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सोनिया ने किया साइडलाइन तो आडवाणी के सहारे बीजेपी में आए, एमजे अकबर ने यूं बनाई मोदी सरकार में पैठ

एशियन एज में काम करने के दौरान अकबर की बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी से नजदीकियां बढ़ी थी। कहा जाता है कि आडवाणी 2004 चुनाव से पहले अकबर को बीजेपी में शामिल करना चाहते थे।

एमजे अकबर (Photo: PTI)

जून 2014 की बात है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के पहले दि्वपक्षीय दौरे के लिए बांगलदेश जाने से पहले एमजे अकबर ढाका पहुंचे थे। इसी साल मार्च में अकबर ने बीजेपी जॉइन की थी। अकबर से अनौपचारिक तौर पर कहा गया था कि वे भारत और बांग्लादेश के बीच बातचीत के लिए जमीन तैयार करें। बतौर पत्रकार, अकबर ने बांग्लादेश के राजनीतिक हलकों में मजबूत नेटवर्क तैयार किया था। इस देश के प्रभावशाली वर्ग के बीच अकबर की एक खास छवि थी। बीजेपी अकबर के इस बहुमूल्य नेटवर्क का इस्तेमाल करना चाहती थी। बांग्लादेश के एक शीर्ष वार्ताकार ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ‘हमारे कांग्रेस के साथ रिश्ते थे और प्रणब मुखर्जी की अगुआई में कई बांग्लाभाषी वार्ताकार थे। लेकिन बीजेपी के साथ एक दूरी थी। ऐसे बहुत लोग नहीं थे जो बंगाली भी बोलते हों और उन्हें बारीकियों की समझ हो। इस काम के लिए अकबर बिलकुल फिट थे।’

अकबर ने ढाका में जो काम किया, उससे सरकार में बहुत सारे लोग प्रभावित थे। पीएम नरेंद्र मोदी के जून 2015 के दौरे को सफल माने जाने के बाद अकबर ढाका में भारतीय राजनयिकों के साथ पर्दे के पीछे काम कर रहे खिलाड़ी के तौर पर उभरे। यहीं से उनके विदेश मंत्रालय में शामिल किए जाने की नींव पड़ी। विदेश मंत्रालय को उस वक्त खाड़ी और पश्चिम एशियाई मुल्कों के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने के लिए एक वार्ताकार की जरूरत थी। जून 2016 में अकबर को विदेश राज्य मंत्री बनाया गया। एक पश्चिम एशियाई मुल्क के डिप्लोमैट का कहना है, ‘वह लोगों की बात उत्सुकता से सुनते हैं। हम मुद्दों पर खुलकर बात कर सकते हैं।’ वहीं, बीजेपी के एक नेता ने भी माना कि अकबर बीजेपी के एक ‘एसेट’ (संपत्ति) थे। वह मुस्लिम वोटों को लाने के लिए नहीं थे, वह अभी भी पार्टी के एक भरोसेमंद मुस्लिम चेहरे हैं।

हालांकि, अकबर किसी एक राजनीतिक पार्टी या विचारधारा से बंधकर नहीं रहे। वह अपने मित्रवत संबंधों की वजह से देश के दो राजनीतिक पार्टियों से जुड़ पाए। राजीव गांधी से नजदीकियों की वजह से वह कांग्रेस में आए। वहीं, एलके आडवाणी के करीबी होने का फायदा बीजेपी में शामिल होने के लिए मिला। 80 के दशक के मध्य में भारतीय मुस्लिमों में तीखे होते पारंपरिक विचारधारा के इतर अकबर के उदारवादी रवैए ने मणिशंकर अय्यर जैसे राजीव गांधी के नजदीकियों का ध्यान खींचा। मणिशंकर उस वक्त राजीव गांधी के प्रेस सेक्रेटरी थे। पूर्व चीफ इन्फॉर्मेशन ऑफिसर वजाहत हबीबुल्लाह के मुताबिक, अकबर ने ही राजीव को ऐतिहासिक शाहबानो केस में दखल देने के लिए राजी किया था। बाद में राजीव सरकार के उस कदम की तीखी आलोचना हुई और अब भी कांग्रेस पार्टी के लिए यह प्रकरण किसी बुरे सपने से कम नहीं।

राजीव की दोस्ती की वजह से अकबर ने 1989 में पत्रकारिता छोड़ दी। यह वो दौर था, जब अकबर ने एक शानदार एडिटर के तौर पर छवि बना ली थी। बोफोर्स डील में धांधली के आरोपों का सामना कर रहे राजीव ने अकबर को 1989 के चुनावों में बिहार के मुस्लिम बहुल इलाके किशनगंज से उतारा। अकबर तो जीत गए लेकिन कांग्रेस हार गई। राजीव पार्टी का चेहरा बचाने के लिए अकबर को उतारते रहे। राजीव की 1991 में हत्या हो गई और अकबर ने अपना दोस्त खो दिया। बाद में भावनात्मक लहर पर सवार होकर कांग्रेस सत्ता में आई, लेकिन सोनिया गांधी और नई लीडरशिप ने अकबर को नजरअंदाज किया। अकबर ने 1992 में कांग्रेस छोड़ दी।

अकबर ने पत्रकारिता में वापसी की और एशियन एज की स्थापना की। यही वो प्रकाशन है, जहां काम करने के दौरान यौन शोषण करने के अधिकतर आरोप उन पर लगे हैं। यहां काम करते करते अकबर की बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी से नजदीकियां बढ़ीं। कहा जाता है कि आडवाणी 2004 चुनाव से पहले अकबर को बीजेपी में शामिल करना चाहते थे। हालांकि, अकबर का कांग्रेस से जुड़ा इतिहास इसके रास्ते में बाधा बन रहा था। यही नहीं, 2002 के गुजरात दंगों के बाद अकबर ने एशियन एज में ही गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी की तीखी आलोचना की थी। अब सीधे बात करते हैं मार्च 2014 की। बीजेपी में आने के बाद अकबर ने इकॉनमिक टाइम्स में एक लेख लिखा। उन्होंने कहा कि अन्य पत्रकारों की तरह ही उन्होंने भी दंगों के वक्त सवाल उठाए थे। उन्होंने लिखा कि आजादी के बाद कभी ऐसा नहीं हुआ जब किसी मुख्यमंत्री के दोषी होने को लेकर इतनी बारीकी से जांच हुई, जिसमें मोदी ने उन संस्थानों का सामना किया जो दो कार्यकाल देखने वाली यूपीए सरकार के वफादार थे।

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