4 अगस्त को फुकेट से दिल्ली आ रही एअर इंडिया की A320 उड़ान के दौरान विमान अचानक 300 फीट नीचे गिर गया था। प्लेन बनाने वाली एयरबस के डिजिटल फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (DFDR) के शुरुआती विश्लेषण में सामने आया है कि इस घटना के दौरान विमान के हाइड्रोलिक सिस्टम ने कुछ समय के लिए काम करना बंद कर दिया था।

बताया गया है कि हाइड्रोलिक सिस्टम में आई इस अस्थायी खराबी के कारण विमान के मुख्य फ्लाइट कंट्रोल सरफेस करीब चार सेकंड तक निष्क्रिय हो गए थे। शुरुआत में केंद्र सरकार और एअर इंडिया ने इस घटना के लिए बेहद ज्यादा टर्बुलेंस को जिम्मेदार बताया था। हालांकि अब जांच के दौरान विमान के हाइड्रोलिक सिस्टम और फ्लाइट कंट्रोल सरफेस में आई तकनीकी खामियां का पता चला है अब इसी आधार पर जांच हो रही है।

पायलट का मारिजुआना टेस्ट पॉजिटिव

इस मामले में एक और तथ्य सामने आया था कि विमान के पायलट-इन-कमांड की ड्रग जांच में मारिजुआना (गांजा) का टेस्ट पॉजिटिव पाया गया था। लेकिन एयरबस के शुरुआती आकलन के बाद अब ऐसा लगता है कि पायलट की ड्रग टेस्ट रिपोर्ट का इस गंभीर विमान हादसे जैसी घटना से सीधा संबंध होने की संभावना कम है।

इस घटना में विमान में सवार 24 लोग घायल हो गए थे। मामले की जांच एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) कर रहा है। जांच में विमान निर्माता एअरबस और फ्रांस की विमान दुर्घटना जांच एजेंसी BEA भी सहयोग कर रही हैं।

सूत्रों के मुताबिक, एअर इंडिया के अनुरोध पर किए गए शुरुआती विश्लेषण में एअरबस हाइड्रोलिक सिस्टम के फेल होने की मूल वजह का पता नहीं लगा सका। इसके बाद कंपनी ने एअर इंडिया को कई तरह के मेंटेनेंस टेस्ट और तकनीकी निरीक्षण कराने के निर्देश दिए हैं।

इनमें शामिल हैं:
-हाइड्रोलिक प्रेशर स्विच की जांच
-प्रेशर ट्रांसड्यूसर की जांच
-वायरिंग का निरीक्षण
-विमान के फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम और ऑटोमैटिक फ्लाइट सिस्टम की जांच।

इसके अलावा एअरबस ने एअर इंडिया से यह भी जानकारी मांगी है कि पिछले एक महीने के दौरान विमान के हाइड्रोलिक सिस्टम पर कौन-कौन से मेंटेनेंस काम किए गए थे। एअरबस A320 विमान में तीन स्वतंत्र हाइड्रोलिक सिस्टम होते हैं जिन्हें ग्रीन, ब्लू और येलो कोड नाम दिए गए हैं। इन्हें इस तरह डिजाइन किया गया है कि अगर एक सिस्टम काम करना बंद कर दे तो भी विमान का हाइड्रोलिक नियंत्रण पूरी तरह खत्म न हो।

हाइड्रोलिक प्रेशर क्यों होता है जरूरी

हाइड्रोलिक दबाव (Hydraulic Pressure) विमान के कई फ्लाइट कंट्रोल सरफेस को ऑपरेट करने के लिए बेहद जरूरी होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, A320 विमान में तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम का एक साथ फेल होना लगभग असंभव माना जाता है। यह दुनिया में सबसे ज्यादा उड़ान भरने वाले विमानों में से एक है और इसकी संरचना इस तरह बनाई गई है कि एक सिस्टम की विफलता के बावजूद विमान सुरक्षित रूप से नियंत्रित किया जा सके।

एअरबस A320 विमान में तीन हाइड्रोलिक सिस्टम होते हैं जिन्हें ग्रीन, ब्लू और येलो नाम दिया गया है। इन्हें इस तरह डिजाइन किया गया है कि अगर इनमें से कोई एक सिस्टम काम करना बंद कर दे तब भी विमान का पूरा हाइड्रोलिक नियंत्रण खत्म ना हो। विमान के कई फ्लाइट कंट्रोल सरफेस को संचालित करने के लिए हाइड्रोलिक प्रेशर बेहद जरूरी होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, A320 विमान में तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम का एक साथ फेल होना लगभग असंभव माना जाता है। यह दुनिया में सबसे ज्यादा उड़ान भरने वाले विमानों में से एक है। सूत्रों के मुताबिक, 10 अगस्त को एअर इंडिया को भेजे गए एक पत्र में एअरबस ने कहा कि डिजिटल फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (DFDR) के शुरुआती विश्लेषण से पता चला है कि विमान के तीनों स्वतंत्र हाइड्रोलिक सिस्टम बहुत कम समय के अंतराल में एक-एक करके बंद हो गए। इसके कारण करीब चार सेकंड तक विमान के एलेवेटर (Elevators) और एइलरॉन (Ailerons) पर नियंत्रण खत्म हो गया।

