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Alauddin Khalji Story: कैसे पद्मावती का दीवाना बना था अलाउद्दीन खिलजी, इतिहास में दर्ज है ये कहानी

Alauddin Khalji History: चित्तौड़गढ़ और दिल्ली सल्तनत के बीच युद्ध हुआ, जिसमें राजा रतन सिंह की हार तय दिख रही थी। इधर, महल में रानी पद्मावती और अन्य राजपूत रानियों ने अलाउद्दीन की गुलामी से बचने और राजपूत धर्म निभाते हुए जौहर होने का फैसला किया।

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चित्तौड़गढ़ के राजा रतन सिंह के दरबार से भगाए जाने के बाद राघव चेतन ने दिल्ली जाकर अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में शरण ले ली थी और धीरे-धीरे वह सुल्तान के काफी करीब हो गया था। उसने इस दौरान रानी पद्मावती की सुंदरता की कहानियां अलाउद्दीन खिलजी को सुनाना शुरू किया। रानी के बारे में सुनकर सुल्तान उसे देखने के लिए बेकरार हो गया। इसके बाद वह एक दिन अपने सैनिकों को साथ लेकर चितौड़गढ़ के लिए प्रस्थान कर दिया। चितौड़गढ़ पहुंचकर अलाउद्दीन खिलजी ने सैनिकों समेत चितौड़गढ़ किले के पास डेरा डाल दिया और राजा को संदेशा भिजवाया कि दिल्ली सल्तनत के सुल्तान रानी पद्मावती की एक झलक देखना चाहते हैं। इसके बाद वह दिल्ली लौट जाएंगे। खिलजी के इस संदेश से चितौड़गढ़ में खलबली मच गई, राजा रतन सिंह भी असहज हो गए क्योंकि राजपूतों की परंपरा के मुताबिक महिलाएं गैर मर्दों के सामने नहीं जा सकती थीं लेकिन राजा रतन सिंह को इस बात की भी आशंका थी कि अगर इनकार किया गया तो सुल्तान उनके राज्य पर आक्रमण कर देगा। इसलिए अपने राज्य और प्रजा को बचाने के लिए राजा रतन सिंह ने सुल्तान का प्रस्ताव मान लिया।

इधर रानी पद्मावती सुल्तान के आमने-सामने नहीं होना चाहती थीं। लिहाजा, शीशे का इस तरह प्रबंध किया गया कि सुल्तान रानी की छाया उसमें देख सके। कहा जाता है कि रानी की एक झलक देखकर अलाउद्दीन खिलजी रानी पर मोहित हो गया। उसने मन ही मन तय कर लिया कि वो रानी पद्मावती को लिए बिना दिल्ली नहीं लौटेगा। जब महल से सुल्तान अपने कैम्प की तरफ लौट रहा था, तब राजा कतन सिंह भी उसके साथ थे लेकिन छल-कपट से खिलजी ने राजा रतन सिंह को बंदी बना लिया। इसके बाद महल में संदेश भिजवाया कि अगर वे लोग अपने राजा को जिंदा देखना चाहते हैं तो रानी पद्मावती को उसके साथ दिल्ली जाने दिया जाय।

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कहा जाता है कि राजा रतन सिंह के राज्य में दो भरोसेमंद मंत्री थे- गोरा और बादल। इन लोगों ने योजना बनाई और सुल्तान को संदेशा भिजवाया कि रानी दिल्ली जाने को तैयार हैं। इसके अगले दिन करीब सौ पालकी में बैठकर सैनिक खिलजी के कैम्प तक पहुंच गए और कहा कि पालकियों में रानी पद्मावती अपनी सेविकाओं के साथ दिल्ली कूच कर रही हैं। कैम्प के पास पहुंचते ही सैनिकों ने खिलजी की सेना पर हमला कर दिया और राजा रतन सिंह को छुड़ा लिया। लेकिन खिलजी वहां से जाने को तैयार नहीं था। उसकी सेना ने चितौड़गढ़ जाने वाली पानी, रसद की सप्लाई रोक दी। कई दिनों तक किले में लोग भूखे-प्यासे रहे।

अंतत: राजपूतों ने और राजा रतन सिंह ने तय किया कि भूखे मरने से बेहतर है कि लड़ते हुए ही जान न्यौछावर किया जाए। इसके बाद चित्तौड़गढ़ और दिल्ली सल्तनत के बीच युद्ध हुआ, जिसमें राजा रतन सिंह की हार तय दिख रही थी। इधर, महल में रानी पद्मावती और अन्य राजपूत रानियों ने अलाउद्दीन की गुलामी से बचने और राजपूत धर्म निभाते हुए जौहर होने का फैसला किया। कहा जाता है कि रानी पद्मावती ने महल के बीचों-बीच चिता सजाई और सबसे पहले खुद उसमें कूदीं। उसके बाद अन्य रानियों ने भी चिता में कूदकर अपनी जान दे दी। अंत में जब राजा रतन सिंह को मारकर जब अलाउद्दीन खिलजी किले में प्रवेश किया तो वहां उसे सिर्फ राख मिला, कुछ और नहीं। जिसकी चाह में उसने खून बहाए, वो बेकार गया।

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