नरेश करसन पटेल का मानना है कि विश्वास कुमार रमेश का एअर इंडिया की फ्लाइट AI 171 के क्रैश में मौत से बच जाना, 12 जून 2025 को हुई एकमात्र ‘चमत्कारी’ घटना नहीं थी। पटेल की उम्र लगभग 60 वर्ष के करीब हैं और उनकी पत्नी दक्षा उस समय बी. जे. मेडिकल कॉलेज के मेस के ग्राउंड फ्लोर पर मौजूद थे जिसे बोइंग ड्रीमलाइनर ने टक्कर मार दी थी। दोनों किसी तरह बच तो गए लेकिन उनकी पत्नी को रीढ़ की हड्डी में चोटें आईं।

करीब 16 सालों से पटेल इसी मेस से कॉलेज से जुड़े अहमदाबाद सिविल अस्पताल के डॉक्टरों और छात्रों के लिए टिफिन पहुंचाते रहे हैं। उन्होंने कहा, ”मैं तुरंत ही मेस में डिलीवरी करके लौटा था। दक्षा और अन्य महिलाएं वहां दोपहर का खाना बना और परोस रही थीं। अचानक एक बड़ा धमाका हुआ और चारों तरफ धूल फैल गई। मैंने देखा कि दीवार में कुछ बड़ा सा फंसा हुआ था और ईंधन फैल रहा था।” इसके बाद सभी लोग चीखने लगे और इमारत से बाहर निकलने की कोशिश करने लगे।

1988 के बाद सबसे बड़ा प्लेन क्रैश

1988 के बाद गुजरात की सबसे बड़ी हवाई दुर्घटना में 260 लोगों की मौत हो गई जिनमें 241 यात्री और चालक दल के सदस्य शामिल थे। इस हादसे में 19 लोग ज़मीन पर मारे गए। एअर इंडिया का यह प्लेन लंदन गैटविक हवाई अड्डे के लिए जा रहा था और अहमदाबाद से उड़ान भरने के कुछ ही मिनटों बाद क्रैश हो गया। विश्वास कुमार इस विमान में एकमात्र जीवित बचे यात्री थे।

प्लेन के मेस की बिल्डिंग से टकराने के बाद उसका पिछला हिस्सा (टेल सेक्शन) इमारत में धंस गया जबकि विमान का बाकी हिस्सा उससे आगे स्थित चार हॉस्टल ब्लॉकों से जा टकराया।

हादसे के एक साल

एक साल बाद भी उस जगह पर बहुत कुछ नहीं बदला है- जिसमें मेस की दीवार में बना वह बड़ा छेद भी शामिल है जहां से विमान अंदर घुसा था और ऊपर का पानी का टैंक जो टक्कर की वजह से असामान्य एंगल पर मुड़ गया था। अंदर कंक्रीट झड़ रहा है, वहां कंस्ट्रक्शन की छड़ें खुली और मुड़ी हुई दिखाई देती हैं, बिजली के तार खुले लटके हैं,और खाली जगहों पर अक्सर जमा हो जाने वाले कबूतरों के झुंड वहां बस गए हैं। यह मेस उन हॉस्टल ब्लॉकों की कतार में है जो तबाह हुई बिल्डिंग से 500 मीटर दूर स्थित हैं। पटेल कहते हैं, ”जब भी कोई बड़ा विमान ऊपर से गुजरता है, खाना बनाने वाली महिलाएं तुरंत बाहर भाग जाती हैं।”

वह बताते हैं, दक्षा को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से नुकसान पहुंचा। उनका कहना है, ”महिलाएं एक संगमरमर के काउंटर से कूदकर और खिड़कियों से बाहर निकलकर बचीं। उनकी L4 और L5 रीढ़ की हड्डियां घायल हो गईं। वह इतनी डरी हुई थीं कि एक महीने के लिए महाराष्ट्र में अपने माता-पिता के पास रहने चली गईं। जब उनकी घबराहट कुछ कम हुई, तभी वह वापस आईं और अपने इलाज के लिए भर्ती हुईं।” एअर इंडिया ने इलाज का खर्च वहन किया।

ahmedabad plane crash
जहां आसमान से गिरी थी तबाही… एक साल बाद भी वहीं रुका हुआ है वक्त, लोग आज भी सहमे

