भारतीय सशस्त्र बलों का मानना है कि चार साल की सेवा पूरी करने के बाद ज्यादा संख्या में अग्निवीरों को स्थायी रूप से रखा जाना चाहिए। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सेना के पास अनुभवी जवानों की संख्या बढ़े, खासकर युद्ध या किसी बड़े सैन्य संघर्ष की स्थिति में।

द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में इस मामले से जुड़े सूत्रों ने बताया कि पिछले साल हुए ऑपरेशन सिंदूर से सेना को यह अहम सीख मिली।

सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन के दौरान अग्निवीरों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया। लेकिन कई मौकों पर ऐसे सैनिक जिन्हें अलग-अलग इलाकों में काम करने और कई सैन्य अभ्यासों का अनुभव था, उन्होंने हालात का ज्यादा तेजी और प्रभावी तरीके से सामना किया। इसी अनुभव को देखते हुए सेना अब अधिक अग्निवीरों को सेवा में बनाए रखने की जरूरत महसूस कर रही है।

हर साल सेना से एक तय संख्या में जवान सेवानिवृत्त होते हैं। ऐसे में अगर कम संख्या में अग्निवीरों को सेवा में रखा गया तो आने वाले कुछ समय के लिए सेना में जवानों की कमी हो सकती है। हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि यह स्थिति कुछ सालोंं में सामान्य हो जाएगी।

कब शुरू हुई थी अग्निवीरों की ट्रेनिंग

अग्निपथ योजना के तहत भर्ती किए गए अग्निवीरों ने साल 2023 की शुरुआत में अपनी ट्रेनिंग शुरू की थी। इन शुरुआती बैचों के अग्निवीर इस साल के आखिर तक अपनी चार साल की सर्विस पूरी कर लेंगे।

इस बीच चार साल की सेवा पूरी करने से पहले ही तीनों सेनाएं अग्निवीरों को स्थायी सर्विस में रखने का प्रतिशत बढ़ाने की मांग कर रही हैं। हालांकि, फिलहाल तीनों सेनाओं के लिए 25 प्रतिशत अग्निवीरों को ही सेवा में बनाए रखने का प्रावधान लागू है।

सूत्रों के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना ने बड़ी संख्या में नई टेक्नोलॉजीज, मॉडर्न प्लेटफॉर्म और अत्याधुनिक हथियारों की खरीद शुरू की है। ऐसे में इन सिस्टम को चलाने वाले जवानों को पहले से ज्यादा समय तक विशेष प्रशिक्षण देने की जरूरत महसूस की जा रही है ताकि वे इनका पूरा अनुभव हासिल कर सकें।

यह जरूरत खास तौर पर नौसेना के उन नाविकों और वायुसेना व थलसेना के उन जवानों के लिए अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है जिन्हें अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों और हथियार प्रणालियों के संचालन की जिम्मेदारी दी जाती है।

सेना में अनुभवी सैनिकों की पर्याप्त संख्या

सूत्रों के अनुसार, अगर अधिक संख्या में अग्निवीरों को सेवा में रखा जाता है तो तीनों सेनाओं में जवानों की औसत उम्र युवा बनी रहेगी। इसके साथ ही सेना के पास पर्याप्त संख्या में अनुभवी सैनिक भी उपलब्ध रहेंगे। इससे युवाओं और अनुभव के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकेगा।

इसके अलावा, इसके पीछे कुछ अन्य कारण भी हैं। अधिकारियों का मानना है कि सैनिकों का लंबा कार्यकाल उन्हें अपने साथियों के साथ बेहतर तालमेल और भरोसा बनाने का मौका देता है। कठिन परिस्थितियों, चुनौतीपूर्ण तैनाती और मुश्किल दौर को साथ मिलकर झेलने से जवानों के बीच आपसी समझ और टीम भावना भी मजबूत होती है।

पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने पिछले महीने द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि अग्निपथ योजना को सेना में बड़ा मानव संसाधन सुधार (मैनपावर रिफॉर्म) माना जाना चाहिए। इसका उद्देश्य सेना को अधिक युवा, ऊर्जावान, अनुशासित और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार बनाना है। उन्होंने कहा कि अग्निवीर भारतीय सेना में सकारात्मक योगदान दे रहे हैं।

जनरल द्विवेदी ने यह भी कहा कि अग्निपथ योजना अभी एक विकसित होती हुई प्रक्रिया है। पहले बैच के अग्निवीरों का चार साल का पूरा कार्यकाल अभी समाप्त नहीं हुआ है। इसलिए योजना में किसी भी तरह के बदलाव या सुधार का फैसला समय के साथ मिले अनुभव, सैन्य अभियानों से मिलने वाली प्रतिक्रिया (ऑपरेशनल फीडबैक) और सेना के समग्र आकलन के आधार पर ही लिया जाएगा।

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केंद्र की मोदी सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर हलफनामे में स्पष्ट किया है कि अग्निवीर नियमित सैनिकों की श्रेणी में नहीं आते हैं। ऐसे में युद्ध या किसी सैन्य कार्रवाई के दौरान उनकी मृत्यु होने पर उनके परिवार को सामान्य सैनिकों की तरह पेंशन का लाभ नहीं दिया जा सकता। पढ़ें पूरी खबर