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कृषि सुधार विधेयक: ऐसा क्या है इन विधेयकों में जो एनडीए में पड़ गई फूट, सड़क पर उतरे हैं किसान? जानें सब कुछ

इन विधेयकों के संसद में पेश होने के साथ ही बड़ी संख्या में किसान संगठनों ने इनका विरोध शुरू कर दिया। हालांकि, सरकार का कहना है कि इस विधेयक के पारित होने के बाद किसानों को अपने उत्पाद के लिए बेहतर राशि मिल सकेगी।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र नई दिल्ली | Updated: September 18, 2020 3:41 PM
agriculture billकृषि सुधार विधेयकों के संसद में पेश होने के साथ ही बड़ी संख्या में किसान संगठनों ने इनका विरोध शुरू कर दिया।

लोकसभा में कृषि सुधार के लिए पेश किए विधेयक गुरुवार को ध्वनिमत से पारित कर दिए गए। मोदी सरकार द्वारा व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा प्रदान करना) विधेयक, 2020, कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक पास कराए गए, जबकि आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 बिल पहले ही पास किया जा चुका है। अब इन्हें राज्यसभा में पेश किया जाना है, जहां जरूरी समर्थन मिलने के बाद यह कानून बन जाएंगे।

हालांकि, इन विधेयकों के संसद में पेश होने के साथ ही बड़ी संख्या में किसान संगठनों ने इनका विरोध शुरू कर दिया। सरकार का कहना है कि इस विधेयक के पारित होने के बाद किसानों को अपने उत्पाद के लिए बेहतर राशि मिल सकेगी। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने तो किसानों की उन शंकाओं को भी दूर कर दिया था कि इन विधेयकों के पास होने के बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) मिलना बंद हो जाएगा। उन्होंने सदन से इसके जारी रहने की बात की थी। हालांकि, विपक्षी पार्टियों ने इस विधेयक का पुरजोर विरोध किया है।

तीन विधेयकों में क्या हैं प्रावधान?:

1. केंद्र सरकार इन विधेयकों के जरिए कृषि सुधारों को बढ़ावा देना चाहती है। नए कानूनों के जरिए किसान जहां चाहेंगे, वहां अपनी मर्जी से फसल बेच सकेंगे। यानी वे अपनी मंडी से दूर किसी अन्य शहर या राज्य की मंडी में भी फसल के दाम पा सकते हैं। इसके अलावा उन्हें ई-ट्रेडिंग की व्यवस्था भी दी गई है, जिससे उन्हें फसल को बेचने के लिए उसे लाना-ले जाना नहीं पड़ेगा। इससे किसान कम उत्पादन वाले राज्यों में अपनी फसल की अच्छी कीमत पा सकते हैं। दूसरे बिल में

2. दूसरे विधेयक में प्रावधान हैं कि खेती में उनके सामने जो भी जोखिम आएंगे, वह उन्हें नहीं, बल्कि उनसे समझौता करने वालों को उठाने होंगे। यानी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाएगा। किसान खुद कृषि क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों, होलसेलर, रिटेलर और निर्यातकों से बात कर फसल बेच सकेंगे, जिससे दलाली खत्म होगी। इसके अलावा समझौते में सप्लाई, क्वालिटी और स्टैंडर्ड से जुड़े नियम शर्तें होंगी। अगर फसल की कीमत कम होती है, तो किसानों को तय कीमत तो मिलेगी ही। अगर फसल अच्छी आती है, तो उन्हें अतिरिक्त फायदें होंगे।

3. तीसरे कानून से कोल्ड स्टोरेज और फूड सप्लाई चेन के आधुनिकीकरण होगा। यह किसानों के साथ ही उपभोक्ताओं के लिए कीमतों को एक जैसा बनाए रखेगा। इससे उत्पादन, स्टोरेज, मूवमेंट और डिस्ट्रीब्यूशन पर सरकारी नियंत्रण खत्म हो जाएगा। युद्ध, प्राकृतिक आपदा, कीमतों में असाधारण वृद्धि और अन्य परिस्थितियों में केंद्र सरकार नियंत्रण अपने हाथ में ले लेगी।

विपक्षी पार्टियां क्यों कर रहीं विरोध:
हालांकि, विपक्षी पार्टियों का कहना है कि किसानों को अपने उत्पाद के लिए मंडियों से ही सही मूल्य मिल जाता था। इससे मंडी शुल्क के तौर पर राज्यों की भी आमदनी होती थी, जिससे किसानों के लिए बुनियादी सुविधाएं तैयार की जाती थीं। अगर किसानों को कहीं भी फसल बेचने की सुविधा मिल गई, तो मंडियों पर खतरा पैदा हो जाएगा। इससे किसानों को अपनी फसल पर मिलने वाले MSP से भी वंचित रहना होगा। हालांकि, केंद्र का कहना है कि मंडियों की व्यवस्था को कोई नुकसान नहीं होगा और न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था भी बनी रहेगी।

इसके अलावा विधेयक कीमतों में आ रहे उतार-चढ़ाव से बचाने की बात तो करता है लेकिन इसमें व्यवस्था को लागू करने के बात नहीं कही गई है। विपक्ष का कहना है कि इससे बड़े औद्योगिक घराने किसानों का शोषण कर सकेंगे। तीसरे विधेयक के विरोध में विपक्ष का कहना है कि खाद्य वस्तुओं पर रेगुलेशन खत्म करने से निर्यातक और कारोबारी पहले जमाखोरी करेंगे और बाद में खाद्य सामग्री के दाम अपनी मर्जी से बढ़ाएंगे। इसके अलावा राज्यों को यह पता ही नहीं होगा कि राज्यों में किस वस्तु का कितना स्टॉक है। इससे आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी बढ़ सकती है।

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