इन्फोसिस को ‘देशद्रोही’ बताने वाले पांचजन्य को अब RSS के शीर्ष नेता ने बताया ‘धर्मयुद्ध’ का अग्रदूत

पांचजन्य में एक लेख छपा था जिसमें कहा गया था कि इन्फोसिस देश विरोधी तत्वों की मदद करता है। पहले आरएसएस ने इससे दूरी बनाई थी लेकिनअब शीर्ष नेता पत्रिका की तारीफ कर रहे हैं।

आरएसएस के संयुक्त महासचिव मनमोहन वैद्य। फोटो- एक्सप्रेस आर्काइव

बीते दिनों पांचजन्य पत्रिका के एक आर्टिकल में इन्फोसिस को ‘देशद्रोही’ बता दिया गया था। इस लेख में कहा गया था कि आईटी कंपनी ‘नक्सलियों, वामपंथियों और टुकड़े-टुकड़े गैंग’ वाले लोगों की मदद करती है। इसमें यह भी कहा गया था कि भारत की अर्थव्यवस्था को इस कंपनी ने नुकसान पहुंचाया है। उस वक्त आरएसएस ने इस लेख से किनारा करते हुए कहा था कि यह संघ का मुखपत्र नहीं है। अब आरएसएस के शीर्ष नेता ने इसी पत्रिका को धर्मयुद्ध का अग्रदूत बता दिया है। उन्होंने इस पत्रिका की तारीफ करते हुए कहा कि यह सिद्धातों का युद्ध लड़ रही है।

दिल्ली के मयूर विहार में पत्रिका के नए ऑफिस के उद्घाटन के मौके पर वैद्य ने यह बात कही। कार्यक्रम में भाजपा के पूर्व महासचिव राम माधव भी मौजूद थे। इसके अलाव इस कार्यक्रम में संघ के कई और बड़े नेता पहुंचे थे। इससे पहले संघ ने एक बयान जारी करके इन्फोसिस की तारीफ की थी और कहा था कि पांचजन्य संघ का मुखपत्र नहीं है।

कार्यक्रम के दौरान मनमोहन वैद्य ने कहा, भारत में समावेशी विचारों को महत्व दिया जाता है। बहुत सारी ऐसी ताकतें हैं जो इस विचार को कमजोर करने की कोशिश करती हैं। ऐसी देशविरोधी ताकतें अब धीरे-धीरे खुद कमजोर होने लगी हैं। कहने का मतलब यह एक धर्मयुद्ध है और पांचजन्य इसका अग्रदूत है। उन्होंने कहा, जो धर्म के विरुद्ध है उसपर तीर चलाने ही पड़ेंगे और एक दिन धर्म की विजय होगी।

बता दें कि इन्फोसिस को देश के विकास में रोड़ा बताने वाले आर्टिकल के छपने के बाद आरएसएस के प्रवक्ता सुनील आंबेडकर ने ट्वीट करके कहा था, ‘पांचजन्य में छपे लेख में लेखक ने व्यक्तिगत विचार रखे हैं। पांचजन्य संघ का मुखपत्र नहीं है। इसे आरएसएस के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।’

आंबेडकर ने यह भी कहा था कि पांचजन्य मुखपत्र नहीं है लेकिन दोनों संगठनात्मक और वैचारिक रूप से जुड़े हुए हैं।पांचजन्य के एडिटर को हमेशा आरएसएस की वार्षिक बैठक में बुलाया जाता है।इस बैठक में नेतृत्व को लेकर बड़े फैसले होते हैं। पांचजन्य के पहले संपादक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे।

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