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Sharad Pawar: 41 साल पहले शरद पवार ने भी की थी बगावत, तब जनता पार्टी के समर्थन से बने थे CM, देखती रह गई थी कांग्रेस

जुलाई 1978 में शरद पवार ने अपनी पार्टी छोड़ दी. इस दौरान वे कुछ विधायकों को तोड़ने में कामयाब रहे। जनता पार्टी ने उन्हें सरकार बनाने के लिए समर्थन दे दिया।

Author नई दिल्ली | Updated: December 12, 2019 9:11 AM
एनसीपी प्रमुख शरद पवार। फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस

पिछले महीने महाराष्ट्र में हुए बड़े सियासी उलटफेर ने 41 साल पहले हुई उस घटना की याद दिला दी, जिसमें शरद पवार कांग्रेस से बगावत कर सीएम बन गए थे। 1977 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी, जनता पार्टी से चुनाव हार गई थी। हार की जिम्मेदारी लेते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण ने इस्तीफा दे दिया था। उनकी जगह वसंतदादा पाटिल मुख्यमंत्री बने थे। बाद में कांग्रेस दो फाड़ हो गई और दोनों हिस्सों ने विधानसभा चुनाव अलग-अलग लड़ा था। जुलाई 1978 में शरद पवार ने अपनी पार्टी छोड़ दी. इस दौरान वे कुछ विधायकों को तोड़ने में कामयाब रहे। जनता पार्टी ने उन्हें सरकार बनाने के लिए समर्थन दे दिया।

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38 साल की उम्र में बन गए थे सीएम : इस तरह पहली बार वे 1978 में मात्र 38 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे. इसे प्रगतिशील लोकतांत्रिक गठबंधन कहा गया। 1980 में जैसे ही देश में इंदिरा गांधी की सरकार बनी, उन्होंने शरद पवार की सरकार को बर्खास्त कर दिया और अगले चुनाव में कांग्रेस पार्टी को बहुमत मिला। कांग्रेस की तरफ से एआर अंतुले को मुख्यमंत्री बनाया गया।

पवार की निजी जिंदगी: बता दें कि शरद गोविंदराव पवार का जन्म 12 दिसम्बर 1940 को पुणे में हुआ था। उनके पिता गोविंदराव पवार कृषक सहकारी संघ में कर्मचारी और मां शारदाबाई पवार परिवार के फार्म की देखभाल करती थीं। शरद पवार ने पुणे विश्वविद्यालय से BMCC से पढ़ाई की है। बात अगर उनके राजनीतिक जीवन की करें तो महाराष्ट्र के पूर्व सीएम यशवंत राव चौहान को उनका राजनैतिक गुरु माना जाता है।

पूरी घटनाक्रम के बीच पवार गेम: महाराष्ट्र में बीजेपी से सत्ता छीनने में भी पवार गेम माना जा रहा है। अजित पवार को डिप्टी सीएम बनाकर जिस तरह से सुबह होते ही देवेंद्र फडणवीस ने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी उसे पवार का फिक्स गेम माना गया। इससे पहले संसद में शरद पवार की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई उस वक्त भी अटकलें लगाई गईं, लेकिन किसी को ज्यादा शक इसलिए नही हुआ क्योंकि एनसीपी – कांग्रेस और शिवसेना के बीच पावर साझा करने को लेकर बातचीत चल रही थी।

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