फल और सब्ज़ियां बेचकर आजीविका चलाने वाला पाटनी परिवार भी खुद को भाग्यशाली मानता है। वे मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल परिसर से सटी एक कच्ची सड़क के किनारे रहते हैं और उनके परिवार के दो सदस्य भी मेस में काम करते थे लेकिन हादसे के कुछ दिन पहले ही नौकरी छोड़ चुके थे।

टिन की छत वाली अपनी कच्ची झोपड़ी के बाहर बैठी ज्योत्स्ना अजय पाटनी जले हुए हॉस्टल की बिल्डिंगो की ओर देखते हुए बताती हैं, ”जब हादसा हुआ, मैं यहीं बैठी थी। हम जितनी तेज़ी से भाग सकते थे भागे और अपने घर के पीछे एक कमरे की इमारत में शरण ली। पेड़ सब जल गए थे और हमारा घर भी झुलस गया था।” उनकी मां आशा और बहन नेहा मेस में काम करती थीं। ज्योत्स्ना कहती हैं, ”उनकी जान भगवान की कृपा से बच गई।”

पहले राहत और बचाव कार्य में लगे लोगों ने शवों को ले जाने के लिए पाटनी परिवार की हाथ ठेलियों का इस्तेमाल किया लेकिन जब वे वापस अपने घर पहुंचे तो ज्योत्स्ना के पिता सत्तू पाटनी कहते हैं कि वे एक और झटके के लिए तैयार नहीं थे। उनके पिता ने बताया, ”हमने अपनी छोटी बेटी की शादी के लिए जो पैसे जमा किए थे, वे किसी ने चुरा लिए थे।”

आसमान से जमीन पर आई आफत

दूसरा सदमा यह था कि पास ही फुटपाथ पर सो रहे चाय बेचने वाले के 13 साल के बेटे आकाश पाटनी की मौत हो गई जो ज़मीन पर हुई दुर्घटना के पीड़ितों में शामिल था। उसके साथ मौजूद उसकी मां सीता भी गंभीर रूप से जल गईं। ज्योत्स्ना बताती हैं कि वह लगातार आकाश के बारे में सोचती रहती हैं। उन्होंने कहा, ”वह हर दिन हमारे पास आकर बैठता था। इतनी कम उम्र में उसे हमसे छीन लिया गया।”

पाटनी परिवार के घर के ठीक सामने हॉस्टल ब्लॉक की बाउंड्री वॉल के साथ हाल ही में 15 फीट ऊंचे रेत के ढेर जमा किए गए हैं। यह वही जगह है जिसे गुजरात सरकार ने उस हादसे में नष्ट हुए हॉस्टलों के पुनर्निर्माण के लिए चुना है।

हालांकि, कई लोगों ने इसका विरोध किया है और इसके बजाय मारे गए लोगों की याद में एक स्मारक बनाने की मांग की है। उस दिन ज़मीन पर मारे गए 18 अन्य लोगों में आकाश भी शामिल था। कुछ पीड़ितों के परिवार अहमदाबाद छोड़कर जा चुके हैं।

इनमें से एक रवि ठक्कर भी हैं जिनका पूरा परिवार हॉस्टलों में काम करता था। ठक्कर और उनकी पत्नी ललिता हादसे के समय टिफिन पहुंचाने का काम कर रहे थे। उनकी बेटी आध्या व ठक्कर की मां सरला की मौत हो गई। उन्होंने आध्या को सरला के पास छोड़ दिया था जब वे अपने काम पर गए थे।

सरला और आध्या के शव उन चार लोगों में शामिल थे जिनकी पहचान केवल डीएनए प्रोफाइलिंग के जरिए हो सकी। उनका अंतिम संस्कार हादसे के सात दिन बाद 19 जून को किया गया। इसके बाद ठक्कर परिवार ने हॉस्टलों में काम करना बंद कर दिया। स्थानीय लोगों के अनुसार, इसी महीने की शुरुआत में वे हमेशा के लिए अहमदाबाद छोड़कर अपने पैतृक शहर पाटन लौट गए।