालत ने तर्क दिया कि चूंकि महिला इस्लाम धर्म से ताल्लुक रखती है। ऐसे में मुस्लिम कानून के अनुसार तलाक उस तारीख से प्रभावी होता है जिस दिन तलाक का उच्चारण किया जाता है, बशर्ते कि वह कानून के अनुसार वैध हो। जस्टिस मदन पाल सिंह की एकल बेंच ने आदेश जारी करते हुए कहा कि यह पहले से ही स्थापित है कि जब एक पति तलाक का उच्चारण करता है और फिर कानूनी वैधता के लिए अदालत का रुख करता है तब अदालत केवल तलाक की डिक्री पास करता है।
आदेश में कहा गया कि ऐसे मामलों में तलाक की डिक्री आमतौर पर घोषणात्मक प्रकृति की होती है, जो केवल उस तलाक की स्थिति को मान्यता देती है या उसकी पुष्टि करती है, जो पहले ही हो चुका होता है। अदालत का आदेश फैसले की तारीख से कोई नया तलाक नहीं बनाता, बल्कि यह केवल यह घोषित करता है कि क्या तलाक पहले ही वैध रूप से दिया जा चुका था।
क्या है पूरा मामला ?
प्रयागराज निवासी हुमैरा रियाज ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की थी, जिसमें प्रयागराज परिवार न्यायालय के प्रधान जज के बीते साल 27 मई को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी। निचली अदालत के आदेश में महिला को उसके दूसरे पति से भरण-पोषण दिए जाने की मांग को अस्वीकार कर दिया गया था और केवल उसके दो नाबालिग बेटों को भरण-पोषण दिए जाने का आदेश दिया गया था।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने बताया कि हुमैरा ने साल 2002 के फरवरी में अब्दुल वाहिद अंसारी से निकाह किया था, जिन्होंने 27 फरवरी, 2005 उसे तलाक दे दिया। बाद में अंसारी ने पारिवारिक न्यायालय में एक “घोषणात्मक वाद” दायर किया, जिसने 8 जनवरी, 2013 को 2005 के तलाक को वैध घोषित कर दिया।
अधिवक्ता ने आगे बताया कि याचिकाकर्ता ने ‘इद्दत’ (मुस्लिम कानून के तहत तलाक या पति की मृत्यु के बाद महिलाओं के लिए अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि) की अवधि पूरी करने के बाद 27 मई, 2012 को मोहम्मद दाऊद के साथ दूसरा निकाह किया। यह भी कहा गया कि मोहम्मद दाऊद को याचिकाकर्ता के पहले पति से हुए तलाक के बारे में पूरी जानकारी थी।
अधिवक्ता ने आगे बताया कि इस दूसरे निकाह से महिला को दो बेटे हुए। उन्होंने आगे कहा कि दूसरे पति ने खुद ही उनकी पहली शादी के साथ-साथ दोनों बेटों की पितृत्व को भी स्वीकार किया था। इसलिए, उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच हुई शादी को अमान्य मानने में एक स्पष्ट त्रुटि की है।
उन्होंने बताया कि पति जो केंद्र सरकार का कर्मचारी है, वह अच्छे पैसे कमाता है। इसके बावजूद वो पत्नी और दो नाबालिग बेटे को भरण-पोषण देने को राजी नहीं है। परिवार न्यायालच ने भरण-पोषण के दावे को मुख्य रूप से इस आधार पर खारिज कर दिया कि दूसरी शादी की तारीख तक पहली शादी कानूनी रूप से खत्म नहीं हुई थी।
हालांकि, दूसरे पति के वकील ने यह दलील दी कि हुमैरा की पहली शादी तब तक जारी रही, जब तक 8 जनवरी, 2013 को फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक का आदेश पारित नहीं कर दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि उस शादी के कायम रहने के दौरान, उसने अपने पहले पति से गुजारा भत्ता पाने के लिए केस दायर किया था, और उसे हर महीने 2,000 रुपये का गुजारा भत्ता मंजूर भी हुआ था, जिसके लिए एक ‘एग्जीक्यूशन केस’ भी दायर किया गया था।
बचावपक्ष के वकील ने दलील दी कि वादी ने इस अहम बात को छिपाते हुए और अपने पहले पति से कानूनी तौर पर तलाक लिए बिना ही दूसरा निकाह कर लिया। उन्होंने यह तर्क दिया कि चूंकि उसके पहले पति से तलाक का आदेश 8 जनवरी, 2013 को ही मिला था, और ‘इद्दत’ की अवधि का पालन करने की अनिवार्य शर्त भी पूरी नहीं की गई थी, इसलिए दूसरी शादी (27 मई, 2012 को) मोहम्मडन कानून के तहत अमान्य थी।
दोनों पक्षों की दलीलों को सुनते हुए उच्च न्यायालय ने यह माना कि ऐसा प्रतीत होता है कि परिवार न्यायालय द्वारा इस आधार पर भरण-पोषण के दावे को मुख्य रूप से खारिज कर दिया गया कि तलाक की घोषणा करने वाला आदेश बाद में पारित हुआ था। ऐसे में दूसरी शादी अमान्य थी।
जस्टिस सिंह की बेंच ने टिप्पणी की, “पारिवार न्यायालय द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली, उस स्थापित कानून स्थिति के अनुरूप प्रतीत नहीं होती, जिसके अनुसार ऐसे मामलों में पारित डिक्री मात्र एक घोषणात्मक आदेश होती है और उसका प्रभाव ‘तलाक’ के उच्चारण की तिथि से ही माना जाता है।”
अदालत ने आगे टिप्पणी की कि इस मामले पर पारिवारिक न्यायालय द्वारा पुनर्विचार किए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए कथित तौर पर पहले दिए गए तलाक के प्रभाव, घोषणात्मक कार्यवाही में पारित डिक्री की प्रकृति और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य साक्ष्यों की उचित जांच-परख की जानी चाहिए।
उच्च न्यायालय के आदेश में कहा गया, “यह मामला प्रधान जज, फैमिली कोर्ट को वापस भेजा जाता है ताकि वे दोनों पार्टियों को सुनने का मौका दें। साथ ही ऊपर कही गई बातों को ध्यान में रखते हुए कानून के हिसाब से रिविजनिस्ट के मेंटेनेंस के दावे पर नए सिरे से मेरिट के आधार पर फैसला कर सकें।”
बेंच ने आगे कहा, “उम्मीद है कि फैमिली कोर्ट इस मामले पर जल्द से जल्द फैसला करने की कोशिश करेगा, बेहतर होगा कि इस ऑर्डर की सर्टिफाइड कॉपी पेश करने की तारीख से छह महीने के अंदर।”
