दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ छात्रों और नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं का आंदोलन भले ही खुद को किसी राजनीतिक दल या नेता से दूर रखने वाला ‘लीडरलेस’ आंदोलन बताता रहा हो, लेकिन आंदोलन का हिस्सा होना अपने आप में एक राजनीतिक कदम है। यह कहना है ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की पीएचडी स्कॉलर नेहा बोरा का।

द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में नेहा बोरा ने जंतर-मंतर आंदोलन में AISA की भूमिका, झारखंड में छात्रों और नौकरी के अभ्यर्थियों के आंदोलन, कॉकरेच जनता पार्टी (CJP) के साथ सहयोग, चुनाव लड़ने की संभावना, ‘आजादी’ के नारे, JNU की बदलती राजनीतिक संस्कृति, वामपंथ के चुनावी प्रदर्शन, नक्सलबाड़ी आंदोलन और उमर खालिद जैसे कई मुद्दों पर अपनी बात रखी।

नेहा बोरा हाल के महीनों में दिल्ली से शुरू होकर देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचे विरोध प्रदर्शनों का एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरी हैं। दिल्ली में उन्होंने शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक के साथ 23 दिन की भूख हड़ताल में हिस्सा लिया था। वहीं, झारखंड में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान उन पर स्याही फेंके जाने की घटना भी सामने आई थी।

‘लीडरलेस’ आंदोलन कहना गलत नहीं, लेकिन यह भी राजनीति है

जंतर-मंतर आंदोलन को ‘लीडरलेस’ कहे जाने पर नेहा बोरा ने कहा कि अगर लोग यह कहते हैं कि वे किसी विचारधारा या नेता के समर्थन में नहीं, बल्कि इसलिए आंदोलन में आए हैं क्योंकि उन्हें मुद्दा सही लगता है, तो इसमें कोई समस्या नहीं है।

हालांकि, उनके मुताबिक किसी मुद्दे के समर्थन में खड़े होना भी राजनीति का ही हिस्सा है। उन्होंने कहा कि जब लोग यह कहते हैं कि वे किसी राजनीतिक दल या नेता के बजाय जनता के साथ खड़े होने आए हैं, तो यह भी एक राजनीतिक फैसला है।

बोरा के मुताबिक धर्म, जाति या क्षेत्र से अलग होकर साझा मुद्दों पर लोगों का एकजुट होना भी राजनीति है। उनके अनुसार विचारधारा रखने का मतलब किसी व्यक्ति का अनुयायी बनना या बिना सवाल किए किसी के प्रति वफादार रहना नहीं है। बल्कि इसका अर्थ यह समझना है कि व्यक्ति दुनिया को किस तरह देखता है और किन मुद्दों पर क्या रुख अपनाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन खत्म होने के बाद चुनौती यह होती है कि लोग इस राजनीतिक अनुभव को आगे कैसे संगठित करते हैं। कई बार लोग आंदोलन को जीवन के एक खास दौर की घटना मान लेते हैं और राजनीति को नकारात्मक अर्थ में देखने लगते हैं।

AISA और CJP के बीच सहयोग पर बोलीं बोरा

जंतर-मंतर आंदोलन में AISA की भूमिका और कॉकरेच जनता पार्टी (CJP) के साथ सहयोग को लेकर भी नेहा बोरा से सवाल किया गया। उन्होंने कहा कि CJP की संगठनात्मक समझ अभी विकसित हो रही है। हालांकि, उन्होंने भविष्य में भी उसके साथ काम करने की संभावना से इनकार नहीं किया।

बोरा ने कहा कि यदि CJP जनता से जुड़े मुद्दों पर काम करती है, तो उनके संगठन उसके साथ काम कर सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल उनकी राजनीतिक ऊर्जा छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित है।

झारखंड में विरोध और 7 अगस्त के मार्च पर सफाई

झारखंड में कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा उनके विरोध किए जाने की खबरों पर बोरा ने कहा कि रांची पहुंचने पर उन्हें लोगों से गर्मजोशी से स्वागत मिला था। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP-RSS से जुड़े लोगों ने घटना के वीडियो को अलग संदर्भ में पेश करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि जिस वीडियो को सोशल मीडिया पर प्रसारित किया जा रहा है, उसमें मीडिया को मंच से नीचे जाने के लिए कहा जा रहा था, न कि उन्हें।

