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संघर्ष : अफगानिस्तान में हिंदू और सिखों का जीना दूभर

एक रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में 650 से भी कम सिख और हिंदू बचे हैं। 1980 की शुरुआत में जब तक मुजाहिदीनों ने देश में अपनी जड़ें नहीं जमाई थीं, तब तक अफगानिस्तान में हिंदू और सिखों की संख्या करीब दो लाख 20 हजार के आस-पास थी। मुजाहिदीनों के आतंक के कारण संख्या में तेजी से कमी आई। 1990 के दशक में जब तालिबान ने देश पर कब्जा किया, तब तक हिंदुओं की संख्या हजारों में आ चुकी थी।

अफगानिस्तान में सिखों समेत सभी अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और हमले की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।

अफगानिस्तान में सिख और हिंदू कुछ ही सौ बचे हैं। ज्यादातर लोग जान बचाकर भारत आ गए हैं। उनका भागकर आना अरसे से जारी है। हाल में अफगानिस्तान के सिख नेता निदान सिंह सचदेवा के भागकर आने के बाद वहां के हिंदू और सिखों की हालत अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में है। हाल में तालिबान ने सचदेवा को अगवा कर लिया था। भारत सरकार के दखल के बाद सचदेवा को छोड़ा गया। वह हमेशा के लिए परिवार समेत भारत आ गए हैं।

सचदेवा के मामले को भारत सरकार ने कितनी गंभीरता से लिया- यह इसी बात से जाहिर है कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने सचदेवा को 18 जुलाई को आजाद करा लेने के बाद अफगानिस्तान सरकार और कबायली सरदारों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि बाहरी समर्थकों के इशारे पर आतंकवादियों द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को निशाना बनाना और उनका उत्पीड़न करना गंभीर चिंता की बात है। इस कारण भारत ने अपनी सुरक्षा को खतरा महसूस कर रहे हिंदू और सिख समुदाय के लोगों को भारत वापसी में सहायता देने का फैसला किया है।

दरअसल, अफगानिस्तान में सिख और हिंदू बहुत कम ही बचे हैं और ज्यादातर भागकर भारत में शरण ले चुके हैं। जो वहां हैं भी, उनके साथ उत्पीड़न और धार्मिक प्रताड़ना की घटनाएं होती रहती हैं। धार्मिक स्थलों को आतंकी गुट निशाना तक बनाते आए हैं। इसी साल मार्च में आतंकियों ने राजधानी काबुल में गुरुद्वारे पर हमला किया था, जिसमें 25 लोगों की मौत हो गई थी। इस गुरुद्वारे पर आतंकी हमले के बाद सचदेवा का अपहरण सिखों से जुड़ी दूसरी सबसे बड़ी घटना थी। अफगान युद्ध के बाद से ही वहां सिख और हिंदुओं पर अत्याचार जारी है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में 650 से भी कम सिख और हिंदू बचे हैं। 1980 की शुरुआत में जब तक मुजाहिदीनों ने देश में अपनी जड़ें नहीं जमाई थीं, तब तक अफगानिस्तान में हिंदू और सिखों की संख्या करीब दो लाख 20 हजार के आस-पास थी। मुजाहिदीनों के आतंक के कारण संख्या में तेजी से कमी आई। 1990 के दशक में जब तालिबान ने देश पर कब्जा किया, तब तक हिंदुओं की संख्या हजारों में आ चुकी थी।

कंधार, गजनी, नंगरहार, खोस्त और पकतिया जैसे प्रांतों में सिखों के कारोबार और जमीन थे। लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद सैकड़ों सिख दूसरे देश जाने पर मजबूर हो गए। कुछ यूरोपीय देशों में तो कुछ भारत पहुंच गए। अब यहां सिखों के कुछ सौ परिवार ही बचे रह गए हैं। माना जाता है कि करीब 30-40 साल पहले अफगानिस्तान में लगभग ढाई लाख सिख समुदाय के लोग रहते थे। उस दौरान सिख समुदाय के लोग सरकारी नौकरियों और राजनीति में भी थे। सिख वहां की सेना में जनरल के ओहदे पर भी रह चुके हैं।

सिख सदियों से अफगानी समाज का हिस्सा रहे हैं। कारोबार में सिखों का मजबूत दखल रहा है। राजनीति में भी दखल रहा। तीन साल पहले अफगानिस्तान ने तय किया कि संसद में एक सीट सिखों के लिए रखी जाएगी। इसके बाद नरिंदर सिंह खालसा को नामित किया गया। वे अवतार सिंह खालसा के बड़े बेटे हैं। अवतार ने अफगानिस्तान में 2018 में संसदीय चुनाव के लिए नामांकन किया था, लेकिन कुछ ही दिन बाद 2018 के जून में जलालाबाद में हुए एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई थी। अफगानिस्तान में हिंदू और सिख चुनाव में पूरे देश में केवल एक ही सीट के लिए चुनाव लड़ सकते हैं।

अफगानिस्तान की मीडिया के मुताबिक, अब जो सिख और हिंदू वहां से भारत या यूरोपीय देशों को पलायन कर रहे हैं, उनके घर और जमीन पर तालिबान समर्थित माफिया कब्जा कर ले रहा है। कई साल से अफगान सरकार इस कोशिश में लगी हुई है कि इन संपत्तियों को माफिया से छुड़ाया जाए, ताकि लौटने पर उन परिवारों को संपत्ति वापस कर दी जाए। पिछले दो साल में खोस्त और पकतिया में कुछ सिख परिवार लौटे भी हैं, लेकिन अब उनमें भी डर बढ़ रहा है।

कैसे मुश्किल हुए हालात : अफगानिस्तान रणनीतिक तौर पर ऐसी जगह पर है, जो व्यापार के मुख्य रूट के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा। कुछ दशकों के दौरान तालिबान और कट्टर इस्लामिक संगठनों ने यहां अल्पसंख्यकों का रहना दूभर कर दिया। तालिबान और फिर अल-कायदा ने अफगानिस्तान को अपना गढ़ बनाया और एक-एक कर इतिहास की धरोहरों को खत्म करते चले गए।

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