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मरीजों की आर्थिक सेहत भी दुरुस्त रखेगा एम्स

एम्स की योजना आर्थिक मदद आॅनलाइन करने की है। राज्यों के सरकारी अस्पतालों की हालत दयनीय होने की वजह से तमाम मरीज यहीं आते हैं। लिहाजा राज्य सरकारों से मांग की जाएगी कि वे मुख्यमंत्री या राज्य राहत कोष की राशि एकमुश्त एम्स को दे दें। एम्स राज्यवार मरीजों का आकंड़ा तैयार कर रहा है। ताकि जिस राज्य का मरीज असमर्थ हो वह सीधे एम्स में ही आवेदन करके राज्य की राशि से मदद ले सके। -डॉक्टर दीपक अग्रवाल
Author नई दिल्ली | May 20, 2016 01:56 am
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली

तमाम गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों के इलाज के लिए बने तरह-तरह के सरकारी अर्थिक सहायता कोष के पैसों के समुचित समायोजन की दिशा में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने पहल की है। देश के तमाम राज्यों से आने वाले मरीजों की आर्थिक मदद के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष के पैसे भी एम्स के खाते में जमा कराने के लिए एम्स की ओर से राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मदद मांगने की योजना है, ताकि यहां आने वाले मरीजों की उन पैसों से मदद की जा सके। उन पैसों के आवेदन से लेकर आबंटन तक को आॅनलाइन किया जाएगा ताकि इसमें राज्यवार मरीजों का ब्योरा हो और भ्रष्टाचार की गुंजाइश भी कम से कम हो।

कैंसर, अंग प्रत्यारोपण, हृदय की सर्जरी सहित तमाम असाध्य बीमारियों के इलाज के लिए या तरह-तरह के उपकरण (डिवाइस) लगाने में आने वाले लाखों रुपए के खर्च को वहन करने में न केवल गरीब मरीज असमर्थ होते हैं बल्कि यह मध्यम आय वर्ग के लोगों के भी बूते के बाहर की बात है। जहां ऐसे गरीब (बीपीएल) मरीजों के खर्च माफ कर दिए जाते हैं वहीं तरह-तरह के आर्थिक सहायता कोष भी बनाए गए हैं जिनसे मरीज आर्थिक मदद ले सकते हैं। ये कोष हैं-राष्ट्रीय आरोग्य निधि, प्रधानमंत्री राहत कोष, मुख्यमंत्री राहत कोष, सांसद या विधायक फंड।

आरोग्य निधि के साथ मुश्किल यह है कि इसमें एक मरीज को एक बार ही सहायता मिलती है वह भी कुछ लाख रुपए ही। प्रधानमंत्री राहत कोष से भी एक बार में आम तौर से 50 हजार रुपए मिलते रहे हैं। अब इसे बढ़ा दिया गया है। इसी तरह से एम्स के गरीब राहत कोष से डेढ़ लाख रुपए की अधिकतम सहायता दी जा सकती है। वह भी तमाम कंपनियों क ी सामाजिक जवाबदेही कोष से मिले पैसों से। कृत्रिम अंगों व लंबी चलने वाली दवाओं के लिए समाज कल्याण मंत्रालयों व अन्य मंत्रालयों से भी राहत राशि मिलने का प्रावधान है।

कुल मिलाकर मुख्यंत्री कोष ही ऐसा है जिससे अधितम राहत मिल सकती है। लेकिन इस कोष से पैसे मिलने की प्रक्रिया व उसके लिए जरूरी कागजात होना इतना मुश्किल है कि लोगों को महीनों इस प्रक्रिया को पूरे करने में लग जाते हैं। इसके लिए सांसद या विधायकों से पत्र लिखवा कर आवेदन प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है। इसके लिए लिए किसी आय प्रमाणपत्र के साथ पूरे परिवार की आमदनी का ब्योरा भी देना होता है। चूंकि ज्यादातर मरीज यहां आते हैं तो वे जरूरी कागजात भी साथ नहीं लाते क्योंकि वे या तो ऐसे किसी कागज के बारे में जानते नहीं या साथ रखना भूल जाते हैं। बहुत मरीजों के पास ऐसे कागज होते ही नहीं हैं।

जिनके पास आय प्रमाणपत्र नहीं होते उनके लिए भी रास्ता सुझाने व उनकी फाइलें सांसद या विधायक के जरिए आगे बढ़ाने के लिए एम्स में 50 समाज कल्याण अधिकारी सहित सभी अस्पतालों मे ऐसे अधिकारी नियुक्त होते हैं। एम्स के मुख्य समाज कल्याण अधिकारी बीएस राजशेखर ने बताया कि एम्स में करीब तीन हजार मरीज ऐसे आते हैं जिन्हें किसी न किसी राहत कोष से मदद की दी जाती है। पिछले साल ऐसे मरीजों को कुल करीब 60 से 70 करोड़ रुपए की राहत दी गई। हर शुक्रवार को इस तरह की फाइलों क ी पड़ताल व मंजूरी के लिए कमेटी बैठती है। लेकिन प्रक्रिया लंबी होने से समय लग जाता है।

एम्स की योजना इस मदद प्रक्रिया को आॅनलाइन करने की है। डॉक्टर दीपक अग्रवाल को इसका जिम्मा दिया गया है। इनका कहना है कि राज्यों के सरकारी अस्पतालों की हालत दयनीय होने की वजह से तमाम मरीज यहीं आते हैं। लिहाजा राज्य सरकारों से मांग की जाएगी कि वे मुख्यमंत्री या राज्य राहत कोष की राशि एकमुश्त एम्स को दे दें। एम्स राज्यवार मरीजों का आकंड़ा तैयार कर रहा है। ताकि जिस राज्य का मरीज असमर्थ हो वह सीधे एम्स में ही आवेदन करके राज्य की राशि से मदद ले सके।

अग्रवाल ने कहा कि कुछ मरीज चालाकी भी करते हैं कि एक मर्ज के इलाज के लिए कई जगह आवेदन कर देते हैं। इनका दावा है कि आॅनलाइन प्रक्रिया होने से ऐसे घपले रोके जा सकते हैं। वहीं कई राज्यों के बीपीएल परिवारों का आॅनलाइन ब्योरा मिल जाता है।
लेकिन कई राज्यों की जानकारी नहीं मिल पाने से मरीजों की जरूरी अहर्ता का भी सही से पता नहीं चलता। उन्होंने बताया कि जिस परिवार की सालाना आय तीन लाख रुपए या उससे कम है उसे पांच लाख रुपए तक की सहायता राशि मिल जाती है।

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