7 अगस्त को मार्च निकालने के फैसले पर भी उन्होंने कहा कि अलग-अलग तारीखों पर प्रदर्शन के आह्वान किए गए थे, लेकिन उनके संगठन ने झारखंड में प्रदर्शन की तैयारी पहले से शुरू कर दी थी। उनके मुताबिक 6 या 8 अगस्त को प्रदर्शन के आह्वान भी किए गए थे, जबकि उनका कार्यक्रम पहले से तय था और वे पूरे झारखंड में लोगों को लामबंद कर रहे थे।

‘एंटी-CAA और किसान आंदोलन से निकला जंतर-मंतर आंदोलन’

नेहा बोरा ने जंतर-मंतर के आंदोलन को पहले के आंदोलनों से अलग और उनसे जुड़ा हुआ, दोनों बताया। उन्होंने कहा कि कोई भी जन आंदोलन अचानक शून्य से पैदा नहीं होता। आंदोलनों का अपना इतिहास होता है और नए आंदोलन पहले के संघर्षों से सीखते हैं।

उनके मुताबिक 2019 के छात्र आंदोलनों ने कई युवाओं को सक्रिय राजनीति और छात्र राजनीति में आने की प्रेरणा दी। समान नागरिकता के मुद्दे पर हुए आंदोलनों ने अलग-अलग समुदायों को एक साझा संघर्ष की कल्पना करने का अवसर दिया, जबकि किसान आंदोलन ने भी विभिन्न वर्गों और समूहों के संघर्षों को एक मंच पर लाने में भूमिका निभाई।

हालांकि, उन्होंने कहा कि पहले के आंदोलनों को अलग-अलग पहचान के साथ बदनाम करने की कोशिश की गई। एंटी-CAA आंदोलन को ‘मुस्लिम आंदोलन’ और किसान आंदोलन को ‘खालिस्तानी’ आंदोलन बताने की कोशिश हुई।

उनके अनुसार इस बार भी प्रदर्शनकारियों को अलग-अलग तरह के लेबल दिए गए। उन्होंने दावा किया कि छात्रों को ‘आतंकवादी’ और ‘वायरस’ तक कहा गया। बोरा ने कहा कि बेरोजगारी, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में गिरावट जैसे मुद्दों का जवाब देने के बजाय प्रदर्शनकारियों पर आरोप लगाए गए और उन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा गया।

‘इस बार लोगों ने डरकर घर बैठना स्वीकार नहीं किया’

नेहा बोरा ने कहा कि बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर युवाओं में वर्षों से गुस्सा जमा हो रहा था। उनके मुताबिक जब इन समस्याओं का समाधान नहीं मिलता, तो आंदोलन सामने आते हैं। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों को कभी आतंकवादी, कभी देशविरोधी और कभी विदेशी ताकतों से प्रभावित बताने की कोशिश की गई, लेकिन इस बार लोगों ने इस तरह के आरोपों के सामने चुप रहना स्वीकार नहीं किया। उनके अनुसार आंदोलन में शामिल युवाओं ने अपने वर्षों के गुस्से को सार्वजनिक रूप से सामने रखा और डरकर घरों में बैठने के बजाय विरोध का रास्ता चुना।

चुनाव लड़ने के सवाल पर क्या बोलीं नेहा बोरा?

