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विशेष: प्रेम का त्यागपत्र

‘नई कहानी’ से प्रेम कहानी की कुछ उम्मीद बंधी लेकिन रेणु की ‘तीसरी कसम’ को छोड़ अन्य कोई कहानी ‘प्रेम कहानी’ नहीं नजर आती। आती भी कैसे? अगर हमारे अधिकतर नए कहानीकारों को पहली छोड़ दूसरी-तीसरी प्रेमिकाओं-पत्नियों को पालने-छोड़ने, उनसे लड़ने-झगड़ने से फुरसत होती तब तो वे कोई प्रेमकथा लिखते। प्रेमकथा की जगह वे रिश्तों के टूटने और अतृप्त प्रेम की कहानियां ही कहते रहे।

stories of love, history of love, about love,प्रेम के कई रंग होते हैं। अलग-अलग रंगों से प्रेम का रंग और चटक हो जाता है।

आजादी के बाद हिंदी वालों ने प्रेम कहानियों के कारोबार को फिल्म उद्योग के नाम कर दिया। प्रेमकथाएं हमारी फिल्मों की मुख्य सामग्री बनी और एक से एक बेहतरीन फिल्में बनीं, जिनने लोगों को प्रेमालाप और प्रेमगान सिखाए। देवदास, मुगले आजम, अनारकली, मधुमती, महल, अमर प्रेम, एक दूजे के लिए, कयामत से कयामत तक आदि अनगिनत फिल्में हिट रहीं। लेकिन हिंदी कथा साहित्य प्रेम के तत्त्व से कन्नी ही काटता रहा।

‘नई कहानी’ से प्रेम कहानी की कुछ उम्मीद बंधी लेकिन रेणु की ‘तीसरी कसम’ को छोड़ अन्य कोई कहानी ‘प्रेम कहानी’ नहीं नजर आती। आती भी कैसे? अगर हमारे अधिकतर नए कहानीकारों को पहली छोड़ दूसरी-तीसरी प्रेमिकाओं-पत्नियों को पालने-छोड़ने, उनसे लड़ने-झगड़ने से फुरसत होती तब तो वे कोई प्रेमकथा लिखते। प्रेमकथा की जगह वे रिश्तों के टूटने और अतृप्त प्रेम की कहानियां ही कहते रहे।

जैनेंद्र तो प्रेमकथा से अधिक त्यागपत्र-कथा ही लिखते रहे और अगर यशपाल ने निजी प्रेम में कुछ ‘फिजिकल टच’ देने की कोशिश की तो तब के एक मार्क्सवादी ब्रह्मचारी आलोचक ने उनको ‘साड़ी-जंपर उतार कथाकार’ कहकर खत्ती में डाल दिया और बाकी आलोचक भी ‘सेमी ब्रह्मचारी’ जैसे बने रहे। प्रेम और सेक्स तो अब तक वर्जित इलाके हैं।

हां, हिंदी की नई ‘जेड पीढ़ी’ या कहें ‘मिलेनियम पीढ़ी’ के कुछ लेखकों ने इस वर्जना को अवश्य तोड़ा है लेकिन वे भी कुछ कैंपस प्रेम कथाओं या कुछ सहजीवन की कथाओं से आगे न बढ़ सके हैं। निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ अवश्य एक ‘दुर्घटनाग्रस्त’ हो गए प्रेम के खालीपन के इंतजार की कहानी है, जिसमें कॉन्वेंट स्कूल की एकदम मॉडर्न अध्यापिका/नायिका अपने अकेलेपन के दर्द को ‘एंजॉय’ करती रहती है और छात्रावास के जीवन के सुरक्षित अकेलेपन को चुनती है।

यह प्रेमकथा अपनी दुराशा से ऊपर नहीं उठ पाती। धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’ नामक उपन्यास अपनी कैंपस प्रेमकथा के कारण अब तक युवा पाठकों को आकर्षित करता है लेकिन सुधा और चंदर की यह प्रेमकथा अंतत: ‘ये शादी नहीं हो सकती’ के साथ ही खत्म हो जाती है।

इसी तरह धर्मवीर भारती का ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ की प्रेमकथाएं भी अतृप्त प्रेम की कथा बनकर बीच से टूट जाती हैं। वे प्रेम की जगह प्रेम के दुश्मनों की कथाएं अधिक हैं। यह भी अच्छा ही है, नहीं तो वे ‘उसने कहा था’ जैसी मुकम्मल प्रेम कहानी नहीं बन जातीं?

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