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सिस्टम का सर्कसः भूखे की मौत पर अनाज की बोरियां और गीतकार के निधन पर ‘रुकी पेंशन’

93 साल के वयोवृद्ध गीतकार, जिनके हाथ-पैर सही से काम न कर रहे हों, जो दिल में इच्छा मृत्यु की चाहत रखते हों, जिन्हें घर के एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने में भी असहनीय वेदना होती हो, वह गोपाल दास नीरज अगर अलीगढ़ से 350 किलोमीटर दूर लखनऊ, वो भी तेज गर्मी के मौसम में अगर जाने को मजबूर हुए तो समझा जा सकता है कि यश भारती की रुकी पेंशन की उन्हें कितनी दरकार थी।

Author नई दिल्ली | July 22, 2018 12:20 PM
कवि और गीतकार गोपालदास नीरज। (फाइल फोटो)

“जब तक मेरी यशभारती की पेंशन बहाल नहीं हो जाती, तब तक इस दुनिया से नहीं जाने वाला।” अस्पताल के बेड पर लेटे-लेटे हुए यह बात कही थी गोपालदास नीरज ने। तारीख थी 26 दिसंबर 2017। बीमार होने पर तब वह अलीगढ़ के अस्पताल में भर्ती थे। डॉ. संजय भार्गव उनका इलाज कर रहे थे। हालचाल पूछने करीबी आते तो गोपाल दास नीरज विनोदपूर्वक यही बात कहते थे। वह कहते थे- जब तक यश भारती की पेंशन जारी नहीं कर दी जाएगी, तब तक मैं अस्पताल के कमरे में नहीं मरने वाला। यूं तो उनकी आखिरी ख्वाहिश मंच पर कविता पाठ करते मौत पाने की थी, मगर 93 साल की उम्र में नीरज इस कदर टूट गए थे कि उन्होंने जीने का इरादा ही छोड़ दिया और मौत से महज आठ दिन पहले डीएम को खत लिखकर इच्छामृत्यु भी मांग ली थी।

19 जुलाई को निधन से सिर्फ 22 दिन पहले। 27 जून की बात है। बीमारी के चलते अलीगढ़ के जनकपुरी स्थित घर पर बिस्तर पकड़ लेने वाले नीरज अचानक लखनऊ के लिए चल पड़ते हैं। 93 साल का एक वयोवृद्ध गीतकार, जिनके हाथ-पैर सही से काम न कर रहे हों, जो दिल में इच्छा मृत्यु की चाहत रखते हों, जिन्हें घर के एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने में भी असहनीय वेदना होती हो, वह नीरज 350 किलोमीटर दूर लखनऊ वो भी चिलचिलाती गर्मी में अगर जाने को तैयार हुए तो तो समझा जा सकता है कि क्या दर्द रहा होगा, क्या मजबूरी रही होगी? उन्हें यशभारती की पेंशन की कितनी जरूरत रही होगी। दरअसल गीतों और कविताओं की रॉयल्टी से नीरज को इतना पैसा नहीं मिलता था, जिससे कि अपना समुचित इलाज करा सकें।पेंशन रुकने पर खुद कई दफा यह बात नीरज कह चुके थे।

अलीगढ़ में महान कवि नीरज का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया (PTI Photo)

बहरहाल, लखनऊ पहुंचकर उस दिन उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके 5-कालीदास मार्ग वाले आवास पर भेंट की। किसी ने उन्हें बताया कि अब संगठन के सबसे ताकतवरों में शुमार प्रदेश संगठन मंत्री सुनील बंसल से भी उन्हें मिलना चाहिए। उनसे भी जाकर मिले। सरकार और संगठन के दो शीर्ष व्यक्तियों से मुलाकात के बाद भी नीरज जब अलीगढ़ लौटे तो एक बार फिर सिर्फ आश्वासन लेकर।
नीरज को सरकार और सिस्टम पर पूरा भरोसा था। उन्हें आशा थी कि साल भर से रुकी यश भारती पेंशन फिर से शुरू होगी। भरोसा हो भी क्यों न, जब मुख्यमंत्री ही आमने-सामने की मुलाकात में उन्हें आश्वासन दे चुके थे। मगर यह भरोसा नहीं सिर्फ एक भ्रम था। पेंशन की आस कलेजे में दफन किए आखिर नीरज 19 जुलाई को हमेशा के लिए दुनिया छोड़ गए। सिस्टम का तमाशा देखिए, उत्तर प्रदेश की माटी की इस पैदाइश की जीते जी यूपी सरकार ने कद्र नहीं की और जब मर गए तब उनके नाम पर हर साल पांच नवोदित साहित्यकारों को पुरस्कार देने की घोषणा की है।

