भारतीय राजनीति अक्सर चुनावों, दलबदल और जन आंदोलनों से प्रभावित होती है। लेकिन कई बार सत्ता का संतुलन अचानक और दुखद हादसों से भी बदल जाता है। चाहे वह विमान दुर्घटना हो या सड़क हादसा, ऐसी अप्रत्याशित मौतों ने न सिर्फ नेताओं के राजनीतिक सफर को अचानक खत्म किया, बल्कि देश और राज्यों की राजनीति की धुरी भी बदल दी। इन घटनाओं से नेतृत्व की कमी महसूस हुई, नए नेताओं को आगे आने का मौका मिला और कई बार सत्ता के नए सियासी समीकरण भी बने।
घटना: महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार का बुधवार को एक विमान हादसे में निधन हो गया। भारतीय नागरिक उड्डयन प्राधिकरण (DGCA) के मुताबिक, विमान में कुल पांच लोग यात्रा कर रहे थे। इनमें अजित पवार, उनके निजी सहायक, एक बॉडीगार्ड और दो पायलट शामिल थे। आगामी जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों के लिए प्रचार के लिए बारामती में चार जनसभाओं का आयोजन किया गया था। इन्हीं जनसभाओं में शामिल होने के लिए वो एक विशेष विमान से मुंबई से बारामती के लिए रवाना हुए थे।
सियासी प्रभाव: महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार राज्य की सियासत का पावर सेंटर रहे हैं। वह बारामती से आठ बार के विधायक रह चुके हैं। एनसीपी के एक नेता ने बताया, “एनसीपी की पहचान पवार परिवार से जुड़ी हुई है और अब तक पार्टी का कामकाज शरद पवार, अजित पवार और सुप्रिया सुले के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। अब अजीत पवार के असामयिक निधन के बाद, पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को भी लगता है कि केवल उनकी पत्नी सुनेत्रा ही उनकी जगह ले सकती हैं।” शरद पवार की पार्टी और अजित पवार की एनसीपी के फिर से एक साथ आने की संभावनाएं थी। हालांकि, अब यह प्रक्रिया और भी ज्यादा मुश्किल होती हुई नजर आ रही है।
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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सबसे बड़ी चुनौती सत्ता के समीकरण को लेकर है। अजित पवार का गुट सत्ताधारी महायुति का हिस्सा है, जबकि शरद पवार की पार्टी विपक्ष में है। सरकार में शामिल विधायकों को सत्ता छोड़ने के लिए राजी करना या विपक्षी गुट को बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होने के लिए मनाना आसान नहीं होगा।
संजय गांधी
घटना: कांग्रेस नेता और देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी का निधन 23 जून 1980 को विमान हादसे में हो गया था। गांधी और उनके को-पायलट सुभाष सैक्सन की उस समय मौके पर ही मौत हो गई जब स्टंट फ्लाइंग के लिए इस्तेमाल किया जा रहा विमान एक पेड़ से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। शुरुआती जांच में एक्सपर्ट्स ने बताया कि हादसा उस समय हुआ जब पायलट विमान को घुमाने (स्पिन) के बाद ऊपर उठाने की कोशिश कर रहा था। विशेषज्ञों के अनुसार, विमान तय की गई सुरक्षित ऊँचाई से काफी नीचे उड़ रहा था, जिसकी वजह से यह दुर्घटना हुई।
सियासी प्रभाव: संजय गांधी को कांग्रेस पार्टी की अगली पीढ़ी के नेता के तौर पर तैयार किया जा रहा था। हालांकि, उनके निधन ने पार्टी के नेतृत्व की योजना पर सीधा फेरबदल कर दिया। संजय गांधी की मृत्यु ने राजीव गांधी और उनके परिवार को सुर्खियों में ला दिया। राजीव गांधी उस समय विदेश में थे और राजनीतिक तौर पर एक्टिव नहीं थे। राजीव गांधी बाद में कांग्रेस के अध्यक्ष बने और देश के प्रधानमंत्री भी बने। राजीव गांधी के सियासत में आ जाने के बाद संजय गांधी की पत्नी और वरुण गांधी को हाशिये पर धकेल दिया गया था। वह बाद में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए।
माधवराव सिंधिया
घटना: माधवराव सिंधिया कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में से एक थे और नौ बार सांसद थे। पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री माधवराव सिंधिया 30 सितंबर 2001 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक रैली में जा रहे थे। तभी उनका विमान हादसे का शिकार हो गया।
सियासी प्रभाव: माधवराव सिंधिया की नेतृत्व की क्षमता काफी बेहतर थी। 1998 में जब सोनिया गांधी ने राजनीति में आने के एक साल बाद ही पार्टी की कमान संभाली, तब सिंधिया उनके सबसे करीबी सलाहकारों में थे। सोनिया की स्थिति से कई कांग्रेस नेता नाराज थे, शरद पवार ने तो एनसीपी बना ली थी, लेकिन सिंधिया बिना किसी हिचक के उनके समर्थक थे और उन्हें अक्सर भविष्य का प्रधानमंत्री कहा जाता था। हालांकि, उनके निधन से यह हो ना सका। फिर उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजनीति में लाया गया। ज्योतिरादित्य इस समय गुना से सांसद हैं और मोदी कैबिनेट में मंत्री हैं।
जीएमसी बालायोगी
घटना: पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और तेलुगु देशम पार्टी के नेता जीएमसी बालायोगी का 3 मार्च 2002 को निधन हो गया, जब पश्चिम गोदावरी जिले के भीमावरम से उन्हें ले जा रहा हेलीकॉप्टर आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के कैकालूर के पास एक तालाब में गिर गया। शुरुआती जांच में पता चला कि हेलीकॉप्टर में तकनीकी खराबी आ गई थी और पायलट द्वारा उसे नीचे उतारने की कोशिश के दौरान वह हादसे का शिकार हो गया।
सियासी प्रभाव: आंध्र प्रदेश की राजनीति में भी उनका खास असर था। वे पिछड़े वर्गों की आवाज बने और सामाजिक न्याय के मुद्दों को मजबूती से उठाया। हालांकि, उनके निधन के बाद देश की राजनीति में भी काफी खालीपन पैदा हो गया था। फिर उनके बेटे जीएम हरीश बालायोगी ने सक्रिय राजनीति में एंट्री की। उन्होंने अपने पिता की ही सीट अमलापुरम से साल 2019 में टीडीपी के टिकट पर चुनाव लड़ा। हालांकि, उस वक्त वह वाईएसआरसीपी की उम्मीदवार चिंता अनुराधा से हार गए। फिर साल 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने जीत दर्ज की।
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