इस दौरान विमान का अगला हिस्सा (नोज) ऊपर की ओर उठ गया और ऑटोपायलट सिस्टम खुद बंद (Disengage) हो गया। रिपोर्ट में बताया गया है कि उस समय विमान उड़ा रहे फर्स्ट ऑफिसर ने विमान का अगला हिस्सा नीचे लाने का प्रयास किया। लेकिन हाइड्रोलिक नियंत्रण खत्म होने के कारण फ्लाइट कंट्रोल सरफेस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

कुछ ही सेकंड बाद हाइड्रोलिक सिस्टम दोबारा काम करने लगे। इसके बाद विमान को नियंत्रित करने के लिए जैसे ही उसका अगला हिस्सा तेजी से नीचे किया गया, अचानक आए इस झटके से यात्री और केबिन क्रू अपनी सीटों से उछल गए जिससे कई लोग घायल हो गए।

एलेवेटर (Elevators) विमान की पूंछ (Tail) के हॉरिज़ॉन्टल पर लगे होते हैं और ये विमान के पिच यानी नाक ऊपर या नीचे करने की दिशा को नियंत्रित करते हैं। वहीं एइलरॉन (Ailerons) विमान के दोनों पंखों (Wings) पर लगे होते हैं और ये विमान के रोल (Roll) यानी बाएं या दाएं झुकने की गति को नियंत्रित करते हैं।

सरल शब्दों में कहें तो इस घटना के दौरान हाइड्रोलिक सिस्टम के अस्थायी रूप से बंद हो गया। इसके कारण कुछ सेकंड के लिए विमान की दिशा और संतुलन नियंत्रित करने की क्षमता प्रभावित हो गई थी।

जांच में अब क्या-क्या सवाल

जांच में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वास्तव में विमान के हाइड्रोलिक सिस्टम फेल हुए थे या फिर यह गलत (स्प्यूरियस) सिग्नलों का मामला था? विमान के फ्लाइट कंट्रोल कंप्यूटर को हाइड्रोलिक प्रेशर की जानकारी तीन स्रोतों से मिलती है- दो प्रेशर स्विच और एक प्रेशर ट्रांसमीटर। कंप्यूटर इन तीनों से मिले इनपुट की तुलना कर यह तय करता है कि हाइड्रोलिक सिस्टम की स्थिति क्या है।

एयरबस के DFDR (डिजिटल फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर) के शुरुआती विश्लेषण के अनुसार, दो प्रेशर स्विच ने कम हाइड्रोलिक प्रेशर (Low Hydraulic Pressure) का संकेत दिया। इसके बाद फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम ने हाइड्रोलिक एक्ट्यूएटर्स (Hydraulic Actuators) को सर्विस से बाहर कर दिया।

हालांकि शुरुआती आकलन में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि पहले वास्तव में हाइड्रोलिक प्रेशर खत्म हुआ था या फिर सेंसर अथवा किसी अन्य पुर्जे में खराबी के कारण गलत संकेत मिले थे।

सूत्रों के मुताबिक, एयरबस ने एअर इंडिया से पायलटों की विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि घटना के दौरान कॉकपिट में क्या देखा और महसूस किया गया था।

एयरबस ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट में लिखा है, ”फिर भी यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस घटना के लिए विमान की प्रणालियों (Aircraft Systems) और उसकी संरचनात्मक मजबूती (Structural Integrity) दोनों का विस्तृत विश्लेषण आवश्यक है क्योंकि विमान के ढांचे पर अचानक हुए मूवमेंट का असर पड़ सकता है। हम इस घटना की जांच जारी रखेंगे और जांच के नतीजों के आधार पर अतिरिक्त चेकिंग की भी जरूरत पड़ सकती है। इस जांच की जटिलता को देखते हुए आखिरी निष्कर्ष सामान्य AOG (Aircraft on Ground) मामलों की तुलना में ज्यादा समय ले सकता है।”

संपादकीय | विमान सुरक्षा पर फिर सवाल: हादसे के बाद भी क्यों नहीं सुधरती व्यवस्था?

जब भी कोई विमान हादसा होता है, तो उसके जांच निष्कर्षों का पहला सबक यही होना चाहिए कि भविष्य में उस तरह की खामियां किसी दुर्घटना का कारण न बनें। मगर विमान हादसों का सिलसिला जिस तरह बदस्तूर जारी है, उससे यह विश्वास करना मुश्किल है कि सबक लेने और सुधार की प्रक्रिया में कहीं कोई गंभीरता बरती जाती है। कहने को यात्रियों की सुरक्षा सरकार और विमानन कंपनियों के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है, लेकिन धरातल पर स्थिति कुछ और ही नजर आती है।