अलीगढ़ में कवि नीरज की अंतिम यात्रा में सैकड़ों लोग शामिल हुए (फोटो-पीटीआई)

शासन ने नीरज के निधन के बाद बदनामी की डर से यश भारती पेंशन पर लगी रोक हटा ली। कुछ नए-नियम-कायदे नत्थी किए और 50 हजार की धनराशि में 50 प्रतिशत कटौती कर 25 हजार की। मगर तब तक नीरज परलोकवासी हो चुके थे। मगर यह सवाल तो उठेगा ही आखिर 15 महीने से जांच के नाम पर जो पेंशन लटकाए रखी गई, वह नीरज की मौत के बाद ही कैसे चंद घंटों में बहाल हो गए। क्या गीतों के राजुकमार के जिंदा रहते यही काम नहीं हो सकता था।

करीबी लोगों के मुताबिक कम से कम तीन बार नीरज व्यक्तिगत रूप से मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर यश भारती पेंशन शुरू करने की गुहार लगा चुके थे। आखिरी बार उन्हें मार्च 2017 में पेंशन मिली थी, जिसके बाद सरकार ने जांच के नाम पर रोक दी थी। अखिलेश सरकार में रेवड़ी की तरह अपात्रों को पुरस्कार मिलने पर बैठी जांच के सवाल पर नीरज का कहना था-“ मैं पदमभूषण, पदम श्री से सम्मानित कवि हूं, मेरे मामले में सरकार को क्या जांच करनी है? यदि जांच करनी भी है तो जल्दी करे, इतने महीने से जांच ही तो चल रही है। ” दरअसल नीरज का कहना था कि जांच बेशक होनी चाहिए। मगर अपात्रों के चक्कर में पात्रों को तो लाभ से न वंचित रखा जाए।

यह एक झलक है, सरकारी सिस्टम और उसके बाबुओं की उस संवेदनहीनता की, जो जिंदों की समय रहते मदद नहीं, बल्कि मरने वालों को मुआवजा बांटने में यकीन रखता है। शायद, कवि नीरज को यह नहीं मालुम था कि सरकारी सिस्टम की चक्की बहुत ‘समाजवादी’ होती है। उसे राष्ट्रपति से पद्मभूषण और पद्मश्री से विभूषित कलाकार और चारणगीत गाकर यश भारती झटक लेने वाले चंद लोगों के बीच कोई फर्क नहीं मालुम।

अब देखिए न सरकारी सिस्टम की ‘संवेदनशीलता’। पिछले साल नवंबर की बात है। बरेली में 55 साल की गरीब महिला शकीना राशन की दुकान से लेकर डीएम के दर तक राशन की गुहार लगातीं रहीं,, मगर नहीं मिला। क जब भूख से दम तोड़ दिया तो उसी प्रशासन ने घर पर अनाज की बोरियां भिजवा दी। ताकि भुखमरी से मौत पर पर्दा डाला जा सके। इस गरीब महिला के घर अगर दो-चार किलो राशन ही समय रहते दिया गया तो शायद महिला जान नहीं देती। जिस तरह से मरने के बाद शकीना के काम राशन नहीं आने वाला, उसी तरह गोपालदास नीरज के काम अब रुकी पेंशन कहां आने वाली। भला सोचिए, जो सिस्टम जीते जी किसी को एक दाना नहीं देता, जीते जी पेंशन के लिए तरसा देता है, वही मौत के बाद कितना दरियादिल हो जाता है। अनाज की बोरियां भेजी जाती हैं तो महीनों से रुकी पेंशन की अचानक चंद घंटों में जांच पूरी कर रोक हटा ली जाती है। यह कैसा सिस्टम है, जहां नीरज को रुकी पेंशन के लिए  तो शकीना को घर में अनाज के लिए अपने मरने का इंतजार करना पड़ा।

आखिर में गोपालदास नीरज की ये पंक्तियां गौरतलब हैं-
आँसू जब सम्मानित होंगे मुझको याद किया जाएगा
जहाँ प्रेम का चर्चा होगा मेरा नाम लिया जाएगा।

मान-पत्र मैं नहीं लिख सका
राजभवन के सम्मानों का
मैं तो आशिक रहा जनम से
सुंदरता के दीवानों का
लेकिन था मालूम नहीं ये
केवल इस गलती के कारण
सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा।

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