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10 साल की सजा वाले जुर्म के आरोप में 12 साल तक जेल में रहे ये मुस्लिम युवक, रिहा होने पर एक ने कहा- न्याय की जीत हुई

शाह की मां महमूदा ने मीडिया के समाने कहा कि उनका बेटा पिछले 11 साल से जेल की सलाखों के पीछे है। उसकी पूरी जवानी बर्बाद हो गई है।

Delhi serial blasts, Delhi serial blasts case, Delhi serial blasts verdict, Delhi serial blasts prosecution, court decision in serial blast, मोहम्मद रफीक शाह, न्यायाधीश, तारीक अहमद डार और मोहम्मद हुसैन फजलीइस केस में मोहम्मद रफीक शाह सहित तीन लोगों को रिहा किया गया है।

साल 2005 में दिल्ली में सीरियल ब्लास्ट के आरोप में गिरफ्तार किए गए मोहम्मद रफीक शाह को अदालत ने 11 साल बाद गुरुवार (16 फरवरी) को बरी कर दिया। इस केस में मोहम्मद रफीक शाह सहित तीन लोगों को रिहा किया गया है। इनमें तारिक शाह को प्रतिबंधित संगठन लश्कर ए तैयबा के साथ संबंध रखने का दोषी पाया गया। लेकिन ट्रायल के दौरान वे सजा की अवधि से ज्यादा समय तक जेल में रहे। इसके चलते अदालत ने उन्हें भी रिहा करने का आदेश दिया। मोहम्मद रफीक शाह ने कहा कि मैंने बरी होने के बाद न्यायाधीश को सिर्फ तीन शब्दों कहे – न्याय जिंदा है। दिल्ली पुलिस ने शाह पर 2008 में देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश, हथियार एकत्रित करने, हत्या का प्रयास करने के आरोप की चार्जशीट अदालत में दाखिल की थी। लेकिन गुरुवार को 147 पेज के फैसले में अदालत ने शाह को बरी कर दिया। अदालत के इस फैसले के बाद शाह जहां खुश नजर आए वहीं उनकी मां दिल्ली पुलिस से खासी नाराज दिखीं। शाह की मां महमूदा ने मीडिया के समाने कहा कि उनका बेटा पिछले 11 साल से जेल की सलाखों के पीछे है। उसकी पूरी जवानी बर्बाद हो गई है। क्या दिल्ली पुलिस उनके बेटे का उसकी जिंदगी के 11 साल लौटा सकती है जो उसने जेल में काटे। मोहम्मद रफीक शाह की मां ने कहा कि उसके बेटे की शादी भी नहीं हो पाई है जिसके कारण सरकार को उसे मुआवजा देना चाहिए।

एनडीटीवी से बात करते हुए शाह ने कहा कि, ” मैं जानता था कि ये एक लंबी प्रक्रिया है इसमें 325 लोगों की पेशी होनी थी जिसमें वक्त तो लगता ही है लेकिन मुझे पूरी उम्मीद थी कि एक दिन मुझे न्याय जरुर मिलेगा। शाह ने कहा कि, ”जब मुझे गिरफ्तार किया गया तो मैं इस्लामिक स्टडीज में एमए कर रहा था मुझे कक्षा से गिरफ्तार किया गया। जब मैंने पुलिस को कहा कि आप मेरी कक्षा उपस्थिति रिकॉर्ड देख लीजिए लेकिन पुलिस ने उसकी एक नहीं सुनी।”

कश्मीर विश्वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर अब्दुल वाहीद कुरैशी ने अदालत में बताया कि 29 अक्टूबर 2005 जिस दिन दिल्ली में ब्लास्ट हुआ उस संमय शाह अपनी कक्षा में बैठा पढ़ रहा था। उन्होंने बताया कि वह 14 फरवरी को आखिरी बार रफीक से मिलें थे वह थोड़ा डरा हुआ था। लेकिन 11 साल की इस लंबी लड़ाई के बाद मिले इंसाफ पर खुशी जताई।

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