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अकाली दल, शिवसेना जैसे सहयोगियों के जाने के बाद भी टेंशन में नहीं बीजेपी, जानें- क्या है इतने आत्मविश्वास की वजह

पहली बात यह है कि चुनावी समीकरणों के मामले में फिलहाल पार्टी खासी मजबूत है। 2014 से 2019 के दौरान एनडीए से 15 पार्टियों ने किनारा किया था, लेकिन इसके बाद भी 2019 की जीत बीजेपी के लिए पहले मुकाबले बड़ी ही रही।

amit shah narendra modiगृह मंत्री अमित शाह के साथ पीएम नरेंद्र मोदी

बीजेपी ने बीते कुछ वक्त में एनडीए में अपने कई सहयोगियों को खोया है। 2019 के अपने लोकसभा चुनाव में बड़े बहुमत के साथ सत्ता में आई पार्टी को अपने सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल को हाल ही में खोना पड़ा है। इसके अलावा बिहार चुनाव को लेकर लोकजनशक्ति पार्टी से भी मतभेद की स्थिति है। रामविलास पासवान के जाने के बाद फिलहाल पार्टी अकेले दम पर चुनावी समर में है। हालांकि इस स्थिति के बाद भी बीजेपी की लीडरशिप बहुत ज्यादा चिंतित नहीं दिखती है। बीजेपी के इस कॉन्फिडेंस को लेकर राजनीतिक विश्लेषक भी हैरान हैं, लेकिन पार्टी के आत्मविश्वास की दो अहम वजहें हैं।

पहली बात यह है कि चुनावी समीकरणों के मामले में फिलहाल पार्टी खासी मजबूत है। 2014 से 2019 के दौरान एनडीए से 15 पार्टियों ने किनारा किया था, लेकिन इसके बाद भी 2019 की जीत बीजेपी के लिए पहले के मुकाबले बड़ी ही रही। आंकड़ों की नजर से देखें तो 2014 में एनडीए को 336 सीटें मिली थीं और अगले 5 सालों में 22 सीटों वाले साथियों ने उसे छोड़ दिया था। इसके बाद 2019 के चुनाव में एनडीए पहले के मुकाबले और बढ़त हासिल करते हुए 352 सीटें जीतकर वापस आया। अब 2019 के बाद की बात करें तो एनडीए के खाते से 21 लोकसभा सीटें कम हो गई हैं। 18 सीटें जीतने वाली पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना ने पाला बदल लिया है।

अभी अगले लोकसभा चुनाव में तीन साल से ज्यादा का वक्त है, लेकिन अब भी एनडीए मजबूत स्थिति में है। ऐसे में माना जा रहा है कि 2024 से पहले कुछ और नए साथी बीजेपी के साथ जुड़ जाएं। ऐसी ही स्थिति 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले भी बनी थी। अब बात करते हैं कि बीजेपी के आत्मविश्वास की दूसरी बड़ी वजह की। Live Mint में प्रकाशित एक लेख में सीएसडीएस से जुड़े संजय कुमार कहते हैं कि बीजेपी के पास सामाजिक तौर पर गठबंधन बनाने की क्षमता है। बता दें कि 2014 के बाद से ही लोकसभा समेत तमाम राज्यों के चुनावों में बीजेपी को गैर-सवर्ण जातियों का बड़े पैमाने पर समर्थन मिला है। खासतौर पर उससे अलग माने जाने वाले जनजाति और दलित वर्ग के वोट भी बड़े पैमाने पर पार्टी को मिले हैं।

ओबीसी, SC और एसटी वोटर्स के बीच लगाई बड़ी सेंध: अपनी स्थापना के दौर से ही ब्राह्मण-बनिया पार्टी कही जाने वाली बीजेपी को ओबीसी समाज का भी देश भर में व्यापक समर्थन मिला है। इसके चलते वह पुराने राजनीतिक समीकरणों को पलटने में कामयाब हो सकी है। दरअसल बीजेपी ने ओबीसी वोटों की अगुवा कही जाने वाली समाजवादी पार्टी, आरजेडी जैसे दलों के वोट में हिंदी पट्टी में सेंध लगाई है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में दलित वोटों का भी बड़ा हिस्सा हासिल किया है।

बीजेपी की सफलता सिर्फ उत्तर भारत तक सीमित नहीं: बीजेपी को समाज के तमाम वर्गों का साथ तो मिला ही है। बड़ी बात यह है कि उसे यह सफलता उत्तर भारत के अलावा उत्तर-पूर्वी भारत, पश्चिम भारत, पूर्वी हिस्से जैसे बंगाल, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों में भी मिली है। इसके अलावा दक्षिण भारत में भी पार्टी की स्थिति पहले के मुकाबले काफी अच्छी हुई है।

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