नेहा बोरा ने चुनाव लड़ने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके लिए चुनावी राजनीति अपने आप में लक्ष्य नहीं है। उन्होंने कहा कि उनकी राजनीतिक कल्पना महत्वाकांक्षी है, लेकिन वह केवल चुनावी महत्वाकांक्षा तक सीमित नहीं है।

बोरा CPI(ML) लिबरेशन से जुड़ी हैं। उन्होंने कहा कि अगर पार्टी यह मानती है कि चुनाव लड़ना जमीन पर चल रहे संघर्षों और संगठन को विस्तार देने का माध्यम बन सकता है, तभी वह चुनाव लड़ने पर विचार करेंगी। यानी उनके लिए चुनाव किसी व्यक्तिगत राजनीतिक करियर का रास्ता नहीं, बल्कि सामाजिक और जन आंदोलनों को व्यापक बनाने का एक माध्यम है।

‘छात्र राजनीति सिर्फ राजनीतिक करियर की सीढ़ी नहीं’

छात्र राजनीति को राजनीतिक करियर की तैयारी का मंच कहे जाने पर बोरा ने कहा कि राजनीति में व्यक्तियों पर जरूरत से ज्यादा ध्यान दिया जाता है। उन्होंने कन्हैया कुमार का उदाहरण देते हुए कहा कि छात्र राजनीति से निकले लोगों में सिर्फ वे लोग चर्चा में आते हैं जो बाद में मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में दिखाई देते हैं। इसके विपरीत कई छात्र नेता ट्रेड यूनियन, महिला संगठनों और अन्य जन आंदोलनों में काम करते रहे हैं।

उन्होंने AISA के लंबे राजनीतिक इतिहास का भी उल्लेख किया। बोरा के मुताबिक संगठन ने 1990 के दशक से OBC आरक्षण, JNU के डिप्रिवेशन पॉइंट्स, छात्रवृत्ति, FYUP, ऑक्युपाई UGC, निर्भया आंदोलन, फीस बढ़ोतरी और एंटी-CAA आंदोलनों समेत कई मुद्दों पर काम किया है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को हाल के महीनों में AISA के बारे में पता चला है, इसका अर्थ यह नहीं है कि संगठन ने हाल में ही काम शुरू किया है।

‘वामपंथ संसद का इंतजार नहीं करेगा’

बोरा ने कहा कि उनके लिए चुनावी राजनीति का उद्देश्य केवल संसद में वामपंथ की संख्या बढ़ाना नहीं है। वह इसे संगठन और जन आंदोलनों को मजबूत करने के माध्यम के रूप में देखती हैं। उनके मुताबिक वामपंथ इस इंतजार में नहीं बैठ सकता कि किसी दिन वह संसद में बहुमत हासिल करेगा और तभी बदलाव की शुरुआत होगी। इसके बजाय जमीन पर संगठन और संघर्षों को मजबूत करते हुए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का विस्तार करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं होता और जो कई बार आंकड़ों में भी दिखाई नहीं देते, उन्हें संसद में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

‘आजादी’ के नारे पर बोरा का रुख

JNU और वामपंथी छात्र राजनीति से जुड़े ‘आजादी’ के नारे पर नेहा बोरा ने कहा कि यह सबसे पहले महिलाओं की स्वायत्तता और स्वतंत्रता से जुड़ा नारा था। बाद में इसका इस्तेमाल अलग-अलग सामाजिक आंदोलनों में हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि दक्षिणपंथी राजनीति ने इस नारे के साथ नकारात्मकता जोड़ने के लिए लंबे समय तक अभियान चलाया।

बोरा के अनुसार ‘मोदी-शाह से आजादी’, ‘BJP से आजादी’, ‘पेपर लीक से आजादी’ या ‘भ्रष्टाचार से आजादी’ जैसे नारे अपने आप में देशविरोधी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को इस शब्द को दोबारा अपने राजनीतिक अर्थ में इस्तेमाल करना चाहिए।

JNU की राजनीतिक संस्कृति में बदलाव पर चिंता

JNU की राजनीतिक संस्कृति पर बात करते हुए बोरा ने कहा कि विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक स्थानों को धीरे-धीरे सीमित किया जा रहा है। उन्होंने 2016 में चले ‘Shutdown JNU’ अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय विश्वविद्यालय परिसर में बाहरी लोगों के प्रवेश, नारेबाजी, गिरफ्तारियों और कथित रूप से वीडियो से छेड़छाड़ जैसे विवाद सामने आए थे। उनके अनुसार JNU ने लंबे समय तक लोकतांत्रिक बहस और राजनीतिक विचारों को जगह दी है, लेकिन अब उन लोकतांत्रिक स्थानों को कमजोर किया जा रहा है।

‘नक्सलबाड़ी को केवल हिंसा से जोड़ना ठीक नहीं’

नक्सलवाद के सवाल पर नेहा बोरा ने हिंसक नक्सल गतिविधियों और नक्सलबाड़ी आंदोलन के ऐतिहासिक संदर्भ के बीच अंतर करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि नक्सलबाड़ी के विचार को केवल हिंसा के साथ जोड़कर देखना सही नहीं होगा। उनके मुताबिक नक्सलबाड़ी का मूल सवाल जमीन पर अधिकार और उन लोगों के सम्मान से जुड़ा था जो उस जमीन पर खेती करते थे।

उन्होंने न्यूनतम मजदूरी, सम्मानजनक व्यवहार, कानून का सहारा लेने का अधिकार और गरीब लोगों को इंसान के रूप में देखने की मांगों को उस आंदोलन के मूल में बताया। बोरा ने कहा कि बाद के वर्षों में यह आंदोलन अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में सामने आया। बिहार के संदर्भ में उन्होंने इसे सामंती जमींदारों के खिलाफ गरीबों और वंचित समुदायों की गरिमा की लड़ाई के रूप में पेश किया।

उन्होंने कहा कि दलित और मुस्लिम गांवों में सामूहिक हिंसा, हत्याओं और महिलाओं के साथ अत्याचार जैसी घटनाओं को सामान्य नहीं माना जा सकता। उनके मुताबिक इस पूरे विमर्श के केंद्र में यह सवाल है कि समाज के सबसे गरीब लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार जारी नहीं रहना चाहिए।

उमर खालिद के मुद्दे पर क्या बोलीं नेहा बोरा?

जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान उमर खालिद का नाम उठाए जाने के सवाल पर बोरा ने कहा कि उनके अनुसार उमर खालिद का मुद्दा उठाने का मकसद राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग को समझने के बजाय उन्हें ‘एंटी-नेशनल’ बताने की कोशिश बन गया है।

उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को ‘एंटी-नेशनल’ कहना उन लोगों के लिए आसान तरीका बन गया है जिनके पास किसी मुद्दे पर तर्क या राजनीतिक जवाब नहीं है। बोरा के मुताबिक प्रदर्शन के दौरान मंच से शिक्षा और पेपर लीक जैसे मुद्दों के अलावा सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई की बात भी की गई थी।

उन्होंने कहा कि जो छात्र यह मानते हैं कि उमर खालिद को जेल में रहना चाहिए, उन्हें भी इस मामले को पढ़ना और समझना चाहिए। उनके अनुसार लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी व्यक्ति के अपराधी होने या न होने का फैसला न्यायिक प्रक्रिया के जरिए होना चाहिए।

‘मीडिया या भीड़ किसी को दोषी नहीं ठहरा सकती’

उमर खालिद के संदर्भ में बोरा ने न्यायपालिका की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया का अधिकार देना है। उनके मुताबिक किसी आम नागरिक को मीडिया या भीड़ के जरिए दोषी घोषित नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति को राष्ट्रवादी या देशविरोधी बताने के बजाय यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि देश में कानून और न्यायिक प्रक्रिया किस तरह काम कर रही है।

बोरा ने कहा कि वह, उनका संगठन और छात्र आंदोलन से जुड़े लोग राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग का समर्थन करते हैं। उन्होंने एंटी-CAA और समान नागरिकता आंदोलनों से जुड़े लोगों के साथ उमर खालिद और शरजील इमाम का भी नाम लिया।

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झारखंड स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (JSSC) की जूनियर इंजीनियर (डिप्लोमा) भर्ती परीक्षा 2022 के पेपर लीक मामले में विशेष जांच दल (SIT) को बड़ी सफलता मिली है। SIT ने परीक्षा आयोजित कराने वाली एजेंसी के फरार निदेशक अरुण कुमार को मुंबई से गिरफ्तार किया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।