चार साल की सेवा पूरी कर दिसंबर 2026 में अग्निवीर अपने घरों, अपने परिवारों और अपने प्रियजनों के बीच लौटने वाले हैं। ये वे हजारों युवा पुरुष और महिलाएं हैं, जिन्होंने भारतीय सेना का हिस्सा बनने के लिए चार साल की अवधि के लिए भर्ती होने का विकल्प चुना था। उस दौरान उन्हें देश की सेवा करने के बदले कुछ प्रोत्साहनों का भी वादा किया गया था, जिनमें राज्य की कानून-व्यवस्था से जुड़ी सरकारी सेवाओं में भर्ती के दौरान प्राथमिकता देना भी शामिल था।
जब जून 2022 में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने यह योजना शुरू की थी, तब विपक्ष और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं की ओर से इसका तीखा विरोध हुआ था।
उस समय मुख्य तर्क यह दिया गया था कि चार साल की सेवा पूरी करने के बाद लौटने वाले इन ‘सैनिकों’ के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो सकता है। आशंका थी कि उनके पास ऐसे पर्याप्त कौशल नहीं होंगे, जिनके आधार पर वे तेजी से प्रतिस्पर्धी होती अर्थव्यवस्था में सार्थक रोजगार हासिल कर सकें। ऐसी अर्थव्यवस्था में, जहां पीएचडी धारकों तक को नौकरी पाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
इस समस्या का समाधान करने के लिए विभिन्न राज्य सरकारों – विशेषकर भारतीय जनता पार्टी द्वारा शासित राज्यों – ने ‘अग्निवीर कोटा’ घोषित करना शुरू किया। अब समय आ गया है कि देखा जाए कि ये व्यवस्थाएं वास्तव में कितनी प्रभावी साबित होती हैं।
हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के अग्निवीरों के लिए तैयारी
हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की भाजपा सरकार इस विषय पर एक विस्तृत नीति लेकर सामने आई है। इसके विपरीत, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की सरकार और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार ने अभी तक ऐसी कोई विस्तृत योजना पेश नहीं की है।
मई में भगवंत मान ने अग्निवीरों को आरक्षण का लाभ देने की मंजूरी जरूर दी थी, लेकिन उनकी सरकार ने अभी तक इसके विस्तृत प्रावधान सार्वजनिक नहीं किए हैं। बेशक, इसके लिए अभी कुछ समय उपलब्ध है, लेकिन अगले वर्ष की शुरुआत में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह समय तेजी से कम होता जा रहा है।
आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस व्यवस्था को लागू करने के तौर-तरीकों और ढांचे को ‘समयबद्ध तरीके से अंतिम रूप देने’ के लिए एक ‘उच्चाधिकार प्राप्त समिति’ का गठन किया था। लगभग तीन महीने पहले गठित इस समिति में वरिष्ठ पुलिस और सरकारी अधिकारियों को शामिल किया गया था।
द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, पंजाब से 2,242 अग्निवीरों की भर्ती हुई थी। नियमों के मुताबिक इनमें से 75 प्रतिशत, यानी 1,818 अग्निवीरों को सेवा से मुक्त किया जाएगा। बाकी 25 प्रतिशत अग्निवीरों को उनकी चुनी हुई सैन्य सेवा में ‘स्थायी रूप से शामिल’ किए जाने की उम्मीद होगी।
सेवा से मुक्त होने वाले अग्निवीरों में से अनुमानतः 40 प्रतिशत को केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत समायोजित किए जाने की संभावना है। इसका अर्थ है कि लगभग 1,100 अग्निवीर ऐसे बचेंगे, जिनके रोजगार और समायोजन की जिम्मेदारी पंजाब सरकार को देखनी होगी। यही वह विषय है जिस पर ऊपर बताई गई समिति को अपनी व्यवस्था तैयार करनी है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि समिति ने अपनी रिपोर्ट भगवंत मान सरकार को सौंप दी है या नहीं।
द इंडियन एक्सप्रेस ने सरकार के भीतर के अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। अखबार ने पंजाब के सैनिक कल्याण विभाग के निदेशक ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) बी.एस. ढिल्लों से संपर्क किया। उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि समिति की रिपोर्ट वास्तव में सरकार को सौंप दी गई है। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि रिपोर्ट में क्या सिफारिशें की गई हैं और न ही उन्होंने उसकी विषय-वस्तु के बारे में कोई जानकारी होने का दावा किया।
द इंडियन एक्सप्रेस के सूत्रों के अनुसार, राज्य पुलिस बल में लौटने वाले अग्निवीरों में से बहुत बड़ी संख्या को भर्ती किए जाने की संभावना नहीं है। इसी कारण इस मुद्दे पर पर्दे के पीछे तत्काल स्तर पर बातचीत चल रही है।
हिमाचल प्रदेश की अग्निवीर समस्या
पड़ोसी हिमाचल प्रदेश में भी निर्णय लेने की प्रक्रिया ठहरी हुई नजर आ रही है। हिमाचल प्रदेश के गृह सचिव अमरजीत सिंह ने राज्य सरकार की नौकरियों में लगभग 20 प्रतिशत पद अग्निवीरों के लिए आरक्षित करने की योजना की बात कही थी। लेकिन पंजाब की तरह यहां भी अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं हुई है।
सिंह ने संकेत दिया था कि गृह विभाग, जो इस मामले में नोडल विभाग है, को इस समस्या का समाधान निकालने के लिए सरकार के अन्य विभागों के साथ मिलकर काम करना होगा।
और हरियाणा?
नायब सिंह सैनी की सरकार फिलहाल ऐसी एकमात्र सरकार दिखाई देती है जो अग्निवीरों के आने के लिए ‘तैयार’ नजर आ रही है। रिपोर्टों के अनुसार, हरियाणा सरकार ने सरकारी पदों के एक समूह में 20 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का प्रावधान किया है। इसके अलावा कुछ ग्रुप-सी और ग्रुप-बी पदों में भी क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था की गई है।
20 प्रतिशत का यह आरक्षण गृह एवं जेल विभागों के पदों के साथ-साथ वन और खनन जैसे अन्य विभागों के पदों पर भी लागू होगा। इस 20 प्रतिशत आरक्षण के भीतर वंचित अनुसूचित जातियों, अन्य अनुसूचित जातियों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए भी प्रावधान किए गए हैं।
क्या है अग्निवीर योजना?
जून 2022 में केंद्र सरकार ने भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना में युवा पुरुषों और महिलाओं को अल्पावधि के लिए भर्ती करने की एक नई योजना शुरू की थी।
इस योजना का उद्देश्य सेना में जवानों की भर्ती और उन्हें सेवा में बनाए रखने की मौजूदा व्यवस्था का पुनर्गठन करना था। सरल शब्दों में कहें तो इसका एक प्रमुख उद्देश्य सशस्त्र बलों पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को कम करना था। यानी वेतन आदि पर होने वाले खर्च को कम करना और सेना में सैनिकों की औसत आयु को कम रखना।
सैनिकों की कम आयु वाली संरचना को महत्वपूर्ण माना गया था, क्योंकि आधुनिक सैन्य रणनीति में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है और तकनीक अब सैन्य अभियानों का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है।
इस योजना के तहत यह भी तय किया गया था कि चार साल की सेवा पूरी होने के बाद केवल 25 प्रतिशत अग्निवीरों को ही सेना में आगे बनाए रखा जाएगा। यही प्रावधान व्यापक विरोध और प्रदर्शनों का एक प्रमुख कारण बना था। इसके बाद अग्निवीरों को चार साल की सेवा के बाद बनाए रखने की सीमा बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने के प्रस्ताव भी सामने आए हैं। हालांकि, अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
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दिल्ली के उपराज्यपाल ने फायर ब्रिगेड कर्मियों और जेल की नौकरियों में पूर्व अग्निवीरों के लिए 20% आरक्षण को मंजूरी दी है। एलजी तरनजीत सिंह संधू ने दिल्ली अग्निशमन सेवा में फायर ऑपरेटर के पद पर और जेल विभाग में वार्डर और मैट्रन के पदों पर सीधी भर्ती में पूर्व अग्निवीरों के लिए 20% क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) को मंजूरी दे दी है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
