महाराष्ट्र सरकार के उस आदेश को एक महीना हो चुका है, जिसमें प्रवासी ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का बेसिक ज्ञान अनिवार्य किया गया है। ताकी उन्हें राज्य में काम करने में परेशानी न हो। सभी प्रवासी ऑटो और टैक्सी चालकों को 15 अगस्त तक मराठी सीखने का निर्देश दिया गया है। ऐसा नहीं होने पर उनकी परमिट को रद्द किया जा सकता है। राज्य सरकार इस फैसले ने खासकर उन हजारों प्रवासी चालकों की चिंता बढ़ा दी है, जो वर्षों से मुंबई में काम कर रहे हैं लेकिन मराठी नहीं जानते।
मुंबई में करीब 2.8 लाख ऑटो-रिक्शा और 20 हजार टैक्सी परमिट धारक हैं। इनमें बड़ी संख्या उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों से आए लोगों की है। अब इनमें से कई चालक रोजी-रोटी कमाने के साथ-साथ मराठी सीखने की कोशिश में जुट गए हैं। कोई लंबी ड्यूटी के बाद क्लास में पहुंच रहा है तो कोई मोबाइल और यूट्यूब के जरिए भाषा सीख रहा है।
30 साल बाद फिर पहुंचे स्कूल
43 वर्षीय टैक्सी चालक शादाब कुरैशी के लिए 20 मई का दिन खास था। रोज की तरह 11 घंटे टैक्सी चलाने के बाद घर लौटने की बजाय वह नागपाड़ा स्थित एक स्कूल पहुंचे। करीब तीन दशक बाद वह फिर से छात्र बनकर कक्षा में बैठे थे। दिल्ली से 1991 में मुंबई आए शादाब ने बताया कि वह मराठी समझ लेते हैं, लेकिन बोल नहीं पाते। यही वजह है कि उन्होंने मराठी सीखने का फैसला किया।
उन्होंने कहा, “जब मेरे दोस्तों को पता चला कि मैं मराठी सीखने जा रहा हूं तब उन्हें हंसी आई, लेकिन मुझे फर्क नहीं पड़ता। अब भाषा सीखना जरूरी हो गया है।” शादाब के अनुसार, यात्रियों से ज्यादा दिक्कत आरटीओ अधिकारियों से बातचीत में होती है क्योंकि वे धाराप्रवाह मराठी बोलते हैं।
‘चला मराठी शिकूया’ में जुटे छात्र
शादाब ने नागपाड़ा में शुरू हुए ‘चला मराठी शिकूया’ (आओ मराठी सीखें) नामक तीन महीने के कोर्स में दाखिला लिया है। इस कोर्स का आयोजन अंजुमन-ए-इस्लाम और एनसीपी (शरद पवार गुट) के अल्पसंख्यक विभाग ने किया है। कक्षा में शादाब और उनके साथी टैक्सी चालक ताजुद्दीन अंसारी सबसे आगे बैठते हैं। शिक्षक छात्रों को मराठी वर्णमाला, सर्वनाम और सामान्य बोलचाल सिखा रहे हैं।
हालांकि दिनभर की थकान के बाद पढ़ाई आसान नहीं है। शादाब कहते हैं, “क्लास में आना ही मुश्किल है। रात को खाना खाकर इतना थक जाता हूं कि तुरंत नींद आ जाती है। पढ़ाई के लिए समय निकालना चुनौती है।” 38 वर्षीय ऑटो चालक सहरुद्दीन हसन खान ने मराठी सीखने का अलग रास्ता चुना है। उत्तर प्रदेश के रहने वाले सहरुद्दीन पिछले 20 साल से मुंबई के मीरा-भायंदर इलाके में ऑटो चला रहे हैं।
उन्होंने बताया कि इलाके में अधिकतर लोग हिंदी बोलते हैं, इसलिए कभी मराठी सीखने की जरूरत महसूस नहीं हुई। लेकिन सरकारी निर्देश के बाद उन्होंने अपना मोबाइल ही शिक्षक बना लिया। अब वह रोज मराठी अखबार ‘सामना’ खरीदते हैं, यूट्यूब वीडियो देखते हैं और मराठी सिखाने वाली रील्स के स्क्रीनशॉट सेव करते हैं।
सहरुद्दीन कहते हैं, “अगर काम जारी रखना है तो भाषा सीखनी ही पड़ेगी। जब भी कोई शब्द समझ नहीं आता, मैं गूगल पर उसका मतलब खोजता हूं और याद करने की कोशिश करता हूं।”
खाली समय में अखबार और यूट्यूब
सहरुद्दीन सुबह काम शुरू करने से पहले और दोपहर के भोजन के समय मराठी पढ़ने का अभ्यास करते हैं। उन्होंने हाल ही में मीरा रोड में आयोजित एक मराठी कार्यशाला में भी हिस्सा लिया, जहां उन्हें बुनियादी बातचीत सिखाई गई। अब वह अपने दोस्तों और यात्रियों से भी मराठी में बात करने का अभ्यास करते हैं। उन्होंने कहा, “मैं ग्राहकों से कहता हूं कि मुझसे मराठी में बात करें। कई लोग खुशी-खुशी मदद करते हैं।”
‘इतने कम समय में भाषा कैसे सीखें?’
सरकार और राजनीतिक दलों द्वारा मराठी सिखाने के लिए कई पहल शुरू की गई हैं। परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने भी हाल में ऑटो चालकों के लिए कार्यशाला आयोजित की थी, जहां सैकड़ों चालक पहुंचे। हालांकि कई चालकों का मानना है कि इतने कम समय में नई भाषा सीखना आसान नहीं है।
ऑटो चालक रामजी गुप्ता कहते हैं, “छात्र किसी विषय को सीखने में कई साल लगाते हैं। हम दिनभर काम करते हैं, परिवार की जिम्मेदारियां संभालते हैं। ऐसे में कुछ महीनों में भाषा सीखना आसान नहीं है।” फिर भी अधिकांश चालक मानते हैं कि मराठी सीखना सिर्फ नियमों का पालन नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की संस्कृति और लोगों से बेहतर जुड़ने का माध्यम भी है। इसलिए वे तमाम कठिनाइयों के बावजूद नई भाषा सीखने की कोशिश में जुटे हैं।
