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मेघालय से AFSPA हटा, अरुणाचल प्रदेश के सिर्फ 8 थानों में लागू

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मेघालय से सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम (अफस्पा) हटा दिया है और अरुणाचल प्रदेश में इसे 8 पुलिस थानों तक सीमित कर दिया है। एक अधिकारी ने सोमवार को कहा- "मेघालय के सभी इलाकों से 1 अप्रैल से अफस्पा को पूरी तरह हटा लिया गया है।

भारतीय सेना के जवान। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मेघालय से सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम (अफस्पा) हटा दिया है और अरुणाचल प्रदेश में इसे 8 पुलिस थानों तक सीमित कर दिया है। एक अधिकारी ने सोमवार को कहा- “मेघालय के सभी इलाकों से 1 अप्रैल से अफस्पा को पूरी तरह हटा लिया गया है। अरुणाचल में इसे 16 पुलिस थानों से घटा कर 8 में कर दिया गया है।” हालांकि, इस अधिनियम को अरुणाचल प्रदेश के तीन पूर्वी जिलों में छह महीनों के लिए बढ़ा दिया गया है। इन जिलों में तिरप, लोंगडिंग और चांगलांग शामिल हैं, जिनकी सीमा म्यांमार और 8 पुलिस थानों के तहत असम की सीमा के 7 अन्य जिलों से लगती है। तीनों जिले जनवरी 2016 से अफस्पा के तहत हैं। अधिकारी ने कहा कि त्रिपुरा से यह अधिनियम 2015 में हटा लिया गया था और बीते एक साल में पूर्वोत्तर के कुछ इलाके इस अधिनियम के तहत हैं। उन्होंने कहा कि यह अधिनियम मेघालय में सिर्फ असम से लगे 20 किमी इलाके में लागू है और मिजोरम में यह प्रभावी नहीं है।

अफस्पा सेना और केंद्रीय बलों को ‘अशांत क्षेत्रों’ में कानून का उल्लंघन करने पर किसी को भी मारने, बिना वारंट के तलाशी लेने और गिरफ्तारी करने की शक्ति देता है और केंद्र सरकार की मंजूरी के बिना अभियोजन और कानूनी मुकदमे से बलों को सुरक्षा प्रदान करता है। यह पूरे नागालैंड, असम, मणिपुर (इंफाल के सात विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों को छोड़कर) में प्रभावी है। असम और मणिपुर की राज्य सरकारों के पास अब इस अधिनियम को बनाए रखने या रद्द करने की शक्तियां हैं।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक गृह मंत्रालय ने एक और फैसले में पूर्वोत्तर में विद्रोहियों के आत्मसमर्पण कम पुनर्वास नीति सहायता राशि में इजाफा किया है जो कि 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 4 लाख रुपये कर दी गई है। यह नीति इसी 1 अप्रैल से प्रभावी हो चुकी है। गृह मंत्रालय के एक और बयान में कहा गया है कि इलाके में पिछले 4 वर्षों में विद्रोह से संबंधित घटनाओं में 63 फीसदी की कमी दर्ज की गई है, जबकि 2017 में इन घटनाओं में नागरिकों के मारे जाने में 83 फीसदी की कमी और 40 फीसदी की कमी सुरक्षा बलों के हताहत होने को लेकर दर्ज की गई। पूर्वोत्तर में 2000 के मुकाबले 2017 में विद्रोह से संबंधित घटनाओं में 85 फीसदी तक की कमी आई। वहीं, 1997 के मुकाबले सुरक्षा बलों की हताहत होने की घटनाओं में 96 फीसदी की कमी देखी गई।

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