महाराष्ट्र में भीषण गर्मी पड़ रही है। रविवार को पुणे में पारा 41.4 डिग्री के पार पहुंच गया, जिससे शहर में मई महीने में बीते 10 साल की गर्मी का रिकॉर्ड टूट गया। झुलसाने वाली गर्मी से बचने के लिए अधिकतर लोगों ने घर में ही रहना बेहतर समझा। हालांकि, राज्य के फूड डिलीवरी वर्कर के पास काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

पुणे और मुंबई की सड़कों पर इन राइडरों ने घंटों बिताए। सिर पर हेलमेट लगाए और पीठ पर बस्ता टांगे यह कड़ी धूप में एक के बाद एक फूड ऑर्डर की डिलीवरी करते रहे ताकि शहर के लोगों की भूख मिट सके। इंसेंटिव का स्ट्रक्चर इन्हें दिन के सबसे गर्म घंटों में भी काम से ब्रेक नहीं लेने के लिए बाध्य करता है। पुणे का कात्रज-बिबवेवाड़ी क्षेत्र में स्विगी फूड डिलीवरी एजेंट के तौर पर काम करने वाले राजू घूबे ने समझाया कि कैसे पूरा सिस्टम काम करता है।

उन्होंने बताया, “मैं दोपहर और शाम की शिफ्ट में काम करता हूं। दोपहर की 12 से शाम 4 बजे की शिफ्ट के दौरान कम े कम 2 घंटे 45 मिनट काम करना अनिवार्य है। ऐसा करने पर इंसेंटिव मिलता है। अगर इससे एक मिनट भी कम काम करो तो इंसेंटिव नहीं मिलता। लेकिन इसी समय गर्मी अपने चरम पर होती है। लू के थपेड़ों के बीच काम करना कष्टदायी होता है।”

मुंबई में सात मई से ही आईएमडी गर्मी को लेकर येलो अलर्ट जारी कर रहा है। यहां जोमैटो के लिए 12 घंटे की शिफ्ट में काम करने वाले तेजस पाटिल ने बताया कि छोटा ब्रेक लेने पर भी कीमत चुकानी पड़ती है। उन्होंने कहा, “अगर मैं 5-10 मिनट के लिए भी पानी पीने या छांव में बैठने के लिए रुकुंगा तो प्लेटफॉर्म खुद से ही मेरा अगला ऑर्डर कैंसल कर सकती है। अगर दो ऑर्डर कैंसल या रिजेक्ट हो जाते हैं, तो मेरा उस दिन का इंसेंटिव भी चला जाएगा।”

पाटिल शिफ्ट के दौरान खुद को अंदर पहनने के वस्त्र और सिर के स्कार्फ से ढक कर रखते हैं। वहीं, पूरी शिफ्ट के दौरान पानी की बोतल साथ रखते हैं। स्विगी फूड डिलीवरी पार्टनर सलित मुखिया रोजाना 200 रुपये सब्जा के दानों, खीरा और जूस पर खर्त करते हैं, ताकि वो पूरे दिन हाइड्रेटेड रह सकें। जोमैटो के फाउंडर दीपिंदर गोयल द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार उनकी संस्था में काम करने वाले डिलीवरी पार्टनर महीने में कुल 26,500 कमाते हैं। हालांकि, कटौतियों के बाद यह राशि 21 हजार रुपये ही रह जाती है। हालांकि, गर्मी के कारण उनके खर्च बढ़ गए हैं।

पुणे में शिवाजीनगर इलाके में डिलीवरी करने वाले परशुराम कांबले बताते हैं कि दोपहर की तपती गर्मी में उनकी रोजमर्रा की जद्दोजहद कैसी होती है। वह कहते हैं, “यहां बहुत कम पार्क हैं और वे भी दोपहर में बंद रहते हैं। ऐसे में धूप से बचने के लिए हमें जगह-जगह ठिकाने ढूंढ़ने पड़ते हैं।”

मुंबई में रेस्तरां के भीतर थोड़ी राहत मिलना भी हालात पर निर्भर करता है। जोमैटो डिलीवरी पार्टनर अजीत खोपे कहते हैं, “अगर रेस्तरां में ज्यादा भीड़ नहीं होती, तो मैनेजर कभी-कभी ऑर्डर तैयार होने तक हमें एयर-कंडीशंड हिस्से में बैठने देते हैं। लेकिन जैसे ही ग्राहक आने लगते हैं, हमें बाहर इंतजार करने को कहा जाता है।”

मुंबई के एक स्विगी डिलीवरी वर्कर ने तेज गर्मी के कारण गंभीर पेट दर्द और दस्त होने पर दो दिन की छुट्टी ली। उन्होंने कहा, “मुझे हीट-इंड्यूस्ड डायरिया हो गया था,” और इलाज का खर्च खुद उठाना पड़ा। स्विगी का कहना है कि वह अपने डिलीवरी पार्टनर्स को बीमा सुविधाएं देती है, जिनमें दुर्घटना कवर और आउटपेशेंट कंसल्टेशन शामिल हैं। हालांकि, कई डिलीवरी वर्कर्स का आरोप है कि अस्पताल में भर्ती हुए बिना सामान्य इलाज के खर्च की भरपाई नहीं होती।

हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने हीटवेव के दौरान असंगठित क्षेत्र के आउटडोर वर्कर्स के लिए एडवाइजरी जारी की थी। इसमें काम के समय को ठंडे घंटों में शिफ्ट करने, पानी के बूथ लगाने और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए ओआरएस बांटने जैसी सिफारिशें शामिल थीं। हालांकि यह SOP राज्य के 15 हाई-हीट रिस्क शहरी जिलों के लिए थी, जिसमें मुंबई और पुणे शामिल नहीं थे।

‘एल्गोरिदम हमारा दर्द नहीं समझ सकता’

सबसे ज्यादा मुश्किल दिव्यांग डिलीवरी वर्कर्स को झेलनी पड़ रही है। पुणे के भारती विद्यापीठ इलाके में जोमैटो के लिए काम करने वाले गिरीश पाटेकर बैटरी से चलने वाली व्हीलचेयर का इस्तेमाल करते हैं। 2018 में स्पाइनल इंजरी के कारण उनके शरीर का निचला हिस्सा प्रभावित हो गया था।

वह कहते हैं, “मेरे पास काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। चाहे भीषण गर्मी हो, कड़ाके की ठंड हो या तेज बारिश क्योंकि परिवार की जिम्मेदारी मुझ पर है।” जहां उनके साथी रोज 15 से 30 ऑर्डर पूरे कर लेते हैं, वहीं वह सिर्फ चार या पांच ऑर्डर ही कर पाते हैं। शाम के ट्रैफिक में उनकी व्हीलचेयर की बैटरी तेजी से खत्म होती है, जिससे उन्हें दोपहर की झुलसा देने वाली गर्मी में काम करना पड़ता है।

पुणे के आकुर्डी इलाके में काम करने वाले एक अन्य दिव्यांग जोमैटो राइडर प्रमोद पावडे कहते हैं, “हीटवेव के दौरान हालात और खराब हो जाते हैं। लंबे समय तक धूप में रहने से डिहाइड्रेशन, थकान और चक्कर आने लगते हैं। लेकिन ऐप का एल्गोरिदम हमारा दर्द नहीं समझ सकता।”

सवालों के जवाब में जोमैटो ने कहा कि उसके डिलीवरी एजेंट्स देशभर में 5,000 से ज्यादा रेस्ट पॉइंट्स का इस्तेमाल कर सकते हैं जो रेस्तरां, पेट्रोल पंप और सर्विस स्टेशनों के पास बनाए गए हैं। यहां पानी, छायादार बैठने की जगह और वॉशरूम जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

पिछले महीने कंपनी ने 14 शहरों में 2,500 राइडर्स के लिए कूलिंग वेस्ट्स का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया था, जिन्हें 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान में इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया है। हालांकि कंपनी के लगभग 4.73 लाख सक्रिय डिलीवरी पार्टनर्स की तुलना में यह पहल बहुत सीमित है। जिन राइडर्स से बातचीत की गई, उनमें से ज्यादातर को इस योजना की जानकारी ही नहीं थी।

ब्लिंकिट राइडर्स को डार्क स्टोर्स में बने ब्रेक रूम्स का इस्तेमाल करने की सुविधा दी जा रही है, जबकि 50 प्रतिशत डार्क स्टोर्स में मुफ्त मेडिकल कंसल्टेशन भी उपलब्ध कराया जा रहा है।

वहीं स्विगी का कहना है कि वह अपने डिलीवरी वर्कर्स को कूलिंग वेस्ट्स, ग्लूकोज युक्त पानी और ग्लूकोज सैशे उपलब्ध करा रही है। कंपनी ने यह भी कहा कि लंच पीक ऑवर्स के दौरान लॉगिन नियमों में ढील दी गई है।

कंपनी के प्रवक्ता के मुताबिक, “राइडर्स किसी भी समय बिना किसी पेनाल्टी या देरी के ऑफलाइन जा सकते हैं।” हालांकि, एक डिलीवरी वर्कर घुबे ने दावा किया कि उन्हें न तो कूलिंग वेस्ट मिला और न ही ग्लूकोज सैशे। उन्होंने कहा, “मुझे स्विगी की तरफ से कुछ भी नहीं मिला।” लॉगिन नियमों में ढील को लेकर पूछे गए सवाल पर कंपनी ने आगे कोई जवाब नहीं दिया।

(कुछ नाम अनुरोध पर बदले गए